रविंद्र भवन में जीवंत हुआ ‘काकेशिया का चॉक सर्कल’, न्याय और ममता की मार्मिक कहानी ने छुआ दर्शकों का मन

भोपाल के रविंद्र भवन में 13 जून को विश्व प्रसिद्ध नाटक ‘द कॉकेशियन चॉक सर्कल’ (The Caucasian Chalk Circle) का मंचन किया गया। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय स्थित टैगोर नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के एम.ए. ड्रामेटिक्स फर्स्ट ईयर के विद्यार्थियों ने इस नाटक को मंच पर जीवंत कर दिया। रंगनिर्देशक अविजित सोलंकी ने जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त की इस कृति की मूल रंग-दृष्टि को बनाए रखा। दर्शक आखिरी तक अपनी सीटों से बंधे रहे। युद्ध, सत्ता, न्याय और मानवीय संवेदनाओं के इस मंचन को दर्शक मंत्रमुग्ध होकर निहारते रहे।
कहानी की शुरुआत काकेशिया में विद्रोह की आग भड़कने से शुरू होती है। जनाक्रोश के बीच ग्रैंड ड्यूक की सत्ता ध्वस्त हो जाती है और गवर्नर की हत्या कर दी जाती है। गवर्नर की पत्नी अपने वैभव और संपत्ति को बचाने की अफरातफरी में अपने बेटे को पीछे छोड़ देती है। ऐसे कठिन समय में ग्रुशा नामक साधारण सेविका उस बच्चे को बचाने का फैसला लेती है और अपनी जान जोखिम में डालकर उसे बचाने के लिए लंबी यात्रा पर निकल पड़ती है। युद्ध, भूख, विस्थापन और लगातार आने वाली कठिनाइयों के बीच ग्रुशा का संघर्ष नाटक की आत्मा बनकर उभरता है। छात्र और रंगकर्मी पूर्णिमा कुमारी ने ग्रुशा की भूमिका को इतने संवेदनशील और प्रभावशाली तरीके से अपने अभिनय में उतारा कि चरित्र की पीड़ा, साहस और मातृत्व को सजीव बना दिया।
कहानी में जब सालों बाद राजनीतिक परिस्थितियां बदलती हैं और पुरानी सत्ता की वापसी होती है, तब बच्चे के अधिकार को लेकर विवाद खड़ा हो जाता है। यह मामला अज़दक की अदालत तक पहुंचता है। एक ऐसे न्यायाधीश के सामने, जो कानून की किताब से ज्यादा न्याय की भावना को महत्व देता है। वह बच्चे को लेकर ऐसा फैसला करता है जो यह संदेश देता है कि किसी वस्तु या व्यक्ति पर अधिकार उसी का होना चाहिए जो उसकी सबसे अच्छी देखभाल करता है। वहां एक अनोखी परीक्षा के जरिए यह तय किया जाता है कि बच्चे का वास्तविक अधिकार किसे मिलना चाहिए।
युद्ध, सत्ता, न्याय और मानवता की पृष्ठभूमि में रचा गया यह नाटक स्वामित्व और उत्तरदायित्व के गहरे प्रश्न उठाता है। अज़दक की भूमिका में विजय सरदार ने अपनी सशक्त प्रस्तुति से दर्शकों का ध्यान खींचा। उनका किरदार कानून और न्याय के बीच के अंतर को सामने लाता है। वहीं लवकुश कुमार पंडित ने गवर्नर और आशुतोष अग्निहोत्री ने गवर्नर की पत्नी का किरदार बखूबी निभाया। इसके अलावा सुमित कुमार सागर ने साइमन शाशवा और दक्ष कौशिक ने संदेशवाहक एवं लावरेन्ती वस्नाद्ज़े की भूमिकाओं में प्रभावी अभिनय किया।
धर्मवीर चौधरी, दुर्गेश कुमार, मिहिर कसेरा और ऋषभ मालवीय द्वारा प्रस्तुत सामूहिक गायन ने इस नाटक को और जीवंत बना दिया। प्रस्तुति की एक बड़ी खासियत इसका सामूहिक सृजन था। नाटक के अनुवाद, रूपांतरण और संपादन में विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। कई गीत भी विद्यार्थियों द्वारा लिखे और संगीतबद्ध किए गए, जिससे प्रस्तुति में एक ताजगी और आत्मीयता महसूस हुई। ब्रेख्त के नाटक अपने समय और समाज के साथ संवाद स्थापित करते हैं। इसी भावना को ध्यान में रखते हुए इस प्रस्तुति को अपनी भाषा, अपनी रंग-संवेदना के अनुरूप रूपायित करने का प्रयास किया गया।
तकनीकी पक्ष भी प्रभावशाली रहा। सेट डिजाइन में करन कश्यप, ऋषभ मालवीय और प्रकाश गंगवार का काम सराहनीय रहा। किरण साहू की वेशभूषा, निखिल बंसल का प्रोजेक्शन डिज़ाइन, चैतन्य भट्ट का ध्वनि संयोजन, जीतू राभा की लाइट डिज़ाइन तथा तेजस्वी और अनिरुद्ध का संगीत नाटक के वातावरण को मजबूत बनाने में सफल रहा। सह-निर्देशक जीतू राभा और पूरी प्रोडक्शन टीम ने प्रस्तुति को सुव्यवस्थित रूप दिया।
टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय का एक आवासीय नाट्य शिक्षण संस्थान है, जिसकी स्थापना जुलाई 2021 में की गई। भारतीय रंग परंपराओं और समकालीन रंगमंचीय प्रवृत्तियों के मध्य संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से स्थापित यह संस्थान सघन एवं अभ्यास-आधारित नाट्य शिक्षा प्रदान करता है। संस्थान की शैक्षणिक दिशा वरिष्ठ शिक्षाविद् श्री संतोष चौबे के मार्गदर्शन में विकसित हुई है तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व निदेशक एवं वरिष्ठ रंगकर्मी श्री देवेंद्र राज अंकुर इसके सलाहकार के रूप में जुड़े हैं।


