अध्यात्ममध्य प्रदेश

सनातन धर्म के देवी देवताओं व ब्राह्मणों संतों एवं धार्मिक ग्रंथों पर अनर्गल टिप्पणी अब बर्दाश्त नहीं

धर्म ईश्वर का दिया हुआ उपहार

भोपाल, श्री परम शक्ति सेवा समिति के द्वारा समायोजित एकदिवसीय धर्म संगोष्ठी में उपस्थित विद्वानों के मध्य धर्माधिकारी, पंडित गंगा प्रसाद आचार्य ने अपने अध्यक्षीय, वक्ता के रूप में, वक्तव्य देते हुए कहा कि, धर्म से राजनीति है। राजनीति से धर्म नहीं है।नेताओं से धर्माचार्य नहीं, है।धर्माचार्य़ो से, नेता,है। वर्तमान परिपेक्ष में नेताओं ने धर्माचार्यो, को अपने मन मुताबिक चलने के लिए लगता शिकंजा कश दिये हैं । जोकि धर्म के विपरीत है। शासक को धर्माचार्य, ही परामर्श दे सकता है ,और उसी से राष्ट्र का कल्याण भी संभव है। नेता धर्माचार्य को परामर्श देकर, धर्म एवं धर्माचार्यो का उपहास,व, सनातन धर्म की गरिमा को भंग ना करें। वर्तमान में तथाकथित कुछ ऐसे रंग रूट, मन मुखी परम स्वतंत्र अर्थ लोभी, जो मान मर्यादा को, छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। सनातन धर्म पर, किसी की ताकत नहीं की कोई सनातन धर्म के प्रति अनर्गल प्रलाप कर सके लेकिन कुछ ऐसे सनातन धर्म के नाम से तथाकथित नेता एवं मन मुखी परम स्वतंत्र धर्माभाषी, जो,न,धर्म को जानते हैं,और,न,उनका, धर्म से दूर-दूर तक कोई लेना देना भी,नहीं,है, ऐसे लोग धर्म के सार को क्या जान सकते हैं।इस, प्रकार के लोग एवं इस प्रकार की मानसिकता के कुछ अन्य लोग भी सनातन धर्म के देवी देवताओं पर कुछ भी टीका टिप्पणी करने से, बाज नहीं आ,रहे,है ।सनातन धर्म शाश्वत धर्म है।केवल धर्माभाषी, ज्ञान के होने मात्र से धर्म के विषय में नहीं जान सकते, है। ऐसे तथाकथित पाखंडवादी नेता चरण अनुरागी, लोग ,हमारे,महापुरुषों को धर्माचार्यो को,व, शुद्ध सनातन धर्मावलंबियों को भ्रमित करने का कुप्रयास न करें। धर्म संगोष्ठी सभा में, पंडित आचार्य ने कहा कि पाखंडवादियोँ, से सावधान रहे। एवं समाज,
में विकृति पैदा करने वालों,से,दूर,रहेँ। इसी में सब का कल्याण। सनातन धर्म भेदभाव रहित एवं मान मर्यादा,व, सर्वोत्तम शिक्षा दीक्षा संस्कार संस्कृति सदाचार,सदव्यवहार की और अग्रेषित करने वाला धर्म है। सनातन धर्म मानव कृत नहीं है। कोई कपोल कल्पना या मानव द्वारा निर्धारित नहीं है सनातन धर्म परमात्मा का उपहार है।
संपूर्णकुम्भो न करोति शब्दम्।
अर्धो,घटो,घोषमुपैति,नूनम्।
विद्वान,कुलीनो,न, करोति गर्व,गुणैर्विहीना,बहु,
जल्पयन्ति।। इसका अर्थ है कि जिस प्रकार पानी से पूरी तरह भरा हुआ घड़ा आवाज नहीं करता लेकिन आधा भरा घड़ा बहुत शोर मचाता है। इस प्रकार ज्ञानी और संस्कारी विद्वान कभी, अहंकार नहीं करते जबकि गुणोँ,से हीन,अज्ञानी लोग ही बहुत बडबडाते हैं एवं व्यर्थ का दिखावा करते हैं। इससे हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा ज्ञान हमेशा व्यक्ति को विनम्र और शांत बनाता है।
इस अवसर पर पंडित राधेश्याम शास्त्री
पंडित विपिन त्रिपाठी पंडित सत्यनारायण शास्त्री वैदिक,
आदि उपस्थित रहे।
प्रेषकः पंडित,एस,के, शास्त्री
कार्यालय प्रभारी, श्री परम शक्ति सेवा समिति भोपाल

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