एजुकेशनखबरमध्य प्रदेश

देश में आजादी की भावना को प्रबल बनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा महोत्सव की जरुरत 

आज भारत की आजादी का दिन है। अभी भी भारतीय राष्ट्रीय परम्परा को सक्रिय सहयोग करने के लिए , आजादी का पर्व मनाने के लिए व्यवस्था स्वरुप आदेश जारी किए जाते हैं। आख़िर कब मिलेगी इस तरह आदेश देने और मानने की व्यवस्था से मुक्ति? कभी मिलेगी भी या नहीं?

मेरे विचार से कोई भी बंधन नहीं चाहता है। सबको मुक्ति चाहिए। भारत को मुक्ति मिल गई थी 15 अगस्त 1947 को । यही मुक्ति पाने की ख़ुशी का भाव पैदा करने के लिए प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस समारोह आयोजित करने के लिए हर स्तर पर आदेश जारी किए जाते हैं।78 वर्ष बाद भी आदेश…?
आजादी कोई भोग विलास की चीज नहीं होती ; एक जरुरत थी जो आज और अधिक बढ़ गई है। अब तो हर कोई एक दूसरे को जायज नाजायज तरीके से आदेश देने के लिए बेताब नजर आ रहा है। सरकार अभी भी आदेश की वशीभूत है। आदेश जारी करने वाला बड़ा और आदेश पाने वाले को छोटा। वाह री स्वतंत्रता।
आजादी का अर्थ जाने समझे बिना ही हम सभी लगातार उसी व्यवस्था में ढले हुए हैं जो आजादी के पहले से है। पहले अंग्रेज़ अधिकारी बड़े बनकर भारतीय जनता को अपने मनमाने तरीके से आदेश जारी करते थे अब भारतीय अधिकारी आदेश दे रहे हैं।व्यवस्था तो यथावत ही है।
आजादी अब किससे चाहिए । क्या हमें अप्रिय स्थिति से मुक्ति मिल सकती है ? क्या हमें भावनात्मक कचरे से मुक्ति मिल सकती है? क्या हमें भय और चिंता से मुक्ति मिल सकती है? क्या हमें निरर्थक आदेशों से मुक्ति मिल सकती है? क्या हमें परेशान करने वाले विचारों और लोगों से मुक्ति मिल सकती है?
मेरा उत्तर हां है। हां हमें सबसे मुक्ति मिल सकती है। मुक्ति या मोक्ष कुछ और नहीं आजादी का मनोभाव है। सब आजादी चाहते हैं। बच्चे भी आजादी चाहते हैं लेकिन सब बच्चों को गुलाम बना रहे हैं। बच्चे कुछ और करना चाहते हैं हम सब कुछ और कर रहे हैं। यह गुलामी का भाव बचपन से ही बैठाया जाता है दिमाग में। जब तक कोई आदेश नहीं मिलेगा, कुछ नहीं करेंगे। यही कारण है कि आजादी का पर्व मनाने के लिए भी विधिवत आदेश जारी किए जाते हैं।
गुलामी केवल शारीरिक नहीं, मानसिक स्तर पर ज्यादा होती है। दोनों तरह की गुलामी एक दूसरे को पैदा करती हैं और पुष्ट भी। गुलामी के भाव को पहले मन से समाप्त करना चाहिए जिस दिशा में हम सब उसी स्थान पर खड़े हैं जहां पर अंग्रेजों ने छोड़ा था। एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ पाए हम।
अभी भी भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा उप निवेश वाद से ग्रसित है। गुलामी इसका आधार है। इतने वर्षों बाद भी हम विदेशी विश्व विद्यालय की उपाधि के कायल हैं। हमारी मेधा अभी भी गिरवी रखी है। हमें अपने पर भरोसा नहीं है फिर क्यों आजादी का पर्व मनाने के लिए तैयार हो गए हैं हम? न मनाएंगे 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस तो….? आख़िर इस रस्म अदायगी से कब मुक्त होंगें हम ?
भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा महोत्सव का प्रस्ताव यह है कि हम भारत के उस शिक्षाविद् को आज़ादी का प्रतीक मानें जिसने 1885 में जन्म लिया और 1939 में जिसका जीवन पूर्ण हो गया। हां मैं बच्चों के गांधी और मूंछाली मां कहे जाने वाले शिक्षा नायक गिजू भाई जी के दर्शन, विचार और कार्य को सहज स्वीकार करने की दिशा में सक्रिय सहयोग करने की बात कर रहा हूं। बाल देव की सरल और सरस ढंग से निरंतर उपासना करने वाले गिजू भाई आज गुलामी से आज़ादी के प्रतीक हो सकते हैं।
भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा महोत्सव में गिजू भाई जी के विचारों पर चर्चा करेंगे और अपनाने की रणनीति बनाई जाएगी तो देश में शिक्षा से आज़ादी का पर्व हर्षोल्लास पूर्वक आयोजित करने की भावना बलवती होने से फिर 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह आयोजित करने के लिए आदेश या अनुरोध की जरुरत नहीं होगी। इसके लिए सभी शिक्षकों को शिक्षाविद् गिजू भाई जी के दर्शन विचार और कार्य को स्वीकार करने की दिशा में सक्रिय पहल करनी चाहिए।

जगदीश यादव प्रदेश अध्यक्ष राज्य शिक्षक संघ मध्य प्रदेश

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