अध्यात्म

Mahakumbh 2025: अघोरी… ऐसे राज जो डराते नहीं, सोचने पर मजबूर करते हैं; नरबलि, महिला अघोरी और श्मशान

अघोरी.. शैव धर्म के तंत्र साधना करने वाले साधु-संत। अघोरी शब्द संस्कृत के ‘अघोर’ शब्द से बना है जिसका मतलब है निर्भय। साधु शिव और काली के उपासक। जिनके बारे में लोगों ने बुरा ही सुना है। आज मेरी यात्रा का केंद्र अखिल भारतीय अघोर अखाड़ा परिषद रहा। यहां पर मेरी मुलाकात अघोरी भोलानाथ जी से हुई और उन्होंने अघोरियों से जुड़े बहुत सारे राज हमारे सामने खोले। उनमें एक ये भी था कि जब उनके गुरु ने कहा कि आज तो प्रसाद नरबलि का लगेगा तो उन्होंने क्या किया। इनके आश्रम में पहुंचने पर सबसे पहले हमें जो पढ़ने को मिला वह था “अघोरी ज्ञान ग्रंथों या पुस्तकों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। यह महाज्ञान एक पूर्ण जीवन है जिसको जीकर ही अनुभव किया जा सकता है।

अघोर का मतलब निराकार है। अघोर किसी से डरता नहीं है। वह शांति से रहता है। वह समाज से मिलकर रहता है और चिंतन करता है कि यह समाज भी अच्छे से रहे। वह समाज को डराने के लिए नहीं बना है। अघोरी की दुनिया वास्तविक नहीं होती है, वह पृथ्वी पर एक शिव तत्व के रूप में रहता है। शिव जी को समझना आसान नहीं है, हमें इसके लिए शांति की आवश्कता होती है। इसलिए हम मशान घाट में रहते हैं। मशान घाट में हम इसलिए भी रहते हैं कि वहां पर आदमी सबकुछ त्याग कर पहुंचता है। जब आप भी अपने किसी साथी, संबंधी की मौत पर वहां पहुंचते हैं तो कुछ पल का वैराग्य धारण कर लेते हैं। हम लोग वहीं रहते हैं तो हमारे जीने की इच्छा वैसे ही खत्म हो जाती है। जीने का मतलब ही कुछ अच्छा मार्ग समाज को दिखाकर जाओ। जो लोग खोपड़ी पकड़कर हाथ में लेकर घूमते हैं और समाज को भयभीत करते हैं। इससे लोगों में हमारे प्रति गलत धारणा आ जाती है।
गुरु जी हमें दिशा दिखाते हैं और हम उसका पालन करते हैं। मनुष्य की खोपड़ी कोई लेकर घूमने वाली चीज नहीं होती है, इसे स्थापित किया जाता है और इसकी पूजा की जाती है। मनुष्य की खोपड़ी हर अघोरी को रखना आवश्यक भी नहीं है। अगर कोई उसे लेकर रखता है तो उसके नियमों का पालन भी करना होता है। अघोरी का मतलब वेद रहित जो अंधकार से प्रकाश की ओर जाएगा। हम लोग या तो जंगल में रहेंगे या मशान, यही हमारा ठिकाना है। जब उनसे पूछा गया कि सुना है अघोरी चिता में जलने वाली लाश का कच्चा मांस खाते हैं, तो इस पर उनका कहना था कि ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है। एक बार मेरे गुरु ने मुझसे कहां कि हमें नरबलि का प्रसाद देना है। इसके बाद मैं तुम्हें मंत्र दूंगा और फिर तुम रातभर साधना करना। उनके इस आदेश पर मैं चिंतित हो गया। मैं सोचने लगा कि गुरू जी ने मुझे यह किस भवर में फंसा दिया। पूरी रात सोचा, फिर मुझे याद आया कि मेरा एक दोस्त डॉक्टर है, मैं उसके पास गया और उससे कहा कि मेरा एक पैकेट खून निकाल दो। उसने कहा कि क्या करना है गुरू जी इसका, मैंने कहा मुझे दे दो। मैं गुरु के पास गया तो उनसे कहा कि व्यवस्था हो गई है। नरबलि का मतलब यह नहीं होता कि किसी व्यक्ति को मारा जाए, पूजा में खून लगता है और उसकी व्यवस्था हो गई। इसका थोड़ा ही प्रयोग होता है, हमारे संप्रदाय में किसी को हानी पहुंचना नहीं है। उन्होंने यह भी साफ किया कि अघोरी बलि नहीं देते हैंजब उनसे पूछा गया कि कोई महिला भी अघोरी हो सकती है तो इस पर उनका कहना था कि हमारे संप्रदाय में अभी तक ऐसी व्यवस्था नहीं है। लोग गृहस्थी में रहकर भी अघोरी हो सकते हैं। कोई महिला चाहे तो गृहस्थी दीक्षा भी ले सकती है। वह अपने घर पर रहकर भी भगवान और ज्ञान को प्राप्त कर सकती है। ऐसा नहीं कि आपको सब छोड़कर हमारे पीछे ही चलने से सब प्राप्त होगा।

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