भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश और कानून मंत्री ने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में दुनिया की सबसे बड़ी अभ्यास अदालत का शुभारंभ किया
ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हुए अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 26 मौजूदा एवं पूर्व न्यायाधीश, यानी 13 न्यायाधीशों वाली दो पीठ के साथ-साथ अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल, तथा देश-विदेश के 200 से अधिक न्यायविदों ने इस आयोजन में अपनी बात रखी।


सोनीपत,’भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति श्री सूर्य कांत, और माननीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री, श्री अर्जुन राम मेघवाल ने दुनिया की सबसे बड़ी अभ्यास अदालत, न्यायाभ्यास मंडपम – भव्य मूट कोर्ट का उद्घाटन किया और इसे राष्ट्र को समर्पित किया। इस आयोजन में देश-विदेश के 200 से अधिक न्यायाधीशों तथा न्यायविदों की उपस्थिति में ईमानदार (वकालत, बातचीत, विवाद निर्णय, मध्यस्थता एवं समाधान हेतु अंतर्राष्ट्रीय मूटिंग अकादमी) का भी शुभारंभ किया गया। इसके अलावा, भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश ने ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता: अधिकारों, संस्थानों और नागरिकों पर तुलनात्मक विचार’ विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का भी उद्घाटन किया। इस खास मौके को यादगार बनाने के लिए माननीय मुख्य न्यायाधीश और कानून मंत्री ने एक पट्टिका का भी अनावरण किया।
दो दिनों तक चले इस सम्मेलन में, भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 26 वर्तमान और पूर्व न्यायाधीशों (जो 13-न्यायाधीशों की दो अलग-अलग पीठों में बैठे) के अलावा, भारत के 10 पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों के 10 मुख्य न्यायाधीशों, न्यायमूर्ति एवं पूर्व न्यायाधीशों, 14 अंतर्राष्ट्रीय न्यायाधीशों एवं न्यायविदों, 5 मंत्रियों एवं सांसदों, 61 वरिष्ठ अधिवक्ताओं, तथा 91 शिक्षाविदों एवं वकीलों ने अलग-अलग विषयों पर आयोजित सत्रों में भाग लिया और अपने-अपने विचार व्यक्त किए।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में इस विषय पर चर्चा हुई है कि, यह विचार भारतीय लोकतंत्र का मूल आधार कैसे है। एक नए आज़ाद देश और एक उभरते लोकतंत्र के रूप में, संविधान निर्माता यही चाहते थे कि न्यायपालिका बाहरी या आंतरिक शक्तियों के किसी भी प्रभाव के बिना अपना काम करे। यह विचार और इसे लागू करने का तरीका ही भारतीय संविधान का मूल ढाँचा है।
भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति श्री सूर्य कांत ने सम्मेलन और दुनिया की सबसे बड़ी अभ्यास अदालत का उद्घाटन किया और इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, “मैं ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल में बनी दुनिया की सबसे बड़ी अभ्यास अदालत के उद्घाटन की शुभकामनाएं देता हूँ। ईमानदारी ही वह आदर्श है, जिस पर कानून का अभ्यास और सही मायने में न्याय प्राप्त करने का प्रयास टिका हुआ है। आज के दौर में, जहाँ सच को ज्ञान से मुकाबला करना पड़ रहा है, जहाँ डीप फेक चीज़ों को तोड़-मरोड़कर पेश कर रहे हैं, झूठी खबरें बहुत फैल रही हैं, और डिजिटल अरेस्ट के मामले चिंताजनक रूप से आम बात हो गई है, वहाँ अब ईमानदारी और सत्यनिष्ठा ऊँचे आदर्श नहीं रहे। संविधान का मूल सिद्धांत की वजह से ही हमारा संविधान बिना अपनी पहचान खोए आगे बढ़ पाया है, ताकि वह नई बातों को अपनाए, पर अपने मूल विचार को न भूले। यह महत्वपूर्ण सम्मेलन हमें याद दिलाता है कि, किसी दस्तावेज़ की मूल संरचना बस अतीत की निशानी नहीं होती, बल्कि हमारे भविष्य की रूपरेखा तैयार करने का नक्शा होती है। हमारी संस्थाओं के आधुनिकीकरण और नए रास्ते खोलने के बावजूद, आम सहमति ही हमारे लोकतंत्र को निरंकुशता की ओर जाने से रोकती है। इसी आदर्श भावना को अब हमें 21वीं सदी के नए संवैधानिक मुद्दों के समाधान के तरीके में बदलना चाहिए, फिर बात चाहे गोपनीयता में डिजिटल दखलंदाज़ी की हो, सच्चाई को आकार देने में AI की भूमिका हो, या फिर पीढ़ियों के बीच न्याय की हमारी धारणाओं को परखने वाले जलवायु संकट की बात हो। संविधान की शक्ति बदलावों का विरोध करने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि हर बदलाव इसके मूलभूत वादों को निभाए: यानी, हर व्यक्ति की गरिमा, समता, स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा”
आयोजन के विशिष्ट अतिथि, श्री अर्जुन राम मेघवाल, माननीय कानून एवं न्याय राज्य मंत्री, भारत सरकार ने कहा, “नागरिक होने के नाते, संविधान में हमारी आस्था होनी ही चाहिए—यह विश्वास कि संविधान हमारे अधिकारों की रक्षा करता है और निरंकुश शासन से हमारी रक्षा करता है। हालाँकि, आज़ादी का मतलब यह नहीं है कि हम जो चाहें करें। यह सुनिश्चित करने के लिए कि हमारी न्यायपालिका सक्षम बनी रहे, सरकार हमारी कानूनी व्यवस्था को आधुनिक रूप देने के लिए अथक प्रयास कर रही है। हम ई-अदालत परियोजनाओं और AI से चलने वाले साधनों जैसी पहलों के ज़रिए एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जो पूरी तरह से भविष्य के लिए तैयार है, साथ ही भाषा से जुड़ी बाधाओं को भी दूर करने में मदद करेंगे। हमारी सभ्यता पूरी तरह से न्याय के प्रति समर्पित है, जो हमारे संविधान की संरचना में समाई हुई है। संविधान की प्रस्तावना, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय दिलाने का पक्का वादा करती है, जो सभी के लिए समानता, निष्पक्षता और गरिमा सुनिश्चित करने के एक समग्र दृष्टिकोण को दर्शाता है। डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि न्याय स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का साकार रूप है; यह मूल्य में समानता, अनुपात में निष्पक्षता, और शासन में सदाचार है। मैं जेजीयू (JGU) को दुनिया की सबसे बड़ी अभ्यास अदालत और आपके द्वारा चुने गए नाम ‘ईमानदार’ के लिए बधाई देता हूँ, जो दर्शाता है कि इस संस्थान की बुनियाद ज्ञान, न्याय और अपने कर्तव्य के प्रति ईमानदारी के सिद्धांत पर टिकी है।”
इस महत्वपूर्ण अवसर पर, भारत के माननीय राष्ट्रपति और भारत के माननीय उपराष्ट्रपति की ओर से प्रेरणादायक प्रशंसा संदेश प्राप्त हुए। इस समारोह को भारत के माननीय प्रधानमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी जी के एक संदेश से अतिरिक्त प्रोत्साहन मिला, जिसमें उन्होंने लिखा, “ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी, सोनीपत में ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता: अधिकारों, संस्थानों और नागरिकों पर तुलनात्मक विचार’ विषय पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के बारे में जानकर मुझे बेहद प्रसन्नता हुई है। सम्मेलन के साथ-साथ एक बड़ी अभ्यास अदालत का भी शुभारंभ हुआ, जिसमें दुनिया भर के जाने-माने न्यायविदों की भागीदारी, सही मायने में बेहतर तालमेल बनाने का शानदार अवसर है। यह इस क्षेत्र के अनुभवी और वरिष्ठ लोगों के लिए भी अवसर है, जहाँ वे युवा छात्रों के साथ उत्साहजनक संवाद कर सकते हैं, उन्हें मार्गदर्शन दे सकते हैं, साथ ही हमारी युवा शक्ति की ऊर्जा को आत्मसात कर सकते हैं। हमारे युवाओं में न्याय सुनिश्चित करने का उत्साह और अपने संविधान पर गर्व का भाव जगाना, उन्हें जीवन भर लोकतांत्रिक आदर्शों को मज़बूत करने के लिए प्रेरित करेगा। शासन व्यवस्था के एक स्तंभ के रूप में, हमारे लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है। गाँव के बुजुर्गों के न्याय से लेकर आधुनिक अदालतों तक, निष्पक्ष और समय पर न्याय देना एक ऐसा आदर्श है जिसे हमारे समाज ने सदैव पवित्र माना है। न्याय दिलाने की व्यवस्था का एक सबसे अहम हिस्सा यह है कि, न्याय को लोगों तक इस तरह पहुँचाया जाए कि गरीब से गरीब व्यक्ति को भी सहजता से न्याय मिल सके। मैं पूरी तरह आश्वस्त हूँ कि ऐसे सम्मेलन हमारी न्यायपालिका, कानून बिरादरी और अन्य सभी संबंधित पक्षों के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों को एक जगह लाएँगे, जिससे हमारी न्याय दिलाने की व्यवस्था आम लोगों पर और ज़्यादा केंद्रित हो जाएगी।”
ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक कुलाधिपति एवं माननीय सांसद, श्री नवीन जिंदल ने भारत के माननीय मुख्यालय न्यायाधीश, कानून राज्य मंत्री और अन्य गणमान्य हस्तियों का स्वागत किया और कहा, “न्यायमूर्ति श्री सूर्यकांतजी इस क्षेत्र की धरती के पहले सपूत हैं, जो हिसार से कुरुक्षेत्र होते हुए, देश के सर्वोच्च न्यायिक पद तक पहुँचे हैं। उनका शैक्षणिक यात्रा और न्याय के क्षेत्र में उनका सफ़र हरियाणा की बौद्धिक क्षमता के साथ-साथ उन संवैधानिक संभावनाओं को दर्शाती है, जिसके द्वारा तब खुलते हैं जब संस्थाएँ ईमानदारी से प्रतिभा को आगे बढ़ाती हैं। भारत का नागरिक होने के नाते, मेरी हार्दिक इच्छा थी कि हर भारतीय को राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार मिले, और 2004 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले में राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अधिकार को संविधान में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताया गया और पहली बार हम भारतीयों को राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार मिला। न्यायपालिका की आज़ादी को अपनी असली ताक़त उस मौन भरोसे से मिलती है, जो लोग अदालतों के प्रति रखते हैं। यह भरोसा कि न्यायपालिका सिद्धांतों पर टिकी रहेगी, निष्पक्ष और निडर रहेगी, भले ही उसके सामने कोई भी खड़ा हो। यही भरोसा न्यायपालिका को उसकी नैतिक शक्ति प्रदान करता है, जो विधि के शासन में मज़बूती से स्थापित है। भारत की न्याय व्यवस्था दुनिया की सबसे सम्मानित व्यवस्थाओं में से एक है। अब आगे की राह कार्यप्रणाली में सुधार, मध्यस्थता एवं ADR का ज़्यादा उपयोग, और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहित टेक्नोलॉजी के अधिक समझदारी से उपयोग में निहित है, जिसे कानून निर्माताओं, न्यायपालिका, बार और शैक्षणिक संस्थाओं के बीच करीबी सहयोग का समर्थन प्राप्त हो। हमारे जैसे विश्वविद्यालयों को लोकतंत्र की प्रयोगशाला की भूमिका निभाई चाहिए, जहाँ सामने आने वाले नए विचारों को कसौटी पर परखा जाए, आदर्शों को मज़बूती मिले, और आने वाली पीढ़ी लोगों की सेवा के लिए तैयार हो।”
ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संस्थापक उप-कुलपति, प्रोफेसर (डॉ.) सी. राज कुमार ने इस विशेष अवसर पर उपस्थित सभी सम्मानित लोगों का स्वागत किया और कहा, “यह सही मायने में शिक्षा, लोकतंत्र और हमारे संस्थानों की शक्ति का उत्सव मनाने का अवसर है। JGU और JGLS के परिसर में दुनिया की सबसे बड़ी अभ्यास अदालत का उद्घाटन करके, हमने इस बात को स्वीकार किया है कि विधि के शासन और न्याय की सुलभता की नींव उन शैक्षणिक संस्थाओं में रखी जाती है जहाँ भारत और दुनिया के युवा शिक्षा प्राप्त करते हैं। किसी लॉ स्कूल और विश्वविद्यालय के परिसर में भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश और कानून मंत्री के साथ-साथ माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 26 मौजूदा और पूर्व न्यायाधीशों की मौजूदगी अभूतपूर्व भी है और ऐतिहासिक भी। JGU में लॉ की पढ़ाई कर रहे छात्र, पढ़ाने वाले प्राध्यापक और अन्य मार्गदर्शक भारत और दुनिया के भविष्य को संवारेंगे। हमारे कुलाधिपति एवं संरक्षक, श्री नवीन जिंदल का कानून के शासन को मजबूत करने में योगदान, हमारे परिसर में दुनिया की सबसे बड़ी अभ्यास अदालत की स्थापना के इस प्रयास से शिखर पर पहुँच गया है। यह पहल भारत के पहले संविधान म्यूज़ियम की स्थापना की उस पहल पर आधारित है, जिसका उद्घाटन 2024 में भारत के संविधान को अपनाने की 75वीं सालगिरह पर किया गया था। ईमानदार के शुभारंभ की आज की पहल से लॉ की पढ़ाई कर रहे छात्रों और वकीलों के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण तक पहुँच सुलभ हो जाएगी। इस तरह, वे ऐसे ज्ञान और कौशल हासिल कर सकेंगे, जिससे वे कानूनी क्षेत्र में उत्कृष्टता को आगे बढ़ाने के लिए सक्षम और पूरी तरह समर्पित होने के साथ-साथ नेतृत्वकर्ता बन सकें।”
भारतीय बार काउंसिल के अध्यक्ष एवं माननीय सांसद, श्री मनन कुमार मिश्रा ने कहा, “मुझे हमारे संवैधानिक लोकतंत्र के दो अभिन्न स्तंभों: न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्याय की सुलभता पर बोलने का सौभाग्य मिला। ये महज़ कानूनी सिद्धांत नहीं हैं। ये कानून के शासन की जीवनदायिनी शक्ति हैं। ये अधिकारों की हिफ़ाज़त करने वाला सुरक्षा कवच है। सच्ची आज़ादी सिर्फ़ संवैधानिक सुरक्षा के उपायों से नहीं मिलती। इसके लिए न्यायिक साहस, नैतिक ईमानदारी और पेशेवर दक्षता भी ज़रूरी है। निर्भीक होकर काम करने वाला विधिज्ञ परिषद एक निर्भीक न्यायपीठ सुनिश्चित करता है। वकील केवल मामलों को प्रस्तुत करके नहीं, बल्कि सत्य को कायम रखकर, अन्याय को उजागर करके और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करके न्यायालय की सहायता करते हैं। एक स्वतंत्र न्यायपालिका केवल एक स्वतंत्र, नैतिक, सशक्त, स्वाधीन और सक्षम विधिज्ञ परिषद के साथ मिलकर ही फल-फूल सकती है।”
इस कार्यक्रम में केशवानंद भारती मामले का ऐतिहासिक मंचन और भारतीय संवैधानिक इतिहास पर इसके प्रभाव को देखा गया, जिसमें इस ऐतिहासिक मामले की विरासत को उजागर करने के साथ-साथ न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में इसकी भूमिका पर भी विचार किया गया। इसका मंचन श्री आर. वेंकटरमणी, भारत के अटॉर्नी जनरल; श्री तुषार मेहता, भारत के सॉलिसिटर जनरल; डॉ. अभिषेक एम. सिंघवी, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता; और श्री सिद्धार्थ लूथरा, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता, द्वारा किया गया।
मंचन के बाद हुई अभूतपूर्व ऐतिहासिक चर्चा में, 13-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा विचार प्रस्तुत किए गए, जिसमें केशवानंद भारती मामले की विरासत और न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर प्रकाश डाला गया। केशवानंद भारती मामले में 24 अप्रैल 1973 को फ़ैसला दिया गया, जो भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय का एक ऐतिहासिक निर्णय है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक निर्णय में, संविधान की मूलभूत संरचना के सिद्धांत को स्थापित किया, जिसके अनुसार संविधान की कुछ मौलिक विशेषताओं, जैसे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघ व्यवस्था, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और विधि के शासन में संसद द्वारा संशोधन नहीं किया जा सकता है। माननीय न्यायालय ने यह भी माना कि न्यायिक समीक्षा की शक्ति संविधान की मूल संरचना का अभिन्न अंग है, जिसे संसद द्वारा संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से छीना नहीं जा सकता है।
इतिहास रचने वाली इस पहल में, भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश, न्यायमूर्ति श्री सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली 13 न्यायाधीशों की पीठ, जिसमें भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 12 न्यायाधीश — माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती बी.वी. नागरत्ना, माननीय न्यायमूर्ति श्री एम.एम. सुंदरेश, माननीय न्यायमूर्ति श्री पी.एस. नरसिम्हा, माननीय न्यायमूर्ति श्री दीपांकर दत्ता, माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय करोल, माननीय न्यायमूर्ति श्री राजेश बिंदल, माननीय न्यायमूर्ति श्री अरविंद कुमार, माननीय न्यायमूर्ति श्री प्रशांत कुमार मिश्रा, माननीय न्यायमूर्ति श्री ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, माननीय न्यायमूर्ति श्री एन. कोटिश्वर सिंह, माननीय न्यायमूर्ति श्री आर. महादेवन और माननीय न्यायमूर्ति श्री जॉयमाल्या बागची शामिल थे, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन – 29 नवंबर 2025 को – अपनी मौजूदगी दर्ज की तथा केशवानंद भारती मामले की प्रस्तुति पर अपने विचार साझा किए।
सम्मेलन के दूसरे दिन, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के 13 मौजूदा एवं पूर्व न्यायाधीशों की एक और पीठ ने, जिसमें माननीय न्यायमूर्ति श्री सौरभ के. भट्टी, माननीय न्यायमूर्ति श्री प्रसन्ना बी. वराले, माननीय न्यायमूर्ति श्री एम.एम. सुंदरेश, माननीय न्यायमूर्ति श्री अतुल एस. चंदुरकर, माननीय न्यायमूर्ति श्री डी.के. जैन, माननीय न्यायमूर्ति श्री स्वतंत्र कुमार, माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती रंजना पी. देसाई, माननीय न्यायमूर्ति श्री मदन बी. लोकुर, माननीय न्यायमूर्ति श्री यू.यू. ललित, माननीय न्यायमूर्ति श्रीमती इंदिरा बनर्जी, माननीय न्यायमूर्ति श्री हेमंत गुप्ता, और माननीय न्यायमूर्ति श्री अजय रस्तोगी शामिल थे, जिन्होंने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के चार छात्रों: सुश्री जियाना बजाज, श्री अक्षत इंदुशेखर, सुश्री परिधि जैन और श्री हर्ष के. द्वारा प्रस्तुत अभ्यास कार्यवाही की अध्यक्षता की।
सम्मेलन के दूसरे दिन, 30 नवंबर को, जिंदल स्कूल ऑफ़ गवर्नमेंट एंड पब्लिक पॉलिसी के डीन, प्रोफेसर आर. सुदर्शन ने भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक विकास के बारे में जानकारी दी, और प्रोफेसर (डॉ.) एस.जी. श्रीजीत ने केशवानंद भारती मामले के न्यायिक सिद्धांतों के आधार के बारे में बताया।
प्रोफेसर (डॉ.) दीपिका जैन, कार्यकारी डीन ने जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल का परिचय दिया और ओ.पी. जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार, प्रोफेसर दबीरू श्रीधर पटनायक ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।



