सुनफा,योग, चंद्रमा से दूसरे भाव में सूर्य को छोड़कर शेष ग्रहोँ, मेँ, से कोई हो तो यह योग बनता है
चंद्र से बनने वाले चार योग मुनियों ने कहा है।
सुनफा,योग, चंद्रमा से दूसरे भाव में सूर्य को छोड़कर शेष ग्रहोँ, मेँ, से कोई हो तो यह योग बनता है।
अनफा,योग, 12वेँ,भाव में, सूर्य को छोड़कर अन्य कोई ग्रह हो तो, हो तोअनफा, योग बनता है।
दुरूधरा,योग, चंद्र से दूसरे 12वें भाव में ग्रह हो तो
दरुधरा योग, बनता है। केमद्रुम,योग, चंद्रमा से दूसरे बारहवेँ,में भाव में, ग्रह न हो तो,केमद्रुम, योग होता है। इस योग का जातक धन पुत्र स्त्री बंधु,से हीन, होता है, दास और परदेसी होता है। राजा कुल भी होने पर भी नित्य मालिन कुवेषधारी, होता है।केमद्रुम, भँग भी होता है, यदि जन्म समय में चंद्रमा सभी ग्रह से देखा जाता हो तो इस योग का दुष्ट फल का,नाश कर उसे, दीर्घायु धनी और राजा बनता है। यदि सभी ग्रह केंद्र कोण में हो तो, इस योग का नाश कर उसके कुप्रभाव को दूर करते हुए, शुभ फल प्रदान करने वाला भी होता है।
केमद्रुम, चंद्रमा से द्वितीय और द्वादश दोनों स्थानों पर कोई ग्रह ना हो तो,केमद्रुम, लोग होता है,। यदि इन स्थानों पर सूर्य हो और कोई अन्य ग्रह ना हो तो योग नहीं बनता तथा सूर्य के होने से योग भांग भी नहीं होता।केमद्रुम, योग के कुछ अपवाद भी है।
जो इस प्रकार है। चंद्रमा के साथ कोई ग्रह हो तो,केमद्रुम, योग नहीं होता। लग्न से केंद्र में कोई ग्रह हो तो,केमद्रुम, योग नहीं होता। यह आचार्य गर्ग का वचन है। महर्षि पराशर के अनुसार सभी ग्रह केदो में हो तो,केमद्रुम, योग भंग हो जाता है।
सुनफा, योग होने से जातक, स्वयं के प्रयत्नों से धनी उत्तम बुद्धि संयुक्त तथा यशस्वी होता है। योग कारक मंगल हो तो उत्साहित साहसी धनबाद एवं उग्र होता है। बुध योग कारक हो तो चतुर कल निपुण वाक्पटु, और मनस्वी, होता है। योग कारक बृहस्पति हो तो विद्यावान, राज पूजित धनी, एवं सुखी होता है। योग कारक शुक्र हो तो कामी, तथा, विषय भोगी होता है,। योग कारक शनि हो तो जातक परिश्रमी नेता दूसरों के भोग्य पदार्थ का भोग करने वाला होता है। अनफा,योग, मैं उत्पन्न जातक भोगी वस्त्र अलंकार धारण करने वाला चिंता रहित सुखों से युक्त एवं संतुष्ट होता है। योग कारक मंगल हो तो मानी, क्रोधी साहसी एवं चोर कर्म ,करने वाला होता है। योग कारक बुध हो तो लेखक शिल्पी, कवि सुंदर वक्ता, और यशस्वी होता है। योग कारक गुरु हो तो राजपूज्य, गंभीर धनी सत्वगुणी, व, पवित्र होता है। योग कारक शुक्र हो तो बिलासी बुद्धिमान तथा धन,धान्य, से युक्त होता है। योग कारक शनि हो तो वचन निभाने वाला दलितों का नेता और दुष्टि स्त्री का पति, होता है। दुरुधरा, योग में उत्पन्न जातक सुख उपभोग के साधनों का भोग करने वाला होता है। ऐसा व्यक्ति त्यागी धनी तथा समृद्ध होता है। योग कारक ग्रह मंगल व, बुध हो तो, जातक असत्य बोलने वाला, लोभी और कुलटा, स्त्री में आसक्त होता है। मंगल या गुरु हो तो शत्रु पीड़ित कार्य कुशल, धनी व कुल की, रक्षा करने वाला होता है। मंगल,व शुक्र हो तो सुंदर क्रूर व कामुक होता है। मंगल,व शनि हो तो, निँदित ,क्रोधी और चुगलखोर होता है। बुध,व गुरु, व, हो तो, जातक शास्त्रज्ञ, वाचाल एवं, सज्जनों का सँग करने वाला,, तथा धर्मपरायण होता है। योग कारक बुध,व शुक्र हो तो, जातक संगीत नृत्य प्रेमी बुद्धिमान एवं प्रिय वचन बोलने वाला होगा। बुध,व शनि हो तो, अल्प विद्या जाने वाला विदेश में धन कमाने वाला तथा बंधु वर्ग से बैर करने वाला होगा। गुरु व शुक्र हो तो, राजा के समान नीतिनिपुण ,और शुद्ध चित वाला, होगा। गुरु व शनि हो तो
विद्यावान, शांति देने वाला सुखी तथा धनी होगा। शुक्र,व शनि हो तो, कुलीन धनी राजप्रिय, एवं स्त्री प्रिय, होगा।
इसी प्रकार यदि किसी जातक की कुंडली में,केमद्रुम, योग हो तो उसको, राजयोग भी हो तो वह निष्फल हो जाता है। ऐसा व्यक्ति मलिन, दुखित खल, नीच काम करने वाला ऋणग्रस्त तथा,सदैव आर्थिक रूप से, पीड़ित रहने वाला, होगा। राज परिवार में जन्मा व्यक्ति भी दरिद्रता का मुख देख सकता है, यदि कुंडली में अन्य प्रबल शुभ योग ना हो। ऐसे व्यक्ति के मित्र संबंधी उसका साथ छोड़ देते हैं। वह मजदूरी मेहनत करके अपना भरण पोषण करता है। अपने व्यवहार के कारण सबको अपना विरोधी बना लेता है।
शुभकामनाओं के सहित।
पंडित गंगा प्रसाद आचार्य
धर्माधिकारी अखिल भारतवर्षीय धर्म संघ शाखा मध्य प्रदेश



