विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025 पर एक दिवसीय संविमर्श का आयोजन हुआ



भोपाल। म.प्र. निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग तथा विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में “विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025” विषय पर एक दिवसीय संविमर्श दिनांक 25 जनवरी, 2026 मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग, भोपाल के सभागार में आयोजित किया गया। संविमर्श के उद्घाटन सत्र में कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश शासन के उच्च शिक्षा, तकनीकी शिक्षा एवं आयुष विभाग के मंत्री श्री इन्दर सिंह परमार थे। इस सत्र में विधेयक पर वक्तव्य विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एम. जगदीश कुमार ने दिया। सत्र की अध्यक्षता हरियाणा हॉयर एजुकेशन कॉउंसिल के चेयरमेन प्रो. कैलाश चंद्र शर्मा ने की। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में आयोग के सभापति प्रो. खेमसिंह डहेरिया, विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. शशिरंजन अकेला, आयोग के प्रशासनिक सदस्य श्री महेशचंद्र चौधरी एवं सचिव डॉ. देवेन्द्र सिंह गुर्जर मंचासीन थे।
संविमर्श में 50 उच्च शिक्षा संस्थानों की सहभागिता रही, जिसमें 25 कुलगुरू, 32 निदेशक, 5 प्राचार्य एवं 66 शिक्षाविद सहित कुल 128 प्रतिभागी शामिल हुए। संविमर्श का उद्घाटन मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन कर किया गया।
उद्घाटन सत्र के प्रारंभ में आयोग के सभापति डॉ. खेमसिंह डहेरिया द्वारा विमर्श की प्रस्तावना रखी गई। तत्पश्चात विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. एम. जगदीश कुमार द्वारा “विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025” के विभिन्न प्रावधानों पर एक विस्तृत प्रजेंटेशन प्रतिभागियों के समक्ष दिया गया।
मुख्य वक्ता प्रो. एम. जगदीश कुमार ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 शिक्षा प्रणाली को ‘नियंत्रण’ से हटाकर ‘सुविधा’ (Facilitation) की ओर ले जाने पर केंद्रित है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वर्तमान में हमारे शैक्षणिक संस्थान कई रेगुलेटर्स और अत्यधिक डेटा अनुपालन
Compliance) के बोझ तले दबे हुए हैं, जिससे उनकी नवाचार करने की क्षमता प्रभावित होती है। प्रस्तावित बदलावों का उद्देश्य एक ऐसी ‘लाइट बट टाइट’ (Light but Tight) नियामक व्यवस्था बनाना है, जहाँ संस्थानों को प्रशासनिक स्वतंत्रता (Autonomy) तो मिले, लेकिन वे पारदर्शिता और अकादमिक परिणामों के प्रति जवाबदेह भी रहें। यह स्वायत्तता संस्थानों के प्रदर्शन और शासन की गुणवत्ता से सीधे जुड़ी होगी।
उन्होंने विधेयक के बारे में बताते हुए कहा कि इस विधेयक में विनियामक परिषद, प्रत्यायन परिषद एवं मानक परिषद का प्रावधान कार्यात्मक पृथककरण के लिये किया गया है। इसमें राज्य का प्रतिनिधित्व, परिणाम आधारित दृष्टिकोण, क्रमबद्ध स्वायत्तता, पारदर्शिता का अनिवार्य प्रावधान, शैक्षणिक स्वतंत्रता, छात्र संरक्षण, जवाबदेही, स्वायत्तता का संरक्षण एवं उच्च शिक्षा के व्यवसायीकरण को रोकने के लिए आवश्यक प्रावधान किये गये हैं। यह स्वतंत्रता के बाद देश का पहला उच्च शिक्षा क्षेत्र का ऐसा विधेयक है जो देश के संघीय ढांचे को बरकरार रख रहा है साथ ही इसमें निजी क्षेत्र को भी उचित प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया गया है।
इसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव प्रत्यायन (Accreditation) की प्रक्रिया में प्रस्तावित है। अब तक यह प्रक्रिया केवल डेटा और इनपुट पर आधारित थी, लेकिन भविष्य में यह छात्रों के ‘लर्निंग आउटकम’ (सीखने के परिणाम) और उनके प्रदर्शन पर आधारित होगी। इसके लिए एक ‘स्टैंडर्ड्स काउंसिल’ की परिकल्पना की गई है जो राष्ट्रीय स्तर पर मानक तय करेगी, जिससे छात्रों के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य या एक संस्थान से दूसरे संस्थान में जाना आसान हो जाएगा। यह न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि वैश्विक स्तर पर भी भारतीय डिग्री की स्वीकार्यता और पोर्टेबिलिटी सुनिश्चित करेगा। इसके साथ ही, शिक्षकों की भूमिका को केवल कंटेंट देने वाले से बदलकर एक ‘मेंटर के रूप में विकसित करने पर ध्यान दिया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि 20 से 25 वर्ष की आयु के अधिकांश छात्र ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं जिनका प्राथमिक लक्ष्य अपनी डिग्री के बाद रोजगार प्राप्त कर अपने परिवार का भरण-पोषण करना होता है। इसलिए, शिक्षा केवल ‘सुपर स्पेशलाइज्ड’ होने के बजाय व्यावहारिक कौशल और इंटर्नशिप पर आधारित होना चाहिए। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025 का लक्ष्य एक समन्वित और परिणाम-उन्मुख सुधार ढांचा प्रदान करना है, जो संस्थानों को माइक्रोमैनेजमेंट से मुक्त कर उन्हें समाज और छात्रों के प्रति अधिक प्रभावी बनाएगा।
संविमर्श के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुये प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री श्री इन्दर सिंह परमार ने कहा कि विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक-2025 द्वारा उच्च शिक्षा संस्थान को संचालित करने हेतु विभिन्न प्रकार की जटिल अनुमतियों को समाप्त करते हुए एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जा रही है। अवसर मिलेगा तथा विसंगति भी समाप्त हो सकेगी। यह विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया है। इस विधेयक के लिए देश के लोगों से सुझाव भी मांगे जा रहे हैं। मध्यप्रदेश से भी सुझाव जाने चाहिए अतः सही तथ्यों के साथ में मध्यप्रदेश की बात जेपीसी तक पहुँचे। उन्होंने कहा कि शिक्षा में स्वायत्तता आवश्यक है किन्तु वह लक्ष्य आधारित होना चाहिए। विधेयक में मुख्य रूप से तीन पृथक-पृथक कार्यात्मक समिति बनाने का सुझाव है जो शिक्षा की गुणवत्ता एवं प्रशासनिक समन्वय को सुदृढ़ करेगा।
अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए प्रो. कैलाश चंद्र शर्मा, चेयरमेन हरियाणा हॉयर एजेकेशन काउन्सिल ने कहा कि वर्तमान समय में देश के उच्च शिक्षा संस्थानों को अलग-अलग निकायों के पास जाकर अपने आवश्यक विषयों को पूर्ण कराना होता है किंतु विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक 2025 भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में एक ऐसा महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार है जो पारदर्शिता, जवाबदेही, स्वायत्तता एवं परिणामोन्मुखी दृष्टिकोण पर बल देता है। उद्घाटन सत्र का संचालन विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. शशिरंजन अकेला तथा आभार प्रदर्शन आयोग के सचिव डॉ. देवेन्द्र सिंह गुर्जर ने व्यक्त किया।
संविमर्श के द्वितीय सत्र में विधेयक पर प्रतिभागियों द्वारा महत्वपूर्ण सुझाव दिये गये साथ ही विधेयक के संबंध में उठाये गये अनेक प्रश्नों का जिज्ञासा समाधान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली के पूर्व चेयरमेन प्रो. एम. जगदीश कुमार ने किया। समापन वक्तव्य देते हुए प्रो. कैलाशचंद्र शर्मा ने कहा इस प्रकार के संविमर्श उच्च शिक्षा क्षेत्र के सभी घटकों को नीतियों के प्रति स्पष्टता एवं प्रतिबद्धता देने में सहायक सिद्ध होंगे। द्वितीय सत्र का समन्वय डॉ. प्रज्ञेश कुमार अग्रवाल, संचालक, उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान द्वारा किया गया। सम्पूर्ण कार्यक्रम का आभार प्रदर्शन डॉ. शशिरंजन अकेला द्वारा किया गया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
समापन सत्र में विमर्श के आयोजक मध्यप्रदेश निजी विश्वविद्यालय विनियामक आयोग एवं विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान द्वारा यह घोषणा की गई कि आगामी सात दिवसों में विमर्श की अनुसंशाओं को जेपीसी एवं शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार को भेजा जायेगा।




