अहिल्याबाई होल्कर सभागार में अभिव्यक्त व्याख्यानमाला के अंतर्गत एक व्याख्यान का आयोजन किया गया।
इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं वक्ता राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नासिक परिसर के निदेशक प्रोफेसर नीलाभ तिवारी थे


क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, भोपाल के विस्तार शिक्षा विभाग के तत्वावधान में आज संस्थान के अहिल्याबाई होल्कर सभागार में अभिव्यक्त व्याख्यानमाला के अंतर्गत एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं वक्ता राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नासिक परिसर के निदेशक प्रोफेसर नीलाभ तिवारी थे। “भारतीय ज्ञान प्रणाली के परिप्रेक्ष्य में शिक्षा : एक मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण” विषय पर अपने उद्बोधन में प्रोफेसर तिवारी ने भारतीय शिक्षा के स्वरूप उसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और उसकी अभारतीयता के प्रयासों में अंग्रेजी राज की भूमिका पर विस्तृत प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 1833 के चार्टर ऐक्ट के बाद मैकाले की शिक्षा नीति ने भारत के साढ़े सात लाख गाँवों में विद्यमान सात लाख बत्तीस हजार गुरुकुलों को बंद कर दिया। ये गुरुकुल ऐसे थे जो बिना किसी राजकीय सहायता के स्वायत्तपूर्ण तरीके से प्रारम्भिक से लेकर उच्च शिक्षा तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करा रहे थे।यह शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क और समाज के सहयोग से दी जाती थी। शिक्षा की स्वायत्ता के लिए विद्यार्थी भिक्षाटन कर समाज का सहयोग लेते थे। मैकाले के निर्णय ने भारत की इस प्रतिष्ठित ज्ञान परंपरा को नष्ट कर दिया। ‘भारत’ शब्द की व्युत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि भारत अर्थात भा- ज्ञान के प्रकाश में रत- लगा देश । अतः भारत की परंपरा ही ज्ञान के खोज की रही है। हमने स्वयं को विश्वगुरु नहीं कहा अपितु दुनिया ने यह माना है। शिक्षा के भारतीय और अभारतीय होने के अपने विशेष अर्थ है। अंग्रेजों ने इसे समझा और एक अभारतीय शिक्षा तंत्र हम पर आरोपित कर दिया जिसके प्रहार से हम अभी भी उबर नहीं सके हैं। ‘नॉलेज’ शब्द ज्ञान का पर्याय नहीं है और संस्कृत भाषा सहित सभी भाषाओं में हर एक शब्द का अपना एक विशेष अर्थ होता है। इसलिए अंग्रेजी भाषा में भारतीय ज्ञान परंपरा को समझना संभव नहीं है। ज्ञान के अविद्या और विद्या रूपों को व्याख्यायित करते हुए उन्होंने कहा कि आज की प्रचलित शिक्षा व्यवस्था अविद्या तक ही सीमित है। किन्तु अविद्या की सीढ़ी चढ़कर ही विद्या (ब्रह्म ज्ञान) को जाना जा सकता है। वर्तमान शिक्षा विद्या के आदान- प्रदान की प्रक्रिया मात्र है। विद्यार्थी और शिक्षक के भेद को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति स्वयं के कल्याण के लिए अध्ययन करता है तब तक वह विद्यार्थी रहता है और जब वह दूसरों के कल्याणार्थ अध्ययन करता है तब वह शिक्षक बन जाता है। ज्ञान पारायण, आचार पारायण और समाज पारायण शिक्षक ही सही अर्थों में आचार्य कहलाने योग्य है। मनोविज्ञान को भारतीय दर्शन का अभिन्न अंग बताते हुए उन्होंने कहा कि मनोविज्ञान के सारे तत्व दर्शन में निहित है। चौदह करणों अर्थात पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और चार अंतःकरण-मन बुद्धि, चित्त और अहंकार, के माध्यम से हम ज्ञानार्जन कर सकते हैं। इन करणों की रक्षा और सुरक्षा के लिए ही सोलह संस्कारों की व्यवस्था भारतीय संस्कृति में की गयी है। आधुनिक शिक्षा ज्ञान तक नहीं अपितु ज्ञान के करणों की रक्षा तक में सक्षम नहीं है और मात्र उपकरणों तक सीमित रह गई है। इसलिए हमें शिक्षा के भारतीय स्वरूप को समझने की परम आवश्यकता है।
इसके पूर्व संस्थान के प्राचार्य प्रो.शिव कुमार गुप्ता एवं डीन प्रो जयदीप मंडल मुख्य समागत प्रो नीलाभ तिवारी का पुष्पगुच्छ और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। अपने स्वागत उद्बोधन में प्राचार्य प्रो. गुप्ता ने नववर्ष के इस व्याख्यान की प्रासंगिकता को उद्धत करते हुए कहा कि ऐसे व्याख्यान हमारे विद्यार्थियों में भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति उनकी सम्यक समझ का विकास करते हैं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 में निहितविद्यार्थी के समग्र विकास के उद्देश्यों की भी पूर्ति करते हैं।
इस कार्यक्रम का संचालन संस्थान के मुख्य विद्यार्थी सलाहकार डॉ सौरभ कुमार ने किया। इस अवसर पर संस्थान के अधिष्ठाता प्रो. जयदीप मंडल, विस्तार शिक्षा विभाग की अध्यक्ष प्रो. रतनमाला आर्या, डाॅ.सुरेश कुमार मकवाना , प्रो. एन.सी ओझा , प्रो.अश्वनी कुमार गर्ग, प्रो. प्रो. रश्मि सिंघई, डॉ. रश्मि शर्मा सहित संस्थान के समस्त विद्यार्थी और संकाय सदस्य उपस्थित थे।



