
कई लोग ये शिकायत लेकर आते हैं कि:- हमारी कुंडली में बहुत अच्छे योग हैं या राजयोग बन रहे हैं परंतु कोई शुभ फल नहीं मिल रहा, हम निरंतर परेशान हैं। ऐसी कुंडली वाले, कभी-कभी ज्योतिष या कुंडली को ही गलत मानने लगते हैं।
हम आज स्पष्ट करते हैं कि:- कुंडली में ये “7 दोष” ऐसे भी हैं जिनके होने पर बड़े से बड़ा राजयोग या शुभयोग भी निष्क्रिय पड़ जाता है। इन दोषों को “योगभंग” कहते हैं।
1️⃣ पितृ दोष – सबसे बड़ा “योगभंग” दोष…
कैसे बनता है:- 5वें भाव, 9वें भाव या सूर्य-चंद्र पर राहु, केतु, या शनि का प्रभाव हो।
क्यों राजयोग नहीं फलता: पितृ दोष का मतलब है पूर्वजों का ऋण/श्राप। चाहे कितने भी धन-राजयोग हों, पैसा टिकता नहीं, यश नहीं बनता, परिवार में निरंतर रोग, संतान तरक्की में रुकावट आती है बनते-बनते काम बिगड़ जाना, पिता से मतभेद, बिना कारण कर्ज।
👉🏿शास्त्र में कहा है:-
पितृदोषे सति सर्वं निष्फलं भवति ध्रुवम।
पुत्रपौत्रै: विना जातो धनहानिश्च जायते।।
(ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खण्ड)
अर्थ – पितृ दोष होने पर सब कर्म निष्फल हो जाता है, संतान समस्या एवं धनहानि होती है।
2️⃣ कालसर्प दोष
कैसे बनता है-: अन्य सभी 7 ग्रह राहु और केतु के बीच आ जाएं।
राहोश्च केतोश्च मध्ये ग्रहाः सर्वे यदि स्थिताः।
कालसर्पं तु तं दोषं वदन्ति मुनयो बुधाः॥
(स्रोत: नारद संहिता)
क्यों राजयोग नहीं फलता: कालसर्प वाले की कुंडली में “ग्रह प्रतिबंधन” हो जाता है। ग्रह बंधे हुए होते हैं। “राजयोग” होने पर भी उसका फल 36-42 साल बाद मिलता है, या मिलकर अंततः छिन जाता है। संघर्ष ज्यादा, सफलता देर से, अचानक पतन। अनुभव में देखा गया है कि कालसर्प वाले के पास धन तो आता है, लेकिन बीमारी, मुकदमा, धोखे में चला जाता है और जब जाता हैं तो मान-प्रतिष्ठा सहित बहुत कुछ ले जाता है।
3️⃣ ग्रहण दोष
कैसे बनता है:- सूर्य या चंद्र के साथ राहु-केतु की युति।
राहुग्रस्ते शशिनि सूर्ये च जातस्य जातस्य यः।
सदा ग्रहणसंयुक्तो भवति दुःखभाग् भवेत्।।
(स्रोत: फलदीपिका 23.12)
अर्थ: जिसकी कुंडली में सूर्य-चंद्र राहु-केतु से ग्रस्त हों, वह सदा दुःख भोगता है।
क्यों राजयोग नहीं फलता: सूर्य आत्मा, नाम, सरकार का कारक है। चंद्र मन, सुख, जनता का कारक है। इन पर ग्रहण लगने से राजयोग का “नाम और सम्मान” वाला फल नहीं मिल पाता।
बदनामी, मानसिक अशांति, सरकार से दिक्कत, माँ-बाप को कष्ट।
चंद्र ग्रहण दोष हो तो लक्ष्मी योग भी टिकता नहीं। धन रुकता नहीं है।
4️⃣ केमद्रुम दोष
कैसे बनता है:- चंद्र के आगे-पीछे किसी भाव में कोई ग्रह न हो, और चंद्र कुंडली में कमजोर हो।
केमद्रुमे जाते नरो दरिद्रः भ्रमते महीम्।
नष्टार्थो दुःखसन्तप्तो नीचकर्मरतः सदा॥
(स्रोत: बृहत्पराशर होरा शास्त्र 33.30)
अर्थ:-केमद्रुम वाला दरिद्र, भटकने वाला, दुखी, नीच कर्म करने वाला होता है, चाहे राजयोग हों।
क्यों राजयोग नहीं चलता: चंद्र मन का कारक है। केमद्रुम होने पर मन अस्थिर रहता है। इंसान सही निर्णय नहीं ले पाता। राजयोग मिले भी तो उसे संभाल नहीं पाता। अकेलापन, डिप्रेशन, धन होते हुए भी सुख नहीं, असहज रहना।
5️⃣ शकट दोष
कैसे बनता है:- गुरु से 6ठे या 8वें भाव में चंद्र हो।
गुरोः षष्ठाष्टमे चन्द्रे शकटं नाम तद् विदुः।
तत्र जातो नरो दुःखी भ्रमते नात्र संशयः॥
(स्रोत: फलदीपिका 24.15)
अर्थ: गुरु से 6ठे या 8वें में चंद्र होने पर शकट योग होता है। इसमें जन्मा व्यक्ति दुखी और भटकता रहता है।
क्यों राजयोग नहीं चलता: गुरु ज्ञान, भाग्य, धन का कारक है। चंद्र मन है। शकट दोष में मन और भाग्य में तालमेल नहीं बैठता। सालभर पढ़ाई करने बाद भी पेपर में भूल जाना, मेहनत का फल न मिलना, बार-बार नौकरी/बिजनेस बदलना, ज्ञान का लाभ ना मिलना, भाग्य साथ न देना।
राजयोग का लाभ भी शकट दोष में दब जाता है।
6️⃣ मारकेश और बाधकेश का प्रभाव
कैसे बनता है:- 2रे, 7वें, 8वें भाव के स्वामी या बाधक स्थान के स्वामी की दशा-अंतर्दशा में राजयोग आ जाए।
मारकेशे बाधकेशे च दशायां योगसंयुते।
योगोऽपि निष्फलो याति धनहानिः शरीरगः॥
(स्रोत: बृहत्जातक 18.12)
अर्थ: मारकेश या बाधकेश की दशा में राजयोग आने पर वह निष्फल हो जाता है और धन-शरीर की हानि होती है।
क्यों राजयोग नहीं चलता: मारकेश मौत, बाधकेश रुकावट का कारक है। इनकी दशा में राजयोग सिर्फ दिखावा रह जाता है। पैसा आता है तो अस्पताल, कोर्ट, एक्सीडेंट में चला जाता है। राजयोग के समय में ही बड़ा नुकसान, स्वास्थ्य खराब।
7️⃣ त्रकोणाधिपती 6,8,12 भाव में हों पाप ग्रहों से पीड़ित होना
कैसे बनता है: – लग्नेश, पंचमेश, नवमेश 6,8,12 में हों एवं पाप ग्रहों से पीड़ित हों।
त्रिकोणाधिपतौ दुःस्थे पापैर्दृष्टे च पीडिते।
राजयोगोऽपि निष्फलः स्यात् दुःखं चिरं भवेत्॥
(स्रोत: जातक पारिजात 2.23)
अर्थ: त्रिकोण के स्वामी दुःस्थान में हों और पाप ग्रहों से पीड़ित हों, तो राजयोग भी निष्फल हो जाता है और लंबे समय तक दुख रहता है।
क्यों राजयोग नहीं चलता: 1,5,9 भाव त्रिकोण हैं – यही राजयोग के असली घर हैं। ये भाव पीड़ित हों तो राजयोग बनने से पहले ही कमजोर हो जाता है।
शिक्षा, संतान, भाग्य में रुकावट, लम्बे समय तक परेशानियां। चूंकि ये धर्म त्रकोण भाव है, इसलिऐ धर्म कार्यों में कम रुची एवं पाप कार्यो में अधिक रुचि।।
राजयोग होने पर भी जीवन में स्थिरता नहीं आती।
प्रश्न:- तो क्या राजयोग बेकार हो जाता है?
नहीं…. ये दोष राजयोग को “फ्रीज” कर देते हैं। सही उपाय करने पर राजयोग देर से ही सही लेकिन मजबूत फल देता है।
प्रायश्चित्तं कुर्वीत दोषशान्त्यै द्विजाग्रतः।
ततो योगः फलं दद्यात् कालेन महता अपि॥
(स्रोत: धर्मसिंधु 3.2.15)
अर्थ: दोष शांति के लिए ब्राह्मण के सम्मुख प्रायश्चित्त कर्म करो। तब राजयोग समय लगने पर भी फल देता है।
अब सामान्य उपाय:
1.पितृ दोष पित्र शांति, वैदिक रीति से श्राद्ध व तर्पण, श्रमद भागवत कथा या मूलपाठ, “ॐ पितृभ्यः स्वधायै स्वधा नमः” का जाप
2.कालसर्प – उज्जैन या त्र्यंबकेश्वर में कालसर्प अनुष्ठान, सवालक्ष “ॐ नमः शिवाय” जाप।।
3.ग्रहण दोष – सूर्य-चंद्र का दान, सूर्य ग्रहण के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ एवं चंद्र ग्रहण के लिए रुद्राभिषेक।।
4.केमद्रुम – चंद्र का दान, चंद्रमन्त्र जाप, दुग्धाभिषेक, सोमवार व्रत-पूजन। “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्राय नमः” जाप।
5.शकट दोष – गुरु-चंद्र की पूजा, पीला-सफेद दान।।
कैसे पता करें आपके साथ ऐसा है?
अगर आपकी कुंडली में:
लग्नेश- पंचमेश- नवमेश मजबूत हों, राजयोग हो लेकिन जीवन में संघर्ष ज्यादा हो, सफलता देर से मिले, वंशवृद्धि या उन्नति में बाधाएं, संतान या माता-पिता से संबंध खराब होने लगें, सब कुछ होने पर भी मन खिन्न रहे, परिवार में रोग बने ही रहते हों, आर्थिक परेशानी बनी रहे या पैसा आकर चला जाए।
तो समझो कोई योगभंग करने वाला दोष है।
नोट:- सर्वश्रेष्ठ तो यही होगा कि किसी योग्य विद्वान आचार्य से उचित परामर्श लेकर विद्वान के मार्गदर्शन में उचित शांति विधान करें।
।। समस्याएं अनेक, समाधान एक।।
-:भेरवी साधक:-
धर्मगुरू- पं. कृपाराम उपाध्याय “राजज्योतिषी”
(ज्योतिष-तंत्र सम्राट एवं सैकड़ों अवार्ड व उपाधियों से सम्मानित)
भोपाल, मोबा- 7999213943
🙏जय भैरवी
