अध्यात्मखबरमध्य प्रदेश

सन्मति ही क्षमा का सन्देश दे सकती है- पं अरविंद  शास्त्री

श्री 1008 भगवान् महावीर दिगम्बर जैन मंदिर साकेत नगर में दसलक्षण पर्व पर अनेकों धार्मिक अनुष्ठान के साथ ही समाज के सभी आयु वर्ग के लिए विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जा रहा है उसी के अन्तर्गत आयोजित फैंसी ड्रेस प्रतियोगिता में बच्चों ने जैन धर्म से सम्बंधित विभिन्न अनुकरणीय व्यक्तित्व पर आधारित रूप धारण किये और मनमोहक शिक्षाप्रद सन्देश दिए। हेमलता जैन ‘रचना’ ने बताया कि नित्य नियम पूजन-अर्चन, अभिषेक, विधान आदि के उपरान्त दसलक्षण पर्व के पहले दिन डॉ. अरविन्द शास्त्री जी ने अपने उद्बोधन में उत्तम क्षमा धर्म पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ‘सन्मति ही क्षमा का सन्देश दे सकती है, दुर्मती में तो इसे समझने की पात्रता ही नहीं होती। क्षमा एक ऊँचा उदाहरण है जो समुन्नत संस्कृति के धर्मकोष के ह्रदय में पाया जाता है।
क्षमा को विचारों तक सीमित ना रखें वरन इसे आचरण एवं आस्था का विषय बनाए। पानी पीने के लिए है, कलश में भरकर रखने के लिए नहीं। उसकी शीतलता कंठ को चाहिए, जलाशय को नहीं। इस युग ने क्षमा के पाठ तो बहुत पढ़ और सुन लिए और सुने भी जा रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि उन पढ़े और सुने हुए शब्दों को मनन करते हुए अमल में लाया जाये क्योंकि कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) घटाए बिना जीवन में धर्म (आत्म स्वभाव) को प्रगट नहीं किया सकता।
क्षमा धर्म की छाया है। जिस प्रकार गर्मी से संतप्त प्राणी वृक्ष की छाया को पाकर परम शान्ति की अनुभूति करता है ठीक वैसे ही जिसका जीवन यथार्थ में धर्ममय होता है उसकी संगति को पाकर दुष्ट मनुष्य भी अपनी दुर्जनता छोड़ देता है। आज का मनुष्य अपने को बहुत ही सामर्थ्यवान और शक्तिशाली समझता है लेकिन जैसे ही क्रोध आता है वैसे ही वह क्रोध के वशीभूत होकर कमजोर हो जाता है और शारीरिक बल में कमजोर चेतन अथवा अचेतन वस्तु के प्रति अपना गुस्सा उतारता है यह व्यवहार उस क्रोधी मनुष्य की कमजोरी को दर्शाता है।

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