खबरसंपादकीय

आंखें हुसैनी हो गईं सांस्कृतिक सौहादर्य की मिसाल हैं हुसैनी ब्राह्मण

शायर राजेन्द्र कुमार ने क्या खूब लिखा है… इस क़दर रोया मै सुन के दास्तान-ए-करबला, मै तो हिन्दू ही रहा, आंखें हुसैनी हो गईं।…. ये हज़रत इमाम हुसैन ही हैं जिन्हें जितनी अकीदत के साथ मुसलमान मानते हैं उनका उतना ही एहतराम गैरमुस्लिम भी करते हैं। मोहर्रम पर जब भी इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों की शहादत का ज़िक्र होता है तो उन हुसैनी ब्राम्हणों की भी याद ताज़ा हो जाती है जिन्होंने अपना सब कुछ हुसैन पर न्यौछावर कर दिया। सामाजिक सदभाव, आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल पूरी दुनिया में भारत में ही देखने को मिलती है। ऐसी ही एक मिसाल है हुसैनी ब्राह्मण। ये वो हिंदू समुदाय है, जो सनातन धर्म के सभी तीज त्यौहार मनाता है तो शिया मुसलमानों के साथ इमाम हुसैन के ग़म भी मनाता है। हुसैनी ब्राह्मण, मोहयाल समुदाय के लोग हैं जो हिंदू और मुसलमान दोनों धर्मों से संबंध रखते हैं। बता दें, मोहयाल ब्राह्मणों में बाली, भीमवाल, छिब्बर, दत्त, लाउ, मोहन और वैद जैसी कई उपजातियाँ शामिल हैं। इनकी दत्त शाखा ने करबला में जंग लड़ी थी। इन मोहियाल ब्राह्मणों ने कर्बला की लड़ाई में हजरत इमाम हुसैन की तरफ से जंग लड़ी थी इसीलिए सम्मान के साथ इन्हें हुसैनी ब्राह्मण के नाम से जाना-पहचाना और पुकारा जाने लगा। ये भी माना जाता है कि हुसैनी ब्राह्मणों का संबंध महाभारत काल से है। महाभारत के भीषण युद्ध में गुरू द्रोणाचार्य ने भी भाग लिया था, जो दत्त गोत्र के ब्राह्मण थे। उनके पुत्र अश्वत्थामा युद्ध में घायल हो गए थे। महाभारत युद्ध में पांडवों के विजयी होने के बाद अश्वत्थामा इराक चले गए और ईराक में ही बस गए। उनके वंशज दत्त ब्राह्मण कहलाए। आगे चलकर दत्त ब्राह्मण ही मोहियाल ब्राह्मण कहलाए। इन्होंने अरब देशो में कई राज्यों को जीता और उन पर राज किया। इन्हीं में से एक थे राजा राहिब सिद्ध दत्त। इनका कार्यकाल पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन के समय का है। कहा जाता है कि इमाम हुसैन की दुआ से ही उन्हें संतान का सुख प्राप्त हुआ था। हुसैनी ब्राह्मण समाज के लोग भारत के जम्मू-कश्मीर, पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, अमृतसर, पुणे सहित अन्य हिस्सों के अलावा पाकिस्तान के लाहौर, सिंध, अफगानिस्तान के काबुल में भी रहते हैं। अजमेर और बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में रहने वाले कुछ भूमिहर ब्राह्मण भी खुद को हुसैनी ब्राह्मण मानते हैं। यहां बता दें कि अमृतसर में लोहगढ़ में इमामबाड़ा है। इसकी देख रेख अंजुमन-ए-यादगार हुसैन द्वारा की जाती रही है। माना जाता है कि इमामबाड़ा सैयद नाथू शाह द्वारा बनाया गया है। भारत-पाकिस्तान बटवारे से पहले अमृतसर के शिया और हुसैनी ब्राह्मण परिवार इसकी संयुक्त रूप से देख रेख किया करते थे। बाद में अमृतसर से हुसैनी ब्राम्हण चले गए। लेकिन, अमृतसर के शिया हमेशा अपनी मजलिसों में राजा रहीब को याद करते रहे। इस समुदाय के लोग भी हजरत हुसैन की शहादत के गम में मातम और मजलिस करते हैं। हुसैनी ब्राह्मण समुदाय को लेकर एक प्रसिद्ध कहावत भी है वाह दत्त सुल्तान, हिंदू का धर्म, मुसलमान का ईमान। कई प्रसिद्ध हस्तियां इसी समुदाय से संबंध रखती हैं जैसे दिवंगत मशहूर अभिनेता सुनील दत्त हुसैनी ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके अलावा अभिनेत्री योगिता बाली, उर्दू लेखक कश्मीरी लाल जाकिर, साबिर दत्त और नंद किशोर विक्रम हुसैनी ब्राह्मण समुदाय से जुड़े नाम हैं। शास्त्रीय संगीत गायिका सुनीता झिंगरान जो हिंदू देवताओं की पूजा करती हैं और इमाम हुसैन को भी मानतीं हैं। अपनी ठुमरी, ख्याल, दादरा और गजल के लिए जानी जाने वाली प्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत गायिका सुनीता झिंगरान हुसैनी ब्राह्मण के रूप में अपने पूर्वजों की परंपराओं को निभा रही हैं। वो मजलिसों में शामिल होतीं हैं और मरसिये, नोहे पढ़तीं हैं। पद्मश्री से सम्मानित ब्रज नाथ दत्त कासिर, जो अमृतसर के एक प्रतिष्ठित व्यापारी और प्रसिद्ध उर्दू-फारसी शायर थे, इसी समुदाय से आते हैं। हुसैनी ब्राह्मण हिंदू होते हुए भी इमाम हुसैन में आस्था रखते हैं। इनके घरों में पूजा स्थल पर हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ-साथ अलम ( जो कि हाथ के पंजे के जैसा होता है और इसे इमाम हुसैन या पंजतन का प्रतीक भी माना जाता है) भी रखा जाता है।
हुसैनी ब्राम्हणों के बारे में जो उल्लेख मिलता है वो दत्त परिवार से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि जब राहिब सिद्ध दत्त के कोई संतान नहीं हुई तो उन्होंने पैगंबरे इस्लाम से औलाद की ख्वाहिश की। नबी ए करीम ने अपने नवासे इमाम हुसैन से उनके लिए दुआ करने को कहा। इमाम हुसैन की दुआ के बाद राहिब जी के यहां 7 बेटे हुए और ये सभी इस कर्बला की जंग में शहीद हुए। तभी से इन्हें हुसैनी ब्राह्मण के नाम से जाना जाने लगा। कर्बला की जंग में हुसैन इब्ने अली (इमाम हुसैन) का साथ देने गए हुसैनी ब्राह्मण भी शहीद हो गए थे। ये वही थे जो हुसैन की दुआ के बाद जन्में थे। बताया जाता है कि करबला की जंग में इमाम हुसैन के साथ उनके परिवार के 72 साथियों के अलावा दत्त परिवार के 7 बेटे भी शहीद हो गए थे। हुसैनी ब्राह्मण को दरदना भट्टाचार्य का वंशज भी माना जाता है। कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत की खबर सुनकर हुसैनी ब्राह्मण भी इराक पहुंचे और बदला लेकर लौटे।
कर्बला में बादशाह यजीद की हुकूमत थी। यजीद बेहद ही जालिम, अय्याश और तानाशाह था। वो चाहता था कि नबी मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन उसकी बेअत कर लें। जब इमाम हुसैन से बेअत करने से इंकार कर दिया तो यजीद ने इमाम हुसैन को शहीद करने के लिए साजिश रची। 4 मई 680 ईसवी को इमाम हुसैन मदीने में अपना घर छोड़कर शहर मक्का पहुंचे। उनका हज करने का इरादा था लेकिन उन्हें पता चला कि दुश्मन हाजियों के भेष में आकर उनका कत्ल कर सकते हैं। हुसैन नहीं चाहते थे कि काबा जैसे पवित्र स्थान पर खून बहे, फिर इमाम हुसैन ने हज का इरादा बदल दिया और शहर कूफे की ओर चल दिए। दुश्मनों की फौज ने उन्हें कर्बला में रोक लिया। इमाम हुसैन और उनके परिवार को दरिया-ए-फरात के किनारे घेर लिया। पानी तक रोक दिया गया। ऐसी परिस्थिति में इमाम हुसैन ने अपने बचपन के दोस्त हबीब को खत लिखकर मदद के लिए बुलाया। दूसरा खत कर्बला से बहुत दूर भारत के एक हिंदू राजा और मोहयाल समाज के मुखिया राहिब सिद्ध दत्त के नाम भेजा जो उनका भाई जैसा दोस्त था। राहिब सिद्ध दत्त एक मोहयाल ब्राह्मण थे। इमाम हुसैन का खत मिलते ही राहिब दत्त मोहयाल ब्राह्मणों की सेना के साथ कर्बला के लिए निकल पड़े। लेकिन जब तक उनकी सेना वहां पहुंचती तब तक इमाम हुसैन को शहीद किया जा चुका था। रास्ते में जब राहिब दत्त को इस बात का पता चला तो उनका दिल टूट गया। इमाम हुसैन के गम में राहिब दत्त खुद अपनी जान देना चाहते थे लेकिन तब इमाम हुसैन के ही एक चाहने वाले जिसका नाम मुखतार था, ने उनको रोक लिया। इसके बाद मुख्तार और राहिब दोनों एक साथ मिलकर इमाम हुसैन के खून का बदला लेने के लिए निकल पड़े। कहते हैं कि उस समय यजीद की फौज इमाम हुसैन के सिर को लेकर कूफा में इब्ने जियाद के महल ला रही थी। राहिब दत्त ने यजीद के दस्ते का पीछा कर इमाम हुसैन का सिर हासिल कर लिया और दमिश्क की ओर निकल गए। रास्ते में एक पड़ाव पर रात बिताने के लिए रुके थे। वहां यजीद की फौज ने उन्हें घेर लिया। यजीद की फौज ने हुसैन के सिर की मांग की। राहिब दत्त ने इसे देने से इनकार कर दिया। इसके बाद भयानक जंग हुई जिसमें राहिब दत्त के सातों बेटे शहीद हो गए लेकिन राहिब दत्त ने बहादुरी से लड़ते हुए इमाम हुसैन के कातिलों से बदला लिया। कूफे के सूबेदार इब्ने जियाद के किले पर कब्जा कर उसे गिरा दिया। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राहिब दत्त ने इमाम हुसैन का सिर लौटाने के बजाए अपने एक बेटे का सिर कलम कर उन्हें थमा दिया। यजीदी सैनिकों शक हुआ और उन्होंने फिर से सिर लौटाने की बात कही। तब एक-एक कर के राहिब दत्त ने अपने 7 बेटों को कुर्बान कर दिया। फिर भी जब यजीदी सैनिक नहीं माने तो राहिब दत्त उनसे भिड़ गए। उन्होंने मुख्तार के साथ मिलकर यजीदी सैनिकों से हुसैन की मौत का बदला लिया। जंग-ए-कर्बला में इन मोहयाली सैनिकों में कई सैनिक भी शहीद हुए। जंग खत्म होने के बाद कुछ मोहयाली सैनिक वहीं बस गए और बाकी अपने वतन हिंदुस्तान वापस लौट आए। इन वीर मोहयाली सैनिकों ने कर्बला में जहां पड़ाव डाला था उस जगह को हिंदिया कहते हैं। हजरत इमाम हुसैन को मुहर्रम के महीने में कर्बला की जंग (680 ईसवी) में शहीद कर दिया गया था। टीपी रसेल स्ट्रेसी ने अपनी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ द मुहियाल्स द मिलिटेंट ब्राह्मण क्लान ऑफ इंडिया में कर्बला के मैदान में फरात नदी के किनारे इमाम हुसैन क्रूर सुल्तान यजीद की सेना से घिरे हुए थे। इस्लाम को यजीद के हाथों में पड़ने से बचाने के लिए, हुसैन ने मदद के लिए दो पत्र लिखे। एक पत्र उन्होंने अपने बचपन के दोस्त हबीब को और दूसरा पत्र भारत के एक हिंदू मोहयाल राजा राहिब सिद्ध दत्त को लिखा। पत्र मिलते ही, माथे पर तिलक और पवित्र धागा बाँधे हिंदुस्तानी पंडितों का एक समूह इमाम हुसैन की मदद के लिए कर्बला की ओर चल पड़ा। इमाम हुसैन का साथ देने के लिए करीब 1400 ब्राह्मण करबला गए थे। हालांकि उनके पहुंचने के पहले ही इमाम हुसैन को शहीद कर दिया गया था। लेकिन उन्होंने यजीद से इसका बदला लिया था। जानकार बताते हैं कि ये मोहियाल ब्राम्हण, हजरत हुसैन के साथ करबला की जंग में शामिल होना चाहते थे लेकिन इमाम हुसैन ने इन्हें अपने साथ ले जाने से मना कर दिया था। मगर जब हजरत हुसैन शहीद हो गए, तो हजरत हुसैन के सिर की सलामत वापसी और बदला लेने के लिए अमीर मुख्तार की सरपरस्ती में राहब दत्त ने जंग लड़ी। कहा जाता है कि राहिब सिंह दत्त बगदाद में रहते थे। बगदाद में उनका निवास स्थान दैर-अल-हिंदिया कहलाता था, जिसका अर्थ है भारतीयों का मोहल्ला। किवदंती यह भी है कि अरब से लौटने पर राहिब दत्त अपने साथ पैगंबर साहब के बाल लाए थे, जो कश्मीर में हजरतबल दरगाह में रखे हुए हैं। अरब, ईरान और पाकिस्तान में रहने वाले ज्यादातर मोहियाल ब्राह्मण हिन्दुस्तान आकर बस गए। हालांकि, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी कुछ परिवार रहते हैं।
हुसैनी ब्राम्हणों के बारे में जो लोग ज्यादा नहीं जानते उन्हें ये लगता है कि ये कोई मुसलमानों से ताल्लुक रखने वाला ही फिरका या वर्ग है। लेकिन, ये मूलतः हिंदू ही हैं। ये आम हिंदुओं की तरह देवी-देवताओं की मूर्ति पूजा करते हैं और पैगंबर मुहम्मद के पोते और हजरत अली के बेटे हजरत इमाम हुसैन में भी अकीदत रखते हैं। ये अपने घरों के पूजा घर के एक कोने में हजरत इमाम हुसैन का प्रतीक ‘अलम’ भी रखते हैं। कुछ दत्त परिवारों में लड़कों के मुंडन के समय हजरत इमाम हुसैन को याद किया जाता है। इसके अलावा शादियों में हजरत इमाम हुसैन के नाम पर हलवा बनाकर बांटा जाता है। हिंदी, उर्दू और फारसी के लोग लोकगीतों में मोहियाल ब्राह्मणों का जिक्र मिलता है। बताया जाता है कि ये मोहियाल ब्राह्मण प्रारंभिक काल में दान-दक्षिणा लेकर और शिक्षण-अध्यापन करके जीवन यापन करते थे। कालांतर में उन्होंने सैन्य कर्म अपना लिया और उनकी अपनी फौज हो गई। इसके बाद इस समूह के पास मोहि यानी जमीनें आ गईं और ये मोहियाल ब्राह्मण कहलाने लगे। उस समय मोहयाल ब्राह्मणों का एक समुदाय ईराक में रहता था। अभी भी कुछ मोहियाल ब्राह्मण ईराक के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं। ईराक में अभी भी एक इलाके को अल-हिंदिया डिस्ट्रिक्ट कहा जाता है।
मोहिया ब्राम्हणों के साहित्य में करबला की जंग से जुड़े लोकगीत और दोहे भी मिलते हैं। एक लोकगीत है… लरयो दत्त, दाल खेत जी तिन लोक शाका परह्यो चरह्यो, दत्त दाल गह जी गढ़ कुफा जा लुट्यो.. यानि दत्त योद्धा अकेले ही मैदान में बहादुरी से लड़े और कूफा के किले को लूट लिया। इसी तरह, बाजे भीर को चोट फतेह मैदान जो पै बदला लिया, हुसैन, धन धन करे लुकाई… इसका अर्थ है जब उन्होंने मैदान जीत लिया, तो ढोल पीटा गया, हुसैन का बदला ले लिया और लोगों ने शाबाश-शाबाश का जयघोष किया। एक और लोकगीत है..जो हुसैन की जद्द है दत्त नाम सब धियायो, अरब शहर के बीच में रहिब तख्त बथायो अर्थात हुसैन की संतानों! अपने पिता के मित्र राहिब को मत भूलिए, जो आपके पिता के निधन से पहले अरब के शहर में सिंहासन पर बैठा था। बहरहाल, हुसैनी ब्राह्मण मोहर्रम पर अकीदत के साथ ताजियादारी, अजादारी और नौहाख्वानी में शामिल होते हैं। ये वो समुदाय है जो हिन्दू और मुसलमानों के बीच सेतू की मिसाल कायम करता है।

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