संपादकीय

अरावली की रक्षा के लिए तत्काल कार्रवाई जरूरी: सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा से गंभीर खतरा – डॉ. विनीत तिवारी

अखिल भारतीय पर्यावरण कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष व पर्यावरण बचाओ आंदोलन के राष्ट्रीय संयोजक डॉ. विनीत तिवारी ने अरावली पर्वतमाला की नवंबर 2025 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार की गई नई ऊंचाई-आधारित परिभाषा पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कड़े शब्दों में कहा है कि अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो उत्तर भारत की जल सुरक्षा, जलवायु संतुलन और थार रेगिस्तान के पूर्व की ओर विस्तार को रोकने में जीवनरक्षक की भूमिका निभाती है। यह दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हरी फेफड़े है, जो भूजल रिचार्ज करती है, धूल भरी आंधियां रोकती है, जैव विविधता की रक्षा करती है और लाखों लोगों के जीवन को सहारा देती है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 20 नवंबर 2025 को स्वीकार की गई नई परिभाषा – जिसमें स्थानीय स्तर से केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची भूमि को ही अरावली पहाड़ियां माना गया है – इस प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक गंभीर खतरा बन गई है।
पर्यावरणविदों, विशेषज्ञों और न्याय मित्र की चेतावनियों के बावजूद, यह परिभाषा अरावली के बड़े हिस्से – विशेष रूप से निचली ढलानों, छोटी पहाड़ियों और झाड़ीदार वन क्षेत्रों – को कानूनी संरक्षण से बाहर कर सकती है, जो पारिस्थितिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण हैं। दशकों से चले अवैध खनन, अतिक्रमण और वनों की कटाई ने पहले ही अरावली को भारी क्षति पहुंचाई है – राजस्थान में 25 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पहले ही नष्ट हो चुका है। अब यह नई परिभाषा अवैध खनन, रियल एस्टेट और निर्माण को बढ़ावा दे सकती है, भूजल स्तर को और गिरा सकती है, धूल भरी आंधियां बढ़ा सकती है, रेगिस्तानीकरण को तेज कर सकती है और दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सहित राजस्थान, हरियाणा व गुजरात में जल संकट व प्रदूषण को गंभीर बना सकती है। गुरुग्राम, उदयपुर, जयपुर जैसे शहरों में हो रहे प्रदर्शन, अरावली बचाओ अभियान का सोशल मीडिया पर वायरल होना और जनता की पुकार से स्पष्ट है कि यह मुद्दा राष्ट्रीय चिंता का विषय बन चुका है।

सरकार व सर्वोच्च न्यायालय का दावा है कि नई खदानें नहीं दी जाएंगी और मुख्य क्षेत्र सुरक्षित हैं, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है – अवैध खनन जारी है और पारिस्थितिक अखंडता खंडित हो रही है। हमें पूर्ण पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और जलवायु आधार पर अरावली की परिभाषा अपनानी चाहिए, न कि केवल ऊंचाई पर। अवैध खनन पर कठोरतम कार्रवाई, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, अरावली हरी दीवार परियोजना को तेज करना और संपूर्ण अरावली को पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करना आवश्यक है। अखिल भारतीय पर्यावरण कांग्रेस सभी पर्यावरण प्रेमियों, संगठनों और नागरिकों से अपील करती है कि हम सब एकजुट होकर अरावली बचाओ अभियान को मजबूत करें। प्रकृति की रक्षा ही मानवता की स्वास्थ्य, जीवन शैली और भविष्य की रक्षा है। जब तक अरावली पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो जाती और इस परिभाषा की पुनर्समीक्षा नहीं हो जाती, हमारा संघर्ष जारी रहेगा।

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