त्याग के बिना आत्म-तत्व की उपलब्धि संभव नहीं : स्वामी प्रणवानंद सरस्वती
आचार्य शंकर न्यास द्वारा आयोजित 86 वीं शंकर व्याख्यानमाला "ईशावास्यमिदं सर्वं " विषय हुई संपन्न


त्याग के बिना आत्म-तत्व की उपलब्धि संभव नहीं : स्वामी प्रणवानंद सरस्वती
भोपाल। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग, मप्र शासन द्वारा 86 वीं ‘शंकर व्याख्यानमाला’ के अंतर्गत मार्कंडेय संन्यास आश्रम, ओंकारेश्वर के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती का विशेष व्याख्यान हुआ। इस अवसर पर उन्होंने ईशावास्योपनिषद के प्रथम मंत्र “ईशावास्यमिदं सर्वं ” की विस्तृत व्याख्या करते हुए अद्वैत वेदांत के गूढ़ रहस्यों पर प्रकाश डाला।
ईश्वर की सर्वव्यापकता पर प्रकाश डालते हुए स्वामी प्रणवानंद ने बताया कि इस संपूर्ण जगत में जो कुछ भी गतिशील या स्थिर है, वह सब ईश्वर से व्याप्त है।
उन्होंने “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा” की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य को संसार की वस्तुओं का उपभोग राग-द्वेष से मुक्त होकर और त्याग की भावना के साथ करना चाहिए । बिना त्याग के आत्म-तत्व की उपलब्धि संभव नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट किया गया कि जहाँ पहला मंत्र निवृत्ति मार्ग (सन्यास और ज्ञान) की बात करता है, वहीं दूसरा मंत्र उन लोगों के लिए कर्म मार्ग का मार्ग प्रशस्त करता है जो अभी संसार में सक्रिय हैं। कर्म के माध्यम से ही अंतःकरण शुद्ध होती है और व्यक्ति ज्ञान का अधिकारी बनता है।
स्वामी जी ने उदहारण के माध्यम से संदेश दिया कि धन और भौतिक संपदा किसी की स्थायी संपत्ति नहीं है, अतः किसी को धन का लोभ नहीं करना चाहिए।
अद्वैत की अनुभूति को उदाहरणों (जैसे मिट्टी और बर्तन, स्वर्ण और आभूषण) के माध्यम से समझाया कि कार्य अपने कारण से भिन्न नहीं होता। उसी प्रकार यह जगत अपने कारण रूप (परमेश्वर) से भिन्न नहीं है ।
*आत्म-साक्षात्कार के लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन अनिवार्य*
स्वामी जी ने अंत में जोर देते हुए कहा कि आत्म-साक्षात्कार के लिए श्रवण, मनन और निदिध्यासन अनिवार्य है। जब तक साधक स्वयं को शरीर मानने के भ्रम से मुक्त नहीं होता, तब तक वह उस व्यापक सत्य को अनुभव नहीं कर सकता। ज्ञात हो कि प्रति माह शंकर व्याख्यानमाला का आयोजन नियमित किया जाता है, जिसमें अद्वैत परम्परा के ही एक संन्यासी द्वारा गूढ वैदान्तिक विषय पर प्रकाश डाला जाता है। व्याख्यानमाला ऑनलाइन अथवा ऑफलाइन माध्यमों से आयोजित की जाती है, जिसमें वेदांतिक रुचि रखने वाले प्रदेश व देश के जिज्ञासु श्रोता सम्मिलित होते हैं। न्यास द्वारा पिछले 6 वर्षों से अधिक समय से निरंतर विविध विषयों पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से देशभर के लाखों श्रोता जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त न्यास द्वारा ओमकारेश्वर में एकात्मता का वैश्विक केंद्र – ‘एकात्म धाम’ विकसित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 108 फीट ऊंची आदि शंकराचार्य जी की ‘एकात्मता की प्रतिमा’ मान्धाता पर्वत पर स्थापित की गई। इससे अतिरिक्त अद्वैत लोक – संग्रहालय तथा आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की भी स्थापना की जा रही है।



