ओशो शिविर गंधर्व कृषि फार्म एवं माधव उद्यान विदिशा में विश्व ध्यान दिवस उत्सव ओशो प्रेमियों के द्वारा बहुत ही धूमधाम से हुआ संपन्न l




विदिशा ओशो प्रेमियों के द्वारा विश्व ध्यान दिवस के अवसर पर प्रातः काल गंधर्व कृषि फार्म जहां नियमित सक्रिय ध्यान होता है वहां एवं सायंकाल माधव उद्यान में भी शिविर लगाकर विश्व ध्यान दिवस को सक्रिय ध्यान, भजन कीर्तन एवं प्रवचन के साथ मनाया गया। सभी ओशो प्रेमियों के द्वारा कार्यक्रम के समापन के अवसर पर स्वादिष्ट व्यंजनों का सामूहिक रूप से आनंद उठाया। इस आनंदोत्सव में भारी संख्या में ओशो प्रेमियों ने भाग लिया। कार्यक्रम के सूत्रधार स्वामी पंकज आर्य द्वारा समापन पर आभार व्यक्त किया गया।
विश्व ध्यान दिवस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी अखिल भारतीय स्वर्णकार महासभा और मल्टीपल एवं डिस्ट्रिक्ट सह मल्टीमीडिया प्रभारी लायन अरुण कुमार सोनी ने विश्व ध्यान दिवस के अवसर पर कहा कि अपनी भारतीय संस्कार, परंपराओ, ज्ञान, ध्यान के महत्व समझाते हुए कहा कि इसे दुनिया ने भी अपनाया है इसलिए आज पूरे विश्व में ध्यान दिवस मनाया जा रहा है। आपने ओशो के बारे में बताया कि ओशो जन्म 11 दिसंबर, 1931एंव मृत्यु 19 जनवरी, 1990 को हुई थी। आप एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु, दार्शनिक और रहस्यवादी थे। जिनका मूल नाम रजनीश चंद्रमोहन जैन था। जिन्होंने ध्यान, प्रेम, जीवन और स्वतंत्रता पर क्रांतिकारी विचार दिए। पारंपरिक धर्मों की आलोचना की और एक ‘नव-संन्यास’ आंदोलन चलाया, जिससे वे विवादों और लोकप्रियता के केंद्र में रहे और उनके प्रवचन व शिक्षाएँ आज भी दुनियाभर में प्रासंगिक हैं।
आपका जन्म मध्य प्रदेश के कुचवाड़ा गाँव में हुआ था।आप बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और विद्रोही स्वभाव के थे, जो किताबों और शिक्षकों से सवाल करने में रुचि रखते थे। जबलपुर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त करने के बाद, वे कुछ समय के लिए दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर भी रहे, लेकिन बाद में नौकरी छोड़कर आध्यात्मिक मार्ग पर निकल पड़े। वे आचार्य रजनीश, भगवान रजनीश जैसे नामों से जाने गए, लेकिन अंततः उन्होंने ‘ओशो’ नाम अपनाया, जो ‘ओशन’ (सागर) से प्रेरित था।
उनके विचारों में ध्यान जागरूकता , प्रेम रचनात्मकता और हास्य पर जोर दिया गया। जिसमें उन्होंने पारंपरिक धार्मिक रूढ़ियों को चुनौती दी और जीवन को पूरी तरह से जीने की वकालत की।उन्होंने भारत और विदेशों में एक बड़ा अनुयायी वर्ग बनाया।1990 में पुणे में उनका निधन हो गया। उनकी समाधि पर लिखा है, “ओशो, जो न कभी पैदा हुए, न कभी मरे”. आज उनका आश्रम ‘ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसॉर्ट’ के नाम से जाना जाता है और उनकी शिक्षाएँ न्यू एज विचारकों और आध्यात्मिक साधकों के लिए प्रेरणा बनी हुई है।



