आचार्य शंकर न्यास द्वारा बसंत पंचमी पर ‘रसो वै सः : नृत्यारंभ’ का हुआ शुभारंभ
कलाकार नवरस के माध्यम से दर्शकों को 'ब्रह्मानंद सहोदर‘ तक ले जाता है : शुभदा वराडकर ब्रह्म स्वयं ही आनंद स्वरुप है,उसी कारण सम्पूर्ण जगत आनंदित हो रहा स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती



भोपाल, आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति विभाग द्वारा ‘एकात्म धाम’ में बसंत पंचमी के पावन अवसर पर आदि शंकराचार्य विरचित स्तोत्र पर केंद्रित ‘रसो वै सः : नृत्यारंभ’ का शुभारंभ स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती, सुप्रसिद्ध भरतनाट्यम नृत्यांगना डॉ. पद्मजा सुरेश, सुप्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना शुभदा वराडकर एवं नृत्य गुरु डॉ. लता सिंह मुंशी, साँची विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. यज्ञेश्वर शास्त्री एवं संस्कृति विभाग के अपर मुख्य सचिव शिवशेखर शुक्ला की गरिमामय उपस्थिति में दीप-प्रज्वलन के साथ हुआ।
कार्यक्रम की शुरुआत आचार्य शंकर विरचित शारदा भुजंग स्तोत्र ‘भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम्’ के गान एवं मेधासुक्त के साथ हुई।
इस अवसर पर स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती ने कहा कि ब्रह्म स्वयं ही आनंद स्वरूप है, उसी कारण सम्पूर्ण जगत आनंदित हो रहा है। भारतीय वाङ्मय के तैत्तिरीय उपनिषद् का उद्घोष ‘रसो वै सः’ केवल एक दार्शनिक सूत्र नहीं, बल्कि जीवन जीने की उस परम कला का आधार है जो मनुष्य को भौतिकता से ऊपर उठाकर आध्यात्मिक आनंद से जोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि प्रसन्नता बाहरी नहीं, बल्कि हमारे भीतर स्थित उस चेतन तत्व में है जो सदैव आनंदित है। तैत्तिरीय उपनिषद का यह दर्शन हमें ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ से जोड़ता है। यह जगत उस परम आनंद की ही अभिव्यक्ति है। कला, साहित्य, संगीत और प्रकृति में हम जिस सौंदर्य का अनुभव करते हैं, वह उसी ‘रसो वै सः’ का एक परिपूर्ण अभिव्यक्ति है।
विदुषी शुभदा वराडकर ने कहा कि भारतीय परंपरा में नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ‘साधना’ है। ‘रसो वै सः’ का अर्थ है कि वह परम तत्व आनंदस्वरूप है, और नृत्य उसी आनंद की दृश्य अभिव्यक्ति है। जब एक नर्तक मंच पर थिरकता है, तो वह केवल शरीर का संचालन नहीं करता, बल्कि नवरस के माध्यम से दर्शकों को उस ‘ब्रह्मानंद सहोदर तक ले जाता है।
डॉ. पद्मजा सुरेश ने बताया नृत्य की मुद्रा, लय, ताल आदि के माध्यम से नर्तक एक ऐसी अवस्था तक पहुंचता है जहाँ केवल मौन विद्यमान है। यही आनंद की उच्चतम अवस्था है। इस अवस्था में नर्तक अपने समक्ष साक्षात् ईश्वर का दर्शन करता है।
प्रो. कल्याण मुथुराजन ने शिव के ज्ञानस्वरूप भगवान दक्षिणामूर्ति के रूप व उसमें निहित सांकेतिक ज्ञान को प्रकट किया। उन्होंने बताया कि दक्षिणामूर्ति भगवान सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश आदि सभी को धारण किए हुए है। उन्होंने ज्ञानमुद्रा धारण की हुई है जो जीव और ब्रह्म के ऐक्य का प्रतीक है। डॉ.लता मुंशी ने कहा कि कलाएँ मनुष्य को संस्कारित एवं परिष्कृत करती हैं, उन्होंने कहा कि सात्विक अविनय के लिए चित्त की शुद्धि आवश्यक है। प्रो. यज्ञेश्वर शास्त्री ने आदि शंकराचार्य विरचित स्तोत्र सौन्दर्य लहरी के बारे में अपने विचार व्यक्त किए।
अंत में अपर मुख्य सचिव शिव शेखर शुक्ला ने कहा कि आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा भारतीय संस्कृति और वेदांत के मूल्यों को कला के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास सार्थक है।
ज्ञात हो कि न्यास द्वारा चयनित प्रतिभागी, विश्व-प्रसिद्ध नृत्यांगना पद्म विभूषण डॉ. पद्मा सुब्रह्मण्यम के मुख्य मार्गदर्शन में तथा नृत्य गुरु डॉ. लता मुंशी से आचार्य शंकराचार्य द्वारा रचित सौन्दर्य लहरी और दक्षिणामूर्ति स्तोत्र पर आधारित भरतनाट्यम् का तीन माह का प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।



