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सांस लेने में गंभीर परेशानी के पीछे छिपी दुर्लभ तंत्रिका संबंधी बीमारी की पहचान, मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे में किशोरी का सफल उपचार

कोलकाता, 24 जून 2026: झारखंड की एक किशोरी को अचानक सांस लेने में गंभीर परेशानी होने पर मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे में भर्ती कराया गया। शुरुआत में डॉक्टरों को लगा कि वह फेफड़ों के गंभीर संक्रमण से पीड़ित है। लेकिन उपचार शुरू होने के बावजूद उसकी स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी। इसके बाद डॉक्टरों ने मामले की गहराई से जांच की और पाया कि वह मायस्थीनिया ग्रेविस नामक एक दुर्लभ तंत्रिका संबंधी बीमारी से पीड़ित है, जिसके कारण उसे मायस्थेनिक क्राइसिस हुआ था। इस स्थिति में मांसपेशियों की कमजोरी सांस लेने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। समय पर सही बीमारी की पहचान और समन्वित उपचार के जरिए डॉ. देबराज यश, डायरेक्टर – पल्मोनोलॉजी, मणिपाल हॉस्पिटल्स कोलकाता, तथा डॉ. वैभव सेठ, कंसल्टेंट – न्यूरोलॉजी, मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे, ने मरीज का सफलतापूर्वक उपचार किया। यह मामला जटिल चिकित्सकीय परिस्थितियों में समय रहते सही निदान और विभिन्न विभागों के संयुक्त प्रयासों के महत्व को दर्शाता है।
मई महीने में किशोरी को एक रेलवे अस्पताल से गंभीर सांस संबंधी तकलीफ के कारण मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे भेजा गया था। उसके शुरुआती लक्षणों और सीटी स्कैन की रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टरों को न्यूमोनिया की आशंका हुई। इसी को ध्यान में रखते हुए नसों के माध्यम से एंटीबायोटिक उपचार शुरू किया गया। हालांकि कुछ ही घंटों में उसकी सांस लेने की परेशानी काफी बढ़ गई और उसकी श्वसन क्षमता प्रभावित होने लगी, जिसके कारण उसे वेंटिलेटर की सहायता देनी पड़ी।
आगे की जांच के दौरान डॉक्टरों ने पाया कि सीटी स्कैन में दिखाई देने वाली फेफड़ों की स्थिति और मरीज की गंभीर हालत के बीच काफी अंतर था। फेफड़ों में व्यापक क्षति नहीं दिख रही थी, लेकिन उसकी स्थिति लगातार बिगड़ रही थी। इसी वजह से डॉक्टरों ने अन्य संभावित कारणों की जांच शुरू की।
विस्तृत जांच में मरीज की मांसपेशियों में काफी कमजोरी और चलने-फिरने की क्षमता में कमी पाई गई, जिससे किसी तंत्रिका-मांसपेशी संबंधी बीमारी की आशंका हुई। डॉक्टरों ने मायस्थीनिया ग्रेविस और गिलियन-बारे सिंड्रोम जैसी बीमारियों की संभावना पर विचार किया। आगे की जांच में पुष्टि हुई कि मरीज मायस्थीनिया ग्रेविस के साथ मायस्थेनिक क्राइसिस से पीड़ित थी।
मायस्थीनिया ग्रेविस एक दुर्लभ बीमारी है, जिसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली गलती से नसों और मांसपेशियों के बीच होने वाले संदेशों के आदान-प्रदान में बाधा उत्पन्न करती है। इसके कारण मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं। आमतौर पर इसके लक्षणों में पलकों का झुक जाना, निगलने में कठिनाई या हाथ-पैरों में कमजोरी शामिल होती है। गंभीर मामलों में सांस लेने वाली मांसपेशियां भी प्रभावित हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में मायस्थेनिक क्राइसिस हो सकता है, जो जानलेवा साबित हो सकता है और मरीज को गहन चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है।
मामले के बारे में बताते हुए डॉ. देबराज यश ने कहा, “मरीज को गंभीर सांस संबंधी परेशानी के साथ हमारे पास लाया गया था और शुरुआत में यह मामला न्यूमोनिया जैसा ही लग रहा था। लेकिन उसकी स्थिति तेजी से बिगड़ना और सीटी स्कैन की रिपोर्ट तथा वास्तविक स्थिति के बीच अंतर हमें अन्य कारणों पर विचार करने के लिए प्रेरित करता था। जब श्वसन विफलता को केवल फेफड़ों की समस्या से नहीं समझाया जा सकता, तब तंत्रिका संबंधी कारणों की भी जांच करना आवश्यक होता है, क्योंकि सांस लेने वाली मांसपेशियां भी प्रभावित हो सकती हैं। समय रहते संदेह करना और विभिन्न विभागों के संयुक्त प्रयासों ने इस चुनौतीपूर्ण मामले के सफल उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।”
रोग की पुष्टि होने के बाद मरीज को तुरंत इंट्रावीनस इम्यूनोग्लोबुलिन (आईवीआईजी) उपचार शुरू किया गया। इसके साथ ही उसकी लगातार निगरानी और आवश्यक सहायक उपचार भी जारी रखा गया। पल्मोनोलॉजी, न्यूरोलॉजी और क्रिटिकल केयर टीमों की देखरेख में उसकी स्थिति धीरे-धीरे बेहतर हुई, मांसपेशियों की ताकत वापस आई और उसे सफलतापूर्वक वेंटिलेटर से हटाया गया। 21 दिनों तक अस्पताल में उपचार के बाद उसे स्वस्थ अवस्था में छुट्टी दे दी गई।
इस विषय पर डॉ. वैभव सेठ ने कहा, “मायस्थेनिक क्राइसिस, मायस्थीनिया ग्रेविस की एक गंभीर और जानलेवा जटिलता है। इस बीमारी में नसों और मांसपेशियों के बीच संचार प्रभावित हो जाता है, जिससे शरीर की स्वैच्छिक मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। मायस्थेनिक क्राइसिस के दौरान यह कमजोरी अचानक बढ़ सकती है और सांस लेने वाली मांसपेशियों को भी प्रभावित कर सकती है, जिसके कारण श्वसन विफलता हो सकती है तथा वेंटिलेटर की आवश्यकता पड़ सकती है। इस मामले में सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि मरीज का पहला और सबसे गंभीर लक्षण सांस लेने में परेशानी था, जबकि सामान्य तंत्रिका संबंधी लक्षण दिखाई नहीं दे रहे थे। समय पर बीमारी की पहचान और शीघ्र उपचार शुरू करना उसके सफल उपचार का प्रमुख कारण रहा।”
मणिपाल हॉस्पिटल ब्रॉडवे के डॉक्टरों ने कहा कि श्वसन विफलता के हर मामले को केवल फेफड़ों की बीमारी से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यदि मरीज के लक्षण और जांच रिपोर्ट पूरी तरह मेल नहीं खाते हैं, तो तंत्रिका संबंधी बीमारियों सहित अन्य संभावित कारणों पर भी विचार करना जरूरी है। मायस्थेनिक क्राइसिस जैसी दुर्लभ और गंभीर स्थितियों में समय पर सही निदान, उचित उपचार और विभिन्न विशेषज्ञों के समन्वित प्रयास मरीज की जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

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