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यूजीसी के नियमों पर मचे बवाल के पीछे की क्या है सियासत? विश्लेषकों ने बताई असली कहानी

यूजीसी द्वारा लाए गए समता विनियम 2026 के नियमों का विरोध होने के बाद उसे वापस ले लिया गया। लेकिन इस पर जाति को लेकर राजनीति तेज हो रही है।

यूजीसी की ओर से उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए लाए गए ‘समता विनियम 2026’ पर इस हफ्ते जमकर बवाल हुआ। इन नियमों में सामान्य वर्ग को छोड़कर बाकी वर्गों के छात्रों को सुरक्षा देने के लिए कठोर नियम तय किए गए। इसी मुद्दे को लेकर सामान्य वर्ग के लोगों ने नियमों का गलत इस्तेमाल होने के डर जताया और इसे वापस लेने के लिए विरोध प्रदर्शन किया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जहां कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी। सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर सवाल उठाए, साथ ही इसे लेकर यूजीसी को नोटिस भी जारी किया। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, समीर चौगांवकर और राकेश शुक्ल मौजूद रहे।

राकेश शुक्ल: यूजीसी के नियम को लेकर विरोध नहीं हो रहा है। बल्कि जो विरोध कर रहे हैं वो अपने बचाव की गुहार लगा रहे हैं। समानता के अधिकार की अगर संविधान बात करता है तो नियमों में समानता होनी भी चाहिए। आंकड़े देखें तो एक करोड़ छात्रों पर करीब 60 से 65 शिकायतें आ रही हैं। इनका प्रतिशत देखें तो कितना निकलेगा। उस पर इस तरह के नियम बनाना कहां तक जायज है। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: नए नियम आए तो पहले ही दिन से पता चला गया था इसमें बवाल होगा। कौन शोषण करता है और कौन शोषित होता है उसमें से समान्य वर्ग को हटा दिया गया। कमेटी ने जो सिफारिशें की थीं, अंतिम गाइडलाइन उससे हटकर आईं। इस मामले में विशुद्ध राजनीति हो रही है। मुझे लगता है कि सरकार की मंशा भी इसमें राजनीति को साधन है। दोनों तरफ से इस पर जो राजनीति खेली जा रही है वो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।

समीर चौगांवकर: यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण रहा है। इस कमेटी में रविशंकर प्रसाद और बांसुरी स्वराज जैसे बड़े वकील शामिल थे, क्या उन्हें इसका आभास नहीं हुआ। सरकार को बाद में समझ आया, लेकिन सरकार ने इस पर चुप्पी साधे रखी। ये गलत फैसला था। सरकार को इस पर खेद प्रकट करना चाहिए और इसे वापस ले लेना चाहिए। मुझे लगता है कि 2024 नतीजों के बाद भाजपा ने स्थायी राजनीति के लिए एक व्यवस्था सुनिश्चित करना चाहती थी। मुझे लगता है इसीलिए यह कदम उठाया गया। अब सरकार के लिए ऐसी स्थिति हो गई है कि एक तरफ कुआं हैं और दूसरी तरफ खाई है।

विनोद अग्निहोत्री: कोई भी कानून, कोई भी नीति जो विभाजनकारी है, वो किसी भी देश और समाज के लिए नुकसानदेह होती है। कानूनों का दुरुपयोग होता है। दहेज कानून बना तो उसका दुरुपयोग हुआ तो वो खत्म नहीं हुआ। उसमें चेक डाले गए। इसी तरह दलित एक्ट का भी दुरुपयोग हुआ। उसमें में चेक डाले गए। लेकिन इन कानूनों के फायदे भी हुए हैं। देखना यह पड़ेगा कि इस नियम को ठीक करने की बात हो रही थी या इन्हें खत्म करने की बात हो रही थी। ये मामला दुधारी तलवार वाला है इस पर एक तरफा अप्रोच से काम नहीं चलेगा। ये ऐसा मसला है कि आप एक तरफ नहीं खड़े हो सकते हैं। उत्पीड़न किसी भी आधार पर हो वो नहीं होना चाहिए।

रामकृपाल सिंह: अटल जी ने कहा था कि विचारधारा के बूते हमें जितना गेन करना था कर लिया अब उसके आगे सोचना होगा। 2014 में जब सत्ता में आई तो ओबीसी का बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ आया। जो कुल आबादी का कम से कम 50 फीसदी है। ये जो नियम लाए गए वो विशुद्ध रुप से 2024 में जो हुआ उसकी वजह से है। जेपी का पहला नारा था जाति तोड़ो, लेकिन हुआ उसके उल्टा। दूसरी बात कानून की हमारे यहां अवधारणा है कि भले 99 अपराधी छूट जाएं, लेकिन एक भी निरअपराध को सजा नहीं मिले। लेकिन ये नियम उसके उलट था।

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