खेलमध्य प्रदेश

जागरण लेकसिटी विश्वविद्यालय में आयोजित तीन दिवसीय भोपाल इंटरनेशनल स्टोरीटेलिंग फेस्टिवल के दूसरे दिन कहानियां सिर्फ सुनी नहीं गईं, बल्कि महसूस की गईं

मुख्य मंच से लेकर बच्चों के विशेष सत्रों तक, लोककथाओं से लेकर सिनेमा, सेना, विज्ञापन, कला और खगोल विज्ञान तक, हर जगह कहानी जीवन का आधार बनकर उभरी।

“कॉरपोरेट ऑफिस तय कर रहे हैं कि भारत क्या देखेगा”

मुख्य मंच पर आयोजित Profession and Stories चर्चा सत्र में फिल्मकार अजय बगड़िया, ब्रिगेडियर संजय घोष और मार्केटिंग प्रोफेशनल जनक भट्ट ने कहानी और पेशे के रिश्ते पर खुलकर बातचीत की।
अजय बगड़िया ने कहा,

“हमारी सबसे बड़ी समस्या यह है कि कॉरपोरेट ऑफिस में बैठे लोग यह तय कर रहे हैं कि भारत क्या देखेगा।”

उन्होंने दक्षिण भारतीय सिनेमा का उदाहरण देते हुए कहा कि आज फिल्में नहीं, प्रोजेक्ट्स बनते हैं, जहां दर्शकों की खुशी को प्राथमिकता दी जाती है।
ब्रिगेडियर संजय घोष ने सेना के अनुभव साझा करते हुए बताया कि बचपन में देखी कहानियां ही वर्दी पहनने का सपना जगाती हैं।
“हमारी बटालियन हिस्ट्री दरअसल कहानियों का दस्तावेज़ होती है। हर ऑपरेशन से हजारों कहानियां निकलती हैं।”

जनक भट्ट ने विज्ञापन की दुनिया की सच्चाई बताते हुए कहा कि कहानी हर किरदार और हर ब्रांड की आत्मा होती है, लेकिन यहां भावनाओं के साथ समझौता करना पड़ता है।

लोककथा में बंधा पूरा आंगन: कपिल पांडे की संगीतमय प्रस्तुति

दोपहर को मुख्य मंच पर कपिल पांडे (तुनतुनिया) की Musical Storytelling ने दर्शकों को लोकधुनों और किस्सों की यात्रा पर ले गया।
राजस्थान से लखनऊ तक फैली कथा को उन्होंने “बालम मोहे पेशर वाली नथ मंगवा दे” जैसे लोकगीतों से जोड़ा।
ठाकुर, गुरु-शिष्य और चार अजूबों की कहानी सुनाते हुए उन्होंने कहा,

“जैसे समोसा बिना आलू बेकार है, वैसे ही वाह-वाह बिना कहानी बेकार है।”

उन्होंने बताया कि बेटी को सुनाई गई कहानियों से ही उनकी कहानीकार बनने की यात्रा शुरू हुई।

जब कला ने जीवन की जिद सीखी

Art Grove में लाइव पेंटिंग प्रदर्शनी के दौरान आशीष भट्टाचार्य की जीवन यात्रा ने लोगों को भीतर तक छुआ।
मैकेनिकल इंजीनियरिंग छोड़कर आर्किटेक्चर, फिर कला तक पहुंचे भट्टाचार्य ने कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के बावजूद 16-16 घंटे काम करने का जज़्बा साझा किया।
उन्होंने कहा,

“कुछ बड़ा हासिल करना है तो समर्पण, जुनून और पागलपन, तीनों चाहिए।”

विशेष बच्चों का सत्र: जब खामोशी भी कहानी बन गई

Story Den में आयोजित विशेष बच्चों के सत्र ने पूरे फेस्टिवल का सबसे भावुक क्षण रच दिया।
विशेष रूप से सक्षम बच्चों ने बिना शब्दों के कहानी को मंच पर जीवंत कर दिया।
कार्यक्रम का समापन तब हुआ जब एक दृष्टिहीन बच्ची ने मुंशी प्रेमचंद की रचना सुनाकर यह साबित किया कि

“कहानी देखने के लिए आंखों से ज़्यादा दिल की ज़रूरत होती है।”

“भोपाल की पत्तियबाजी इबादत है”

शाम को मुख्य मंच पर रफ़ी शब्बीर और प्रिंस गाबा की पत्तियबाज़ी ने शहर की तहज़ीब को शब्द दिए।
रफ़ी शब्बीर ने कहा,

“दुनिया की सारी मजहबी किताबें भी कहानियां हैं, क्योंकि ऊपर वाला जानता है कि इंसान कहानी से जल्दी समझता है।”

प्रिंस गाबा ने भोपाल की भाषा और हिंदू-मुस्लिम एकता पर बात करते हुए कहा कि उर्दू मजहब नहीं, मोहब्बत की भाषा है।

 

समय, तारे और हम: संदीप पोद्दार की खगोलीय कहानी

Story Talkies में संदीप पोद्दार का Astronomical Storytelling सत्र विज्ञान और दर्शन का अद्भुत संगम बना।
उन्होंने समय को नदी बताते हुए कहा कि हम नाव में बैठे अतीत की ओर देखते हुए भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं।
सापेक्षता सिद्धांत, कॉस्मिक कैलेंडर, मानव विकास और भोपाल की भौगोलिक संरचना को जोड़ते हुए उन्होंने श्रोताओं को यह अहसास कराया कि

“हम ब्रह्मांड में बहुत छोटे हैं, लेकिन बदलाव की ताकत हमारे भीतर बहुत बड़ी है।”

कहानियों का दिन, अनुभूतियों की रात
दिन का समापन मुख्य मंच पर मेहक मिर्ज़ा प्रभु के क़िस्सा कलाम सत्र के साथ हुआ, जो फेस्टिवल का सच्चा शोस्टॉपर साबित हुआ। इस सत्र में मेहक ने श्रोताओं से सीधा संवाद करते हुए कहानियों, ख़तों और मानवीय सोच के बदलते स्वरूप पर बात की। उनकी सहज बातचीत और संवेदनशील शब्दों ने पूरे माहौल को शांति और आत्ममंथन से भर दिया। उन्होंने बताया कि कहानियाँ केवल सुनी नहीं जातीं, बल्कि लिखी, जी और महसूस की जाती हैं, और हर ख़त दरअसल हमारे भीतर की आवाज़ होता है। इस सत्र ने दर्शकों को ठहराव, सुकून और गहरी भावनात्मक शांति के साथ विदा किया।

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