अध्यात्मखबर

कौन थीं साध्वी प्रेम बाईसा? बाल्यावस्था में संन्यास, जीवन भर संघर्ष और अब सवालों में मौत

राजस्थान की चर्चित कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा का जीवन भक्ति, त्याग और आध्यात्मिक साधना से भरा रहा। बालोतरा जिले के परेऊ गांव में जन्मी प्रेम बाईसा ने कम उम्र में ही अपनी वाणी, स्मरण शक्ति और कथा कहने की शैली से लोगों का ध्यान आकर्षित किया और प्रदेशभर में श्रद्धा का केंद्र बन गई।

राजस्थान की चर्चित कथावाचक साध्वी प्रेम बाईसा का जीवन भक्ति, संघर्ष और आध्यात्मिक साधना से होकर गुजरा। बालोतरा जिले के परेऊ गांव में जन्मीं प्रेम बाईसा ने साधारण परिवार की बेटी से प्रदेशभर में श्रद्धा और भक्ति का केंद्र बनने तक का प्रेरणादायक सफर तय किया। उनका निधन, हालांकि, रहस्यों और सवालों से घिरा हुआ है।

ट्रक ड्राइवर की बेटी से साध्वी बनने तक का सफर

स्थानीय लोगों के अनुसार प्रेम बाईसा के पिता वीरमनाथ पेशे से ट्रक चालक थे। परिवार में सीमित संसाधन होने के बावजूद धार्मिक आस्था गहरी थी। उनकी मां अमरू बाईसा भक्ति में लीन रहती थीं और व्रत-उपवास तथा पूजा-पाठ में समय बिताती थीं। नवरात्रि के दौरान अमरू बाईसा ने व्रत रखा, जिसकी जानकारी पति को नहीं थी। इस घटना के बाद पति-पत्नी ने मिलकर चौमासा व्रत रखने का निर्णय लिया, जो चार महीने तक चलता है और इसमें अन्न ग्रहण नहीं किया जाता।

भक्ति का प्रारंभिक संस्कार

चार-पांच साल की उम्र में ही प्रेम बाईसा माता-पिता की भक्ति और कठोर तपस्या से प्रेरित होकर भक्ति-भाव में लीन हो गईं। छोटे उम्र में ही उन्होंने भजन सुनना और साधु-संतों के बीच बैठकर धार्मिक शिक्षा लेना शुरू कर दिया।

मां की मृत्यु और आध्यात्मिक मार्ग

गुरुकृपा आश्रम में रहने के दौरान उनकी मां अमरू बाईसा का निधन हो गया। प्रेम बाईसा की कम उम्र में मां का असमय निधन उन्हें आध्यात्मिक मार्ग की ओर ले गया। इसके बाद उन्होंने संत राजाराम जी महाराज और संत कृपाराम जी महाराज की शरण ली। यहीं उन्होंने कथावाचन, भजन गायन और धार्मिक शिक्षा में निपुणता हासिल की।

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साध्वी प्रेम बाईसा – फोटो : अमर उजाला
कम उम्र में पहचान

उनकी वाणी, स्मरण शक्ति और कथा कहने की शैली ने कम उम्र में ही लोगों को प्रभावित किया। केवल 12 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने जोधपुर के पास अपनी पहली सार्वजनिक कथा आयोजित की। इसके बाद धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ी और वे राजस्थान की चर्चित कथावाचकों में गिनी जाने लगीं।

संदिग्ध परिस्थितियों में निधन

बुधवार शाम जोधपुर के एक निजी अस्पताल में साध्वी प्रेम बाईसा का निधन हो गया। मृत्यु के करीब चार घंटे बाद कथित सुसाइड नोट सामने आने से मामला और पेचीदा बन गया। परिजनों का दावा है कि गलत इंजेक्शन लगाए जाने के कारण उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी थी। सुसाइड नोट ने भी मौत के कारणों पर कई सवाल खड़े कर दिए। पुलिस ने मामले की गहन जांच शुरू कर दी है।

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अंतिम यात्रा के लिए मौजूद लोग – फोटो : अमर उजाला
पोस्टमार्टम और अंतिम यात्रा

साध्वी के निधन के बाद पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराया। रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंपा गया और 29 जनवरी की रात बालोतरा जिले के परेऊ गांव लाया गया। गांव में बड़ी संख्या में ग्रामीण, साधु-संत और अनुयायी इकट्ठा हुए। पार्थिव देह को आश्रम में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जहां रात भर भजन-कीर्तन चलता रहा।

 वाणी, स्मरण शक्ति और कथा कहने की शैली ने कम उम्र में ही लोगों को प्रभावित किया। केवल 12 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने जोधपुर के पास अपनी पहली सार्वजनिक कथा आयोजित की। इसके बाद धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ी और वे राजस्थान की चर्चित कथावाचकों में गिनी जाने लगीं।
संदिग्ध परिस्थितियों में निधन

बुधवार शाम जोधपुर के एक निजी अस्पताल में साध्वी प्रेम बाईसा का निधन हो गया। मृत्यु के करीब चार घंटे बाद कथित सुसाइड नोट सामने आने से मामला और पेचीदा बन गया। परिजनों का दावा है कि गलत इंजेक्शन लगाए जाने के कारण उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी थी। सुसाइड नोट ने भी मौत के कारणों पर कई सवाल खड़े कर दिए। पुलिस ने मामले की गहन जांच शुरू कर दी है।

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अंतिम यात्रा के लिए मौजूद लोग – फोटो : अमर उजाला
पोस्टमार्टम और अंतिम यात्रा

साध्वी के निधन के बाद पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम कराया। रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई है। पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंपा गया और 29 जनवरी की रात बालोतरा जिले के परेऊ गांव लाया गया। गांव में बड़ी संख्या में ग्रामीण, साधु-संत और अनुयायी इकट्ठा हुए। पार्थिव देह को आश्रम में अंतिम दर्शन के लिए रखा गया, जहां रात भर भजन-कीर्तन चलता रहा।

आश्रम में बनी समाधि

30 जनवरी, शुक्रवार को उनके ही स्थापित शिव शक्ति धाम आश्रम में साध्वी प्रेम बाईसा का अंतिम संस्कार किया गया। साधु-संतों की परंपरा के अनुसार पूरी विधि-विधान से उन्हें समाधि दी गई। राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों से भी संत और श्रद्धालु इस अवसर पर पहुंचे। समाधि के समय उनके पिता वीरमनाथ भावुक दिखाई दिए। परेऊ गांव में हर आंख नम थी और श्रद्धालु स्तब्ध थे।

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