नर्मदा : साहित्य से लेकर संस्कृति तक, परम्परा का अविरल प्रवाह
"नर्मदा: केवल जल की धारा नहीं, संस्कृति और संवेदना का चिरंतन प्रवाह"



शुभम चौहान
शोधार्थी
नर्मदा जयंती पर विशेष आलेख
नर्मदा केवल जल की धारा नहीं है; वह जीवन, प्रेरणा और सृजन का आधार है। नर्मदा मैया की लहरों में अनगिनत कहानियाँ छिपी हैं, उसकी शांति में कविता बसी है, और प्रवाह में अनंतता का संदेश निहित है। साहित्य और संस्कृति के संवर्धन में नर्मदा मैया का योगदान अनुपम है। नर्मदा समय की साक्षी है, कवियों की प्रेरणा, साधकों की शरणस्थली और लोक की आस्था का आलंबन है। वह मेकलसुता है, जो विन्ध्य और सतपुड़ा की गोद में जन्मी, अमरकंटक के सुमनों से सजी, सहस्रधारा के उन्मुक्त उल्लास में झूमती, संगमरमर की बाहों में बँधी और फिर भड़ौच के सागर-संगम में अपनी यात्रा को विराम देती है।
अमरकंटक से खंभात की खाड़ी तक अपनी 1312 किलोमीटर की यात्रा में वह मध्य भारत की जीवनरेखा बनकर बहती है। उसके किनारों पर सघन वन, औषधीय वनस्पतियाँ, और प्राचीन मंदिर उसकी गोद में खिले फूलों की तरह शोभते हैं। नर्मदा का जल केवल प्यास नहीं बुझाता, वह आत्मा को तृप्त करता है। उसके तटों पर बसे लोग उसे नदी नहीं, माता कहते हैं- एक ऐसी माता, जो अपने बच्चों को जीवन, संस्कृति और आस्था का आशीर्वाद देती है। नर्मदा को देखना केवल एक नदी को देखना नहीं है। यह एक सभ्यता को, एक संस्कृति को, उसकी स्मृतियों और संवेदनाओं को अपने भीतर उतार लेना है।
नर्मदा के किनारे बसे गाँवों की लोक कथाएँ, कवियों की कविताएँ, और संतों के भजन इस बात के प्रमाण हैं कि नदियों ने हमारी सांस्कृतिक चेतना को कितना गहरा प्रभावित किया है। नदियों ने हमारे साहित्य को वह गहराई दी, जो शब्दों को केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुभूति का माध्यम बनाती है। नर्मदा का साहित्यिक और सांस्कृतिक महत्व केवल उसके भौगोलिक विस्तार तक सीमित नहीं है। यह महत्व उसकी उन लहरों में बसा है, जो कवियों की लेखनी को प्रेरित करती हैं, और उन किनारों में, जहाँ सभ्यताएँ जन्म लेती हैं। नर्मदा ने हिंदी साहित्य को एक अनूठी पहचान दी है, और इसका अध्ययन हमें यह समझने का अवसर देता है कि कैसे एक नदी मानव जीवन के हर पहलू – साहित्य, समाज, और पर्यावरण; को प्रभावित कर सकती है।
नर्मदा को कवियों ने हमेशा अपनी सृजनात्मकता का केंद्र बनाया। आदिकवि वाल्मीकि से लेकर भास, कालिदास, सुबन्धु, त्रिविक्रमभट्ट, राजशेखर और मुरारि तक, संस्कृत साहित्य के प्रत्येक युग में नर्मदा किसी न किसी रूप में काव्य का विषय बनी। वाल्मीकीय रामायण में जब रावण अपने मंत्रियों से कहता है, “अस्यां स्नात्वा महानद्यां पाप्मानं विप्रमोक्ष्यथ,” तो नर्मदा का पावनत्व प्राचीनतम साहित्य में ही अपनी छाप छोड़ देता है।
महाभारत में युधिष्ठिर नर्मदा तट पर तीर्थयात्रा करते हैं, और अनुशासनपर्व हमें बताता है कि नर्मदा में स्नान और संयम से मनुष्य राजत्व प्राप्त कर लेता है। स्कन्दपुराण का रेवाखण्ड, जो नर्मदापुराण के नाम से जाना जाता है, नर्मदा की महिमा को चरम पर ले जाता है। यहाँ नर्मदा केवल नदी नहीं, एक तीर्थ है, जो सिद्धियों, सुख और समृद्धि की दात्री है। संस्कृत और प्राकृत साहित्य में नर्मदा की गाथाएँ अनगिनत हैं। शिलालेखों, सूक्तियों और ऐतिहासिक महाकाव्यों में भी उसका उल्लेख है। पर नर्मदा का काव्य केवल प्राचीन साहित्य तक सीमित नहीं रहा। हिंदी के कवियों ने भी उसे अपनी लेखनी का आधार बनाया। गोस्वामी तुलसीदास, जिनके लिए रामकथा जीवन का आधार थी, नर्मदा को कैसे भूल सकते थे? रामचरितमानस में जब वह मंदाकिनी की महिमा गाते हैं, तो गंगा, यमुना, सरस्वती, गोदावरी के साथ नर्मदा का नाम भी आदर से लेते हैं:
“सुरसरि सरसइ दिनकरकन्या।
मेकलसुता गोदावरि धन्या।”
हिंदी साहित्य में नर्मदा की यह काव्यात्मक यात्रा माखनलाल चतुर्वेदी के पास आकर और गहरी हो जाती है। नर्मदा की गोद में जन्मे इस कवि के लिए नर्मदा केवल नदी नहीं, बल्कि जीवन की शिक्षिका, सौंदर्य की साधिका और विश्व की संवेदना की संवाहिका थी। उनकी हिमकिरीटिनी में नर्मदा का मधुर गीत इस तरह गूँजता है: “लोग कहें, मैं चढ़ न सकूँगी-बोझीली, प्रण करती हूँ सखि। मैं नर्मदा बनी उनके, प्राणों पर नित्य लहरती हूँ सखि। मैं अपने से डरती हूँ सखि।” यह नर्मदा का वह स्वर है, जो अपनी ही गहराई से भयभीत है, पर प्राणों पर लहर बनकर बहती है।
माखनलाल की लेखनी में नर्मदा एक साथ उदात्त और मानवीय है। वह ग्वारीघाट की लहरों में, भेड़ाघाट के संगमरमर में, सहस्रधारा के उल्लास में और ममलेश्वर के शांत तटों पर कवि के साथ-साथ भटकती है। यह भटकन केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भी है। शिवमंगल सिंह सुमन की नर्मदा और भी रंगीन है। वह अमरकंटक के सुमनों से सजी, ओंकारेश्वर में सकुचाती, धुआँधार में उल्लास लुटाती और मांडव के महलों में अभिसार सजाती है। रामचंद्र बिल्लोरे नर्मदा को ऋषियों की जीवन गीता कहकर पुकारते हैं, तो अपने कविता संग्रह ‘विविधा’ में शिव मंगल सिंह ‘सुमन’ लिखते हैं –
“नर्मदा अमरकंटक के सुमनों की सौगात सजाती है,
ओंकारेश्वर के बीच सकुचती सहमी सहमी आती है।
जो धुआँधार में धारा का स्वर्गिक उल्लास लुटाती है।”
नर्मदा का माहात्म्य केवल काव्य तक सीमित नहीं। वह भारतीय संस्कृति का वह स्रोत है, जो वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक अनवरत बहता रहा है। शतपथब्राह्मण में रेवा के रूप में उसका उल्लेख है। महाभारत, रामायण, पुराण और उपपुराण—सभी में नर्मदा की महिमा है। स्कंदपुराण का रेवाखण्ड तो नर्मदा को समर्पित एक संपूर्ण ग्रंथ है। बृहत्संहिता, वशिष्ठसंहिता, शिलालेख और सूक्तियाँ—हर जगह नर्मदा की उपस्थिति है। प्राकृत गाथाओं में भी उसकी कथाएँ गूँजती हैं। नर्मदा का तीर्थत्व प्राचीन है। महाभारत में हमें इसका स्पष्ट प्रमाण मिलता है, जब युधिष्ठिर नर्मदा तट पर तीर्थयात्रा करते हैं। नर्मदा सबकी शरणस्थली रही है।
नर्मदा का साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं, वह एक जीवंत परंपरा है, जो समाज, संस्कृति, और पर्यावरण को एक सूत्र में पिरोती है। मैया की कृपा हम सभी पर बनी रहे और हमारा अंतस निरन्तर सृजनशील रहे; यही प्रार्थना है।
नर्मदे हर!



