श्री विभगुंज वेलफेयर सोसायटी द्वारा ग़ज़ल गोष्ठी आयोजित
जैसा बाहर है उससे भी ज्यादा सबके भीतर गुबार है शायद- कमलेश भट्ट कमल


भोपाल। श्री विभगुंज वेलफेयर सोसायटी की ओर से रविवार, 24 मई को वरिष्ठ गीतकार मयंक श्रीवास्तव के निवास पर काव्य गोष्ठी का आयोजित की गई। गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ गजलकार महेश अग्रवाल ने ‘लबादे फेंक दे अपने जरा हैवानियत के तू कहीं तुझमें कोई मासूम सा इंसान रहता है’ ग़ज़ल सुनाकर गोष्ठी को सफल और सार्थक बताया। तो वहीं मुख्य अतिथि के रूप में नोएडा से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार कमलेश भट्ट कमल ने भोपाल में मयंक श्रीवास्तव के घर को साहित्य का तीर्थ बताते हुए ‘थोड़ा थोड़ा ही प्यार है शायद वरना हममें पठार है शायद जैसा बाहर है उससे भी ज्यादा सबके भीतर गुबार है शायद’ ग़ज़ल सुनाई।
काव्य गोष्ठी का आगाज किशन तिवारी की गजल ‘आपकी बस्ती में हम अपना भी घर ले आये हैं’ के साथ हुआ। उसके उपरांत महेंद्र सिंह ने ‘ये जमी मिल गई आसमा मिल गया चंद लोगो को सारा जहां मिल गया’, मनोज जैन मधुर ने ‘हर टीपकार का धन्यवाद’, मधु शुक्ला ने ‘रिश्ते नाते रस्में कसमे मन की खुशियां एक तरफ’ , कटनी से पधारे राजा अवस्थी ने ‘ढूंढ ढूंढ हार थके छोर इस अंधेरे का’, अशोक निर्मल ने ‘खारापन मिलता है मुझको अंतर से मैं नमक बनाता हूं आंखों के समंदर से’, कीर्ति श्रीवास्तव ने ‘गम को छुपाकर आंखों को सुखा रखा बच्चों को खिलाकर खुद को भूखा रखा’ , वाराणसी से पधारे विनय मिश्र ने ‘मेरी किस्मत में कहा रहा आराम छुट्टी के दिन ही रहा सबसे ज्यादा काम’, गोरखपुर से पधारे देवेंद्र आर्य ने ‘तुम अगर हो तो जिंदगी है गुरु वरना काशी में मुर्दनी है गुरु’, ग्रेटर नोएडा से पधारे ओमप्रकाश यति ने ‘अंधेरे जब जरा सी रोशनी से भाग जाते है तो फिर क्यों लोग डरकर जिंदगी से भाग जाते हैं, राम वल्लभ आचार्य ने ‘मन में इतनी उलझन जितनी सघन सतपुड़ा वाले वन हल्दी घाटी हुई जिंदगी चेरापूंजी हुए नैन’ ने एवं अंत में मयंक श्रीवास्तव ने ‘संकट की आंधी में यह बड़ा सहारा गीत जो सुना तुमने बेझिझक हमारा है’ रचना सुनाकर काव्य गोष्ठी में समा बांधा।
गोष्ठी का कुशल संचालन मनोज जैन मधुर ने किया और आभार कीर्ति श्रीवास्तव ने दिया।



