

अमेरिका कब दुनिया में एक ताकतवर देश के रूप में स्थापित हुआ? सवाल के कई उत्तर हो सकते हैं. इतिहास में देखें तो, 1776 में अमेरिका को स्वतंत्रता मिली, फिर उसने तेजी से अपना क्षेत्र और अर्थव्यवस्था बढ़ाई. औद्योगिक क्रांति के प्रभाव से अमेरिकी उद्योग, रेल नेटवर्क और व्यापार में तेज विस्तार की बदौलत 1890 के दशक तक अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका था. 1898 के स्पैनिश अमेरिकी वॉर को अक्सर अमेरिका के वैश्विक शक्ति बनने की शुरुआत माना जाता है. इस युद्ध के बाद अमेरिका का प्रभाव कैरेबियाई क्षेत्र और प्रशांत महासागर तक फैल गया. इसके बाद प्रथम विश्व युद्ध ने अमेरिका की आर्थिक ताकत को और मजबूत किया. आज से लगभग 100 साल पहले हुए इस युद्ध ने अमेरिका को दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदाता और प्रमुख औद्योगिक देश बनाया.
हाँ, यहां रुकना होगा. क्योंकि इस लेख में हम यही बात करने वाले हैं. 100 साल पहले, जिस जगह ने अमेरिका को दुनिया में एक महाशक्ति के रूप में स्थापित किया. उसी जगह से अमेरिका के पराभव की शुरुआत हो रही है. हम यहां यह साफ कर दें कि यह केवल आंकलन मात्र है. यह गलत भी हो सकता है. लेकिन इसके सही होने के पीछे कुछ कारण हैं, जो इसे जस्टिफाई कर रहे हैं. कैसे? इसी को समझते हैं.
प्रथम विश्व युद्ध ने अमेरिका को दुनिया का सुपर पावर बनाने के बीज डाले
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के बाद अमेरिका विश्व मंच पर एक बड़ी शक्ति के रूप में उभरा, हालांकि वह तत्काल अकेली महाशक्ति नहीं बना था. उसकी आर्थिक, औद्योगिक और वित्तीय ताकत में जबरदस्त वृद्धि हुई, जिसने आगे चलकर उसे वैश्विक नेतृत्व की स्थिति तक पहुंचाया. प्रथम विश्व युद्ध से पहले यूरोप की शक्तियां विशेषकर युनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन), फ्रांस और जर्मनी विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था पर हावी थीं. लेकिन युद्ध ने यूरोप की अर्थव्यवस्थाओं को बुरी तरह कमजोर कर दिया. इसके उलट, अमेरिका का मुख्य भूभाग युद्ध से लगभग अछूता रहा और उसने मित्र देशों को हथियार, खाद्यान्न और अन्य सामग्री बेचकर भारी आर्थिक लाभ कमाया.
युद्ध के बाद अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदाता देश बन गया. पहले यूरोपीय देश अमेरिका को कर्ज देते थे, लेकिन 1918 के बाद स्थिति उलट गई और कई यूरोपीय देश अमेरिकी ऋण पर निर्भर हो गए. इससे न्यूयॉर्क वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में उभरने लगा और लंदन की पारंपरिक वित्तीय प्रधानता को चुनौती मिलने लगी. औद्योगिक उत्पादन के क्षेत्र में भी अमेरिका की स्थिति मजबूत हुई. युद्ध के दौरान अमेरिकी कारखानों ने बड़े पैमाने पर उत्पादन किया, जिससे उसकी विनिर्माण क्षमता और तकनीकी बढ़त बढ़ी.
1920 के दशक को अक्सर ‘रोरिंग ट्वेंटीज’ कहा जाता है, क्योंकि इस दौरान अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेज गति से बढ़ी. हालांकि, राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से अमेरिका अभी भी कुछ हद तक अलगाववादी नीति अपनाए हुए था. उसने युद्ध के बाद बनी लीग ऑफ नेशंस में भी सदस्यता नहीं ली. इसलिए प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक महाशक्ति तो बन गया, लेकिन उसने अभी वैश्विक राजनीतिक नेतृत्व की पूरी जिम्मेदारी नहीं संभाली थी.
कई इतिहासकारों का मानना है कि प्रथम विश्व युद्ध ने अमेरिका को महाशक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ाया, जबकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वह वास्तव में दुनिया की दो प्रमुख महाशक्तियों में से एक बनकर उभरा. दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप और जापान की तबाही तथा अमेरिकी आर्थिक-सैन्य शक्ति के विस्तार ने उसे वैश्विक नेतृत्व की स्थिति में पहुंचा दिया. इसलिए निष्कर्ष यह है कि प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिका एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उभरा और यही हमारा आधार बिंदु है. भले ही उसका पूर्ण महाशक्ति का दर्जा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित हुआ.
अब बात करते हैं 100 साल पहले क्या हुआ था और आज क्या हुआ?
प्रथम विश्व युद्ध को समाप्त करने के लिए करीब 107 साल पहले, 28 जून 1919 को फ्रांस के वर्साय पैलेस में संधि हुई थी. उस समय अमेरिका विजेता देशों में शामिल था और तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन नई वैश्विक व्यवस्था के प्रमुख शिल्पकारों में गिने जाते थे. अब उसी महल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ एक 14 बिंदुओं वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं. लेकिन इस बार बहस यह है कि क्या अमेरिका ने अपनी शर्तें मनवाईं या फिर ईरान को बड़ी रियायतें दे दीं?
1919 का वर्साय और वुडरो विल्सन के ‘14 सूत्र’
प्रथम विश्व युद्ध के बाद फ्रांस के वर्साय में आयोजित शांति सम्मेलन में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली की भूमिका सबसे अहम थी. उस समय समझौते पर हस्ताक्षर से करीब छह महीने पहले वुडरो विल्सन ने वर्साय में कहा था, ‘आखिरकार दुनिया अब अमेरिका को दुनिया के उद्धारक के रूप में जानती है.’ विल्सन के प्रसिद्ध ’14 सूत्र’ युद्ध के बाद की नई विश्व व्यवस्था का आधार बने थे. यही वजह है कि जब 2026 में ट्रंप ने ईरान के साथ 14 बिंदुओं वाले समझौते पर हस्ताक्षर किए, तो इतिहास से तुलना होना लगभग तय है.
वर्साय में ट्रंप के हस्ताक्षर और शुरू हुई नई बहस
फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में ट्रंप समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले कुछ क्षण रुकते हैं और आसपास मौजूद लोगों से कहते हैं, ‘यह आसान नहीं था, मैं आपको बता सकता हूं.’

