त–ग़ज़ल के नाम रही सावन की सुहानी शाम

गीत–ग़ज़ल और कविताओं के शब्द जब बारिश की बूंदों के मानिंद रिमझिम फुहारों से झरनें लगे तो सावन की यह सुहानी शाम और अधिक खुशनुमा हो गई। यह शुभ अवसर बना नवनिर्मित ‘चतुर्वेदी भवन’ के उद्घाटन अवसर पर “पावस गीत–ग़ज़ल संगोष्ठी के यादगार आयोजन से। यह संगोष्ठी राष्ट्रीय वनमाली सृजन पीठ, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय,आईसेक्ट पब्लिकेशन एवं स्कोप ग्लोबल स्किल्स विश्वविद्यालय, भोपाल के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई।
उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर आईसेक्ट पब्लिकेशन द्वारा भोपाल के 10 वरिष्ठ शायरों की नये कलेवर में प्रकाशित किताबें अतिथियों द्वारा लोकार्पित की गई। इनमें बासित भोपाली, शेरी भोपाली,ताज भोपाली, कैफ़ भोपाली,असद भोपाली,साहिर भोपाली, अख्तर सईद खां, साजिद सजनी, जी एम नग़मी और शकीला बानो भोपाली शामिल हैं।
आज के फ़नकारों के लिए यह उर्दू से हिंदी में अनुवाद का नायाब तोहफा भी हैं। उर्दू शायरी की इन दस किताबों में ग़ज़लों का चयन श्री संतोष चौबे ने किया और संकलन श्री रफी शब्बीर ने किया है।
पावस गीत-ग़ज़ल संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए श्री संतोष चौबे, सुप्रसिद्ध कवि–कथाकार, कुलाधिपति रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय एवं निदेशक विश्व रंग ने कहा कि कला, साहित्य और संस्कृति के लिए इस भवन को आज समर्पित किया है। पावस संगोष्ठी इसकी माध्यम और आप सभी इसके साक्षी बने।
कार्यक्रम में बतौर विशिष्ट अतिथि डॉ. नुसरत मेहंदी, निदेशक, उर्दू अकादमी, म.प्र. ने इस महत्वपूर्ण आयोजन के लिए बधाई देते हुए कहा कि कला, साहित्य और संस्कृति के लिए श्री संतोष चौबे जी हमेशा ही सभी को एक नई रचनात्मक ऊर्जा से सराबोर कर देते हैं। इस नये भवन का निर्माण भी इसी सृजनात्मकता का एक ओर सोपान हैं।
इस अवसर डॉ. नुसरत मेहंदी ने सावन की सुहानी शाम में अपनी ग़ज़ल कहते हुए कहा –भूली -बिसरी हुई यादों को हवा देती हैं
बारिशें हिज्र का एहसास बढ़ा देती हैं
रक़्स करती हुई पानी में छमाछम बूंदें
शोर ख़ामोश समंदर में मचा देती हैं
डॉ. विनीता चौबे, कार्यकारी संपादक, ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए’ ने पारिवारिक पृष्ठभूमि की अपनी रचनाएँ सुनाई।
डॉ. रामवल्लभ आचार्य, वरिष्ठ गीतकार ने अपने गीत में बादल राग को कुछ इस तरह बयां किया–
हवाओं ने शंख फूँके
दिशाओं में बजे मादल ।
उमड़ करके घुमड़ करके
गगन में छा गये बादल ॥
श्री ऋषि श्रृंगारी ने गीत को जिंदगी का स्वर रेखांकित करते हुए कहा कि–
केवल उपक्रम भर हैं साँसें,
गीत मुझे जिंदा रखते हैं।।
खारापन छलकी आँखों का ,
अधरों से पहले चखते हैं।।
श्री राजेंद्र गट्टानी ने मुक्तक के माध्यम से किसानों की व्यथा को प्रस्तुत करते हुए कहा कि– फुहारें मेघ से बरसे, तभी धरती सँवरती है
उबरती है तपन से, लोक में उल्लास भरती है
मगर यह वेदना है, आज भी भारत के कृषकों की
नहीं झरते अगर बादल, तो उनकी आँख झरती हैं।
सुश्री ममता वाजपेयी ने अपने मधुर स्वर में गीत की प्रस्तुति देते हुए कहा कि– छाँव के नज़दीक आकर धूप ने
कान में कुछ कुनकुनी बातें कहीं
बात सुनते ही न जाने क्या हुआ
खिल गया मौसम बहारें आ गईं
लाज की झरने लगी मंदाकिनी
रूप की शीतल फुहारें छा गईं
रीझते मनुहारते परिवेश ने
प्रीति की घनघोर बरसातें कहीं
श्री अजय चौबे ने मानव जीवन के विभिन्न रिश्तों और उम्र के अलग अलग पड़ावों में प्रेम के विभिन्न रूपों को अपनी रचना में बहुत प्रेम से अभिव्यक्त किया।
श्री मनीष श्रीवास्तव ‘बादल’ पावस ऋतु पर केंद्रित दोहे सुनाते हुए कहा कि–
ताल भरे पोखर भरे, और भरे हैं कूप।
बादल आकर पी गए, चुभने वाली धूप।।
झूले पर कजरी चली, लगी फफूँद अचार।
खटिया टाँग उठा रही, सावन आया द्वार।।
श्री मोहन सगोरिया ने अपनी ग़ज़ल कहते हुए कहा कि–सच बोलने के तरीक़े बचाकर रख
पत्थर है तो आईने बचाकर रख
डॉ. मौसमी परिहार ने नवगीत में मन की बात को प्रस्तुत करते हुए कहा कि– पहले मन में बात रमी थी
अब बातों में मन रमता है…।
सुश्री प्रतिभा द्विवेदी ने अपने गीत में कहा कि–गीत गाती धरा,गुनगुनाती धरा
आई ऋतु सावनी,मुस्कुराती धरा।
गोष्ठी का सफल संचालन करते हुए ग़ज़लकार बद्र वास्ती ने अपने अंदाजे बयाँ कुछ इस तरह किये कि –जहाँ ख़ामोश रहना हो मैं अक्सर बोल देता हूँ
कहीं पत्थर नज़र आता है पत्थर बोल देता हूँ
किसी की सब की सब बातें तो अच्छी हो नहीं सकतीं
बुरा मैं इसलिए बनता हूँ मुँह पर बोल देता हूँ….
कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य–सुश्री ज्योति रघुवंशी, राष्ट्रीय संयोजक, वनमाली सृजन पीठ एवं प्रबंधक आईसेक्ट पब्लिकेशन व्यक्त करेंगी।
आभार श्री संजय सिंह राठौर द्वारा व्यक्त किया जाएगा।




