

कोलकाता : बंगाल में शुभेंदु अधिकारी सरकार ने बकरीद पर गाय की कुर्बानी न करने को कहा है। कोलकाता की सबसे बड़ी और प्रभावशाली मस्जिद के इमाम, मौलाना मोहम्मद शफीक कासमी से जब शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार के निजी घरों में कुर्बानी की अनुमति न देने के फैसले के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने बेहद शांत और संयमित रवैया अपनाया। जैसे ही कोलकाता में यह खबरें आने लगीं कि बंगाल के भीतरी इलाकों में मुसलमान हिंदू विक्रेताओं से गाय खरीदने से इनकार कर रहे हैं, कासमी ने शुद्ध उर्दू में बोलते हुए अपने भाइयों से अपील की कि वे सामाजिक सौहार्द बनाए रखने और हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करने के लिए स्वेच्छा से गाय की कुर्बानी और बीफ का सेवन बंद कर दें।
पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की आबादी का लगभग 28 प्रतिशत है। सभी ने इस अपील को फिर से दोहराया। हिंदुओं की कोई भी गुजारिश या मिन्नतें, अल्पसंख्यक समुदाय को उनके रुख़ से टस से मस नहीं कर सकीं। इस बार वे ईद-उल-अज़हा (बकरीद) के अवसर पर गोहत्या पर लगाए गए प्रतिबंध के पूरी तरह पक्ष में थे।
मुसलमानों ने खेला दांव
मुसलमानों ने एक कदम और आगे बढ़कर घाव पर नमक छिड़कने जैसा काम किया। नखोदा मस्जिद से लेकर अजमेर शरीफ दरगाह तक, धर्मगुरुओं ने मांग की कि गाय को ‘राष्ट्रीय पशु’ का दर्जा दिया जाए। एक ऐसा प्रस्ताव जिस पर विचार करने से केंद्र सरकार निश्चित रूप से कतराएगी। ज़ाहिर है, ये रणनीतियां ‘गो-रक्षक’ समूहों और नई सरकार के कुछ ज़्यादा ही उत्साही तत्वों से बचाव के लिए अपनाई गई थीं। भारत में रहने वाला हर व्यक्ति संस्कृति को समझता है। जिस प्रकार नदियों में गंगा को विशेष दर्जा प्राप्त है, उसी तरह पशुओं में गाय का भी विशेष स्थान है। हर भारतीय इसका सम्मान करता है। जो लोग इस भावना को नहीं मानते, उनके साथ कानून के अनुसार निपटा जाएगा।
76 साल पुराने कानून का सहारा
मुस्लिम समुदाय की इस सामूहिक राजनीतिक चाल ने बंगाल BJP को पूरी तरह से चौंका दिया है। BJP ने पूरे राज्य में कुछ खास जानवरों की कुर्बानी को नियंत्रित करने के लिए 1950 के पुराने ‘पश्चिम बंगाल पशु वध नियंत्रण अधिनियम’ का सहारा लिया था। इस पुराने कानून को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की कोशिश की गई, ताकि एक साफ़ तौर पर दिखने वाले और ताक़तवर अल्पसंख्यक समुदाय को घेरा जा सके। इसके लिए सार्वजनिक और निजी जगहों पर उन जानवरों के वध पर रोक लगाने की कोशिश की गई जो कुर्बानी के लिए उपयुक्त माने जाते हैं।
क्या है 1950 का वह कानून
यह कानून इससे भी आगे जाता है। इसमें कहा गया है कि किसी भी तय जानवर की कुर्बानी तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक कि उसके पास कोई सरकारी सर्टिफ़िकेट न हो जो यह प्रमाणित करता हो कि वह इस प्रक्रिया के लिए उपयुक्त है। यह सर्टिफ़िकेट, जो आम तौर पर नगर निगम के अधिकारियों और पशु चिकित्सकों द्वारा जारी किया जाता है, यह शर्त रखता है कि वध के लिए लाए गए जानवर की उम्र 14 साल से ज़्यादा होनी चाहिए, या फिर वह किसी चोट, शारीरिक विकृति या लाइलाज बीमारी के कारण हमेशा के लिए अपाहिज हो चुका हो।
3 से 5 साल की गाय की कीमत मिलती है अच्छी
रिपोर्टों से पता चलता है कि ग्रामीण बंगाल के कुछ खास हिंदू समुदाय आम तौर पर मवेशी खरीदने में 25,000 से 30,000 रुपये तक का निवेश करते हैं, और फिर उन्हें 80,000 से 100,000 रुपये के बीच की किसी भी कीमत पर बेच देते हैं। वे मवेशियों के लिए चारा खरीदते हैं। उन्हें घर पर पालने में और भी कई तरह के खर्च आते हैं। गायों और बैलों की सबसे अच्छी नस्लें तब होती हैं, जब उनकी उम्र तीन से पांच साल के बीच होती है। मवेशियों के बाज़ार में उन्हें इसी उम्र में सबसे अच्छी कीमत मिलती है।
कलकत्ता हाई कोर्ट की एंट्री
इन समुदायों को यह डर सता रहा है कि 1950 के कानून का हवाला देकर निजी तौर पर गायों के वध पर रोक लगाने का ‘अधिकारी सरकार’ का फ़ैसला, और साथ ही ईद-उल-अज़हा के लिए मवेशी न खरीदने का मुसलमानों का फ़ैसला, उनके लिए आर्थिक तबाही का सबब बन सकता है। हालात तब और गंभीर हो गए जब 22 मई को कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार की 13 मई की उस अधिसूचना में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें ईद-उल-अज़हा से पहले गायों, बैलों, बछड़ों, सांडों और भैंसों के वध पर रोक लगाई गई थी। कोर्ट ने यह रुख अपनाया कि जानवरों का वध नगर निगम द्वारा अनुमोदित अधिकृत बूचड़खानों में किया जा सकता है।
गाय पर राजनीति नई नहीं
कासमी की अपने मुस्लिम भाइयों से गोवध से दूर रहने की अपील की। यह 19वीं सदी के बंगाली लेखक और निबंधकार मीर मोशर्रफ हुसैन की उस गुजारिश जैसी ही है। लेखक हुसैन ने अपनी मशहूर किताब ‘गो-जीवन’ में अपने हम-धर्मियों से की थी। उन्होंने कहा था कि हिंदू-मुस्लिम एकता बनाए रखने के लिए गोवध छोड़ दें। यह सीधे तौर पर उस गहरी पैठ की प्रतिक्रिया थी, जो 19वीं सदी के अंत में उत्तरी भारत के गो-रक्षा आंदोलन ने बंगाल में बना ली थी।
बंगाल में नहीं बंद हुई थी गोहत्या
आजादी के बाद 1960 के दशक और उसके बाद, गायों और बीफ (गोमांस) को लेकर बहस राजनीतिक अखाड़े में बार-बार सामने आती है। जब 2014 में केंद्र में जब BJP सरकार आई तो गायों की सुरक्षा की महज अपीलों और इस भड़काऊ मुद्दे पर राजनीतिक लामबंदी होने लगी। इसने भयावह रूप ले लिया। उत्तरी भारत के कई राज्यों में हत्याएं हुईं। हालांकि, पश्चिम बंगाल ने इस चलन को चुनौती देना जारी रखा। यहां बीफ खुलेआम बिकता रहा और गायों- बैलों की हत्या अधिकृत बूचड़खानों के साथ-साथ निजी तौर पर भी होती रही। कोलकाता के बड़े एस्प्लेनेड इलाके के रेस्तरां में बीफ के व्यंजन परोसे जाते थे। अब शुभेंदु सरकार आने के बाद से यहां गोहत्या पर बैन लग गया है।


