मिट्टी के गणेश का आध्यात्मिक, वैज्ञानिक एवं पर्यावरणीय महत्व

भारत उत्सवों का देश है। यहाँ वर्ष भर विभिन्न अवसरों पर त्यौहार मनाए जाते हैं। विविध प्रांतों की परंपराएँ और रीति-रिवाज जीवन को आनंद और ऊर्जा से भर देते हैं। इन परंपराओं से जहाँ श्रद्धा और भक्ति का भाव जुड़ा है, वहीं इनके पीछे गहरे वैज्ञानिक, आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश भी निहित हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने समय की कसौटी पर खरे उतरे ऐसे पर्व निर्धारित किए, जिनसे जीवन के साथ-साथ पर्यावरण और समाज दोनों का कल्याण होता है।
इसी क्रम में भाद्रपद मास में मनाया जाने वाला गणेश उत्सव विशेष उल्लेखनीय है। दस दिनों तक चलने वाले इस पर्व में भगवान गणेश को मिट्टी की प्रतिमाओं के माध्यम से घर-घर और सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित कर विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। तत्पश्चात निकटस्थ जलाशयों में इनका विसर्जन किया जाता है। स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इस पर्व को सार्वजनिक रूप देने की परंपरा शुरू की थी, जिससे समाज में एकता और जागरूकता का संचार हुआ।
*पर्यावरणीय दृष्टिकोण*
प्राचीन काल में गणेश प्रतिमाएँ शुद्ध मिट्टी से बनाई जाती थीं, जो विसर्जन के बाद पर्यावरण को कोई क्षति नहीं पहुँचाती थीं। लेकिन वर्तमान समय में बड़ी संख्या में बनने वाली प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) की मूर्तियाँ और रासायनिक रंग नदियों, तालाबों और झीलों में प्रदूषण फैला रहे हैं। इससे जल का स्तर गिर रहा है और जलीय जीव-जंतु तथा वनस्पतियाँ बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। इन रंगों में पाया जाने वाला सीसा, जस्ता और अन्य रसायन मनुष्य और पशुओं के स्वास्थ्य पर भी घातक असर डालते हैं।
*गायत्री परिवार की पहल*
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा और जागरूकता के कारण समाज में एक सकारात्मक बदलाव आया है। इसी कड़ी में अखिल विश्व गायत्री परिवार ने भी मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देने का अभियान चलाया है। संस्था द्वारा प्राकृतिक रंगों से सजी मिट्टी की प्रतिमाएँ बनाने का प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि विसर्जन के समय ये प्रतिमाएँ पानी में सहजता से घुल जाएँ और पर्यावरण को कोई हानि न हो।
गायत्री परिवार ने एक अनोखी पहल भी की है—“वृक्ष गणेश मूर्ति”। इसमें प्रतिमा के भीतर फलदार एवं छायादार वृक्षों के बीज रखे जाते हैं। विसर्जन के बाद जब मिट्टी गमले या खेत में बैठ जाती है तो कुछ समय बाद बीज अंकुरित होकर पेड़ का रूप ले लेते हैं। इस प्रकार गणेश पूजा के साथ-साथ वृक्षारोपण का पुण्य कार्य भी सम्पन्न हो जाता है।
*समाज की बढ़ती जागरूकता*
दैनिक भास्कर समूह की “मिट्टी के गणेश, घर में ही विसर्जन” जैसी पहल से भी समाज में बड़ी जागरूकता आई है। आज लोग मिट्टी के गणेश की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जिससे उनकी मांग लगातार बढ़ रही है। गायत्री परिवार इस अभियान का समर्थन करते हुए अपने कार्यक्रमों में इसका प्रचार-प्रसार कर रहा है।
*समापन संदेश*
गायत्री परिवार का स्पष्ट संदेश है—यदि हर घर में देसी मिट्टी की गणेश प्रतिमाएँ स्थापित होंगी, तो भगवान गणेश भी प्रसन्न होंगे और धरती माता भी संतुष्ट होंगी। पर्यावरण शुद्ध रहेगा, जल जीवन संरक्षित होगा और वृक्षारोपण से आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वातावरण का उपहार मिलेगा।
विशेष मिट्टी के गणेश जी की मूर्ति गायत्री शक्तिपीठ एम पी नगर भोपाल के साइड वाले रोड पर खरगोन से मूर्तिकारों 4 स्टाल लगाकर उपलब्ध कराई है।।