“विश्व आदिवासी दिवस पर जश्न नहीं, अधिकारों के लिए जागरण ज़रूरी” – एड. सुनील कुमार आदिवासी

विदिशा। मानव जाति, पर्यावरण, आदिवासी संस्कृति और अधिकारों के संरक्षण के बिना विकास का दावा खोखला है, यह बात सामाजिक कार्यकर्ता एवं राष्ट्रीय आदिवासी जनक्रांति संघ के संस्थापक एड. सुनील कुमार आदिवासी ने विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त के अवसर पर कही।
उन्होंने बताया कि 2016-17 से विदिशा जिले में *राष्ट्रीय आदिवासी जनक्रांति संघ और सर्व आदिवासी मंच* द्वारा विश्व आदिवासी दिवस बड़े उत्साह और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया जाता रहा है – परंपरागत वेशभूषा, तीर-कमान, सांस्कृतिक रैली और प्रशासन को ज्ञापन के माध्यम से अपनी आवाज बुलंद करना इसकी पहचान रही है।
लेकिन इस वर्ष उन्होंने निर्णय लिया कि बड़े मंच और जुलूस की बजाय, इस दिवस को ग्राम स्तर पर जागरूकता दिवस के रूप में मनाया जाए, ताकि आदिवासी ग्रामीणों को उनके मूलभूत अधिकार – बिजली, पानी, सड़क, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार – के प्रति सजग किया जा सके।
*”जंगल पर डाका, ज़मीन पर कब्ज़ा, महिलाओं की तस्करी और फर्जी जाति प्रमाण पत्र का खेल – ये मुद्दे आदिवासी अस्तित्व पर सीधा हमला हैं,”* एड. सुनील कुमार ने कहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि पंचायत और स्थानीय निकायों में आरक्षण सीटों को खाली कर अनारक्षित करने की सरकारी चाल आदिवासी नेतृत्व खत्म करने की सोची-समझी साज़िश है।
उन्होंने तंज कसते हुए कहा – “सरकारें बड़े मंचों पर आदिवासी संस्कृति का गीत गाती हैं, लेकिन असली मुद्दों पर मौन साध लेती हैं। जश्न के मंचों से अधिकार नहीं मिलते, उसके लिए संघर्ष का मैदान चाहिए।”
एड. सुनील ने संयुक्त राष्ट्रसंघ के इतिहास का उल्लेख करते हुए बताया कि 24 अक्टूबर 1945 को स्थापना के बाद, वर्ष 1994 में तय किया गया कि हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाएगा, ताकि आदिवासी समुदायों के अस्तित्व, स्वायत्तता, प्राकृतिक संसाधनों और संस्कृति की रक्षा को वैश्विक प्राथमिकता दी जा सके।
*अंत में उन्होंने गंभीरता से चेताया –* “आज जब लोकतंत्र और संविधान को खोखला करने की साज़िशें तेज़ हैं, तब आदिवासी अधिकारों की लड़ाई सिर्फ सामाजिक नहीं, बल्कि संवैधानिक अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है। यदि हम आज एकजुट नहीं हुए, तो कल सिर्फ इतिहास की किताबों में रह जाएंगे।”