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मौत को मात देकर बने ‘कैंसर वारियर्स’, ये सच्ची कहानियां बढ़ाएंगी आपका हौसला

कैंसर का शब्द डर पैदा कर देता है, लेकिन जब हौसले मजबूत हों तो यही बीमारी हार मानने को मजबूर हो जाती है। विश्व कैंसर दिवस पर उन जांबाजों की आत्मकथा सामने है। जिन्होंने दर्द, डर और अनिश्चितता के बीच भी जिंदगी से हार नहीं मानी। उनकी जीत आज लाखों लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी बन रही है।

कैंसर का शब्द डर पैदा कर देता है, लेकिन जब हौसले मजबूत हों तो यही बीमारी हार मानने को मजबूर हो जाती है। विश्व कैंसर दिवस पर उन जांबाजों की आत्मकथा सामने है। जिन्होंने दर्द, डर और अनिश्चितता के बीच भी जिंदगी से हार नहीं मानी। इलाज की कठिन राह, कीमो की पीड़ा और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद इन योद्धाओं ने यह साबित कर दिया कि यह एक बीमारी ही है लेकिन अंत नहीं। उनकी जीत आज लाखों लोगों के लिए उम्मीद की रोशनी बन रही है।

चंद्रकला : बेटे ने बताया, चिकित्सक बोले थे 1 माह जिएंगी

बिजलीघर के पास रहने वाली 73 वर्षीय चंद्रकला पत्नी बहादुर सिंह के लिए बीते एक साल का समय दर्द और अनिश्चितता में गुजरा। बेटे राकेश सिंह राजावत ने बताया कि मां को पहले पेट दर्द हुआ। निजी अस्पताल में जांच में पित्त की थैली में पथरी और पीलिया बताया गया। इलाज से आराम नहीं मिला तो जयपुर में जटिल ऑपरेशन कराया गया, जहां कैंसर की आशंका जताई गई। बायोप्सी रिपोर्ट में तीसरी स्टेज का कैंसर निकला। दोबारा एमएमएस हॉस्पिटल पहुंचे तो ऑपरेशन से पहले ही कैंसर चौथी स्टेज में पहुंच चुका था और पेट में कई गांठे बन गई थी।

महावीर कैंसर हॉस्पिटल में ऑपरेशन से मना कर दिया गया। जयपुर में दो कीमोथैरेपी भी कराई गई, लेकिन चिकित्सकों ने एक माह का समय बताया। इलाज पर काफी खर्च हो चुका था और दर्द असहनीय था। थक हारकर परिजन आरबीएम अस्पताल पहुंचे और कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. चरण सिंह चौधरी से संपर्क किया। इलाज शुरू होने के बाद दर्द कम हुआ, भूख लौटी और अब चन्द्रकला स्वयं खाना खा रही हैं व चल-फिर सकती है। बेटे बताया कि जिसे एक माह का समय दिया गया था, वह अब फिर मुस्कुराने लगी हैं और जिंदगी की जंग लड़ रही है।

नाहर सिंह : खाना भी हो गया मुश्किल, अब जी रहे सामान्य

कुम्हेर क्षेत्र के गांव चिमनी निवासी के 63 वर्षीय नाहर सिंह पुत्र छीतर सिंह के लिए बीता एक साल संघर्ष भरा रहा। जून माह में मुंह में मामूली छाले हुए, जिन्हें शुरुआत में सामान्य समझा गया। कुछ ही दिनों में छाले गंभीर हो गए, जीभ टेढ़ी हो गई और खाना-पीना तक मुश्किल हो गया। दर्द और कमजोरी से हालत बिगड़ती चली गई।

पुत्र नरेन्द्र सिंह ने बताया कि पिता को जयपुर के महावीर कैंसर हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां जांच में मुंह का कैंसर सामने आया। इसके बाद कई जगह इलाज कराया गया और देशी दवाओं तक का सहारा लिया गया, लेकिन राहत नहीं मिली।

टेढ़ी हो चुकी जीभ फिर हो गई सामान्य

एक परिचित की सलाह पर परिजन उन्हें आरबीएम अस्पताल लेकर पहुंचे और कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. चरण सिंह चौधरी से संपर्क किया गया। उस समय नाहर सिंह की हालत बेहद खराब थी, बोलना और मुंह खोलना भी कठिन था। डॉ. चरण सिंह ने तुरंत कीमोथैरेपी कराई, सिकाई को जयपुर भेजा गया। नियमित दवाइयों से धीरे-धीरे हालत सुधरने लगी। टेढ़ी हो चुकी जीभ फिर से सामान्य हो गई।

अब ठीक आ रही है रिपोर्ट

नरेन्द्र सिंह ने बताया कि अब पिता बिना परेशानी के खाना खा रहे हैं और सामान्य जीवन जी रहे हैं। पहले खून की कमी थी, लेकिन और वह कामकाज संभाल रहे हैं। अब रिपोर्ट भी ठीक आ रही है।

दवाओं को बीच में छोड़ना घातक

कैंसर रोग विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कैंसर की समय रहते जांच करा ली जाए और उपचार नियमित रूप से किया जाए तो इस बीमारी पर काफी हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। इलाज के दौरान दवाओं को बीच में छोड़ना या लापरवाही करना मरीज के लिए घातक साबित हो सकता है। नियमित जांच, कीमोथैरेपी या अन्य चिकित्सा प्रकिया और दवाओं से कई मरीज कैंसर को मात देकर सामान्य जीवन जी रहे हैं।

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