13 साल तक मौत के साए में रहा शख्स, अब सुप्रीम कोर्ट ने दे दी बड़ी राहत, रेप-मर्डर के आरोप में हुई थी फांसी की सजा

नई दिल्ली: एक व्यक्ति जिसे रेप और मर्डर के मामले में मौत की सजा दी गई थी। करीब 13 साल से वो मौत के साए में जी रहा था। उसने बाहर निकलने की उम्मीदें मानी छोड़ दी थी। हालांकि, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुनवाई के दौरान कई ऐसी दलीलें सामने आई जिसके बाद शीर्ष अदालत ने इस शख्स को बरी करने का आदेश सुना दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उसकी मेडिकल स्थिति और पक्के सबूतों की कमी के कारण अन्य आरोपियों के साथ उस शख्स को बरी कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में क्या कहा
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिसमें उस व्यक्ति और उसके दोस्त को दोषी ठहराया गया था। दोनों को एक महिला से रेप और हत्या के लिए मौत की सजा दी गई थी। हालांकि, वह शख्स शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ था। उसने मौत के साए में 13 साल बिताए। अब सुप्रीम कोर्ट ने उसे बरी करने का आदेश सुनाया है।
ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने कमियों को नजरअंदाज किया’
शीर्ष अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों ने अभियोजन पक्ष के मामले में मौजूद साफ कमियों और खामियों को नजरअंदाज कर दिया। बेंच ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने अपीलकर्ताओं पर यह आरोप लगाकर एक मकसद थोपने की कोशिश की कि उन्होंने अपनी कामुक इच्छाओं को पूरा करने के लिए पीड़िता के साथ यौन उत्पीड़न किया और जब उसने विरोध किया, तो उन्होंने उसकी हत्या कर दी। हालांकि, रिकॉर्ड पर लाए गए सबूत इस मकसद की थ्योरी को सही नहीं ठहराते।
डॉक्टर ने आरोपियों को लेकर अदालत में क्या कहा
पूरे मामले में खास बात यह है कि डॉ. बीएस असवाल, जिन्होंने आरोपी नंबर-1 मेहताब की मेडिकल जांच की थी। उन्होंने साफ तौर पर गवाही दी कि ‘आरोपी की मेडिकल स्थिति के कारण, उसके लिए शारीरिक संबंध बनाना संभव नहीं था। यह पहलू बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि अभियोजन पक्ष का मामला ही इस आधार पर आगे बढ़ता है कि कथित यौन उत्पीड़न ही पूरी घटना की जड़ था।’
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मकसद को साबित करने वाले किसी भी ठोस सबूत की कमी और साथ में मेडिकल सबूतों को देखते हुए, अभियोजन पक्ष की थ्योरी बहुत ही संदिग्ध थी और उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।



