पृथ्वी को बचाना है तो आदिवासी जीवन-दर्शन अपनाना होगा
प्रथम अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक महोत्सव–2026 का भव्य आयोजन सम्पन्न

देश के 10 से अधिक राज्यों से 300 से अधिक साहित्यकार, कलाकार, शोधकर्ता एवं बुद्धिजीवी हुए शामिल
भोपाल, 29 जून । यदि पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षित रखना है तो आदिवासी जीवन-दर्शन, प्रकृति के प्रति सम्मान और सह-अस्तित्व की संस्कृति को अपनाना होगा। ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकटों का स्थायी समाधान आदिवासी जीवन शैली में निहित है। जंगल बचेंगे तभी पृथ्वी बचेगी, और जंगल बचाने के लिए ‘टाइगर और ट्राइबल’ दोनों का संरक्षण समान रूप से आवश्यक है।” यह विचार सामाजिक चिंतक, पर्यावरणविद् एवं पराक्रम जनसेवी संस्थान के संस्थापक शरद सिंह कुमरे ने व्यक्त किए।
मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (MANIT), भोपाल में प्रथम अखिल भारतीय आदिवासी साहित्यिक महोत्सव–2026 का भव्य एवं ऐतिहासिक आयोजन पराक्रम जनसेवी संस्थान एवं GIVEN (Global Indigenous Voice for Education, Environment, Equity, Empowerment, Earth & Nature) के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न हुआ।
महोत्सव में मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, दादरा एवं नगर हवेली सहित देश के 10 से अधिक राज्यों से आए 300 से अधिक साहित्यकारों, कवियों, लेखकों, शोधकर्ताओं, लोक कलाकारों, शिक्षाविदों, समाजसेवियों, अधिकारियों, युवाओं एवं महिलाओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
अपने संबोधन में शरद सिंह कुमरे ने कहा कि आदिवासी साहित्य केवल शब्दों का सृजन नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति, इतिहास, परंपरा और मानवीय मूल्यों का जीवंत दस्तावेज है। ऐसे राष्ट्रीय आयोजन जनजातीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के साथ-साथ उसे राष्ट्रीय एवं वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।
महोत्सव के अंतर्गत परिचय सत्र, साहित्यिक गोष्ठियाँ, कविता पाठ, लोक साहित्य परिचर्चा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ, लोकनृत्य, लोकगायन, पारंपरिक वाद्ययंत्रों का प्रदर्शन तथा आदिवासी भाषा, साहित्य, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, महिला सशक्तिकरण एवं जनजातीय अस्मिता जैसे विषयों पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श आयोजित किए गए।
इस अवसर पर मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विलफ्रेड लकड़ा, पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं साहित्यकार अशोक शाह, पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक अनुराधा शंकर सिंह, अतिरिक्त प्रमुख मुख्य वन संरक्षक आज़ाद डबास (IFS), मुख्य वन संरक्षक रमेश गनावा (IFS), चीफ इंजीनियर जे. एस. कुसरे, गुजरात के प्रख्यात समाजसेवी डॉ. प्रदीप गरासिया, अपर कलेक्टर जे. पी. सैयाम, जीएसटी उपायुक्त कुंजलता परमार, प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मी कुमरे, केवल परते, आकाशवाणी भोपाल के कार्यक्रम अधिकारी आनंद उद्दे, वरिष्ठ साहित्यकार वसंत निर्गुड़े, राष्ट्रीय जैव विविधता सम्मान से सम्मानित रविंद्र कुशवाहा, एच. एस. आर्मो, प्रभुलाल परतेती, टी. एस. टेकाम, गोंडी चित्रकार आनंद श्याम, योगाचार्य आर. एन. ठाकुर, कवयित्री उर्मिला कुमरे, मंगला गरवाल, बसंत कावड़े, डॉ. तुलसीराम वरकड़े, अरविंदभाई पटेल सहित अनेक विशिष्ट अतिथियों ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति एवं मार्गदर्शन प्रदान किया।
देशभर से आए प्रतिभागियों ने एक स्वर में कहा कि आदिवासी साहित्य, भाषा और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए इस प्रकार के राष्ट्रीय महोत्सव नियमित रूप से आयोजित किए जाने चाहिए, ताकि जनजातीय समाज की समृद्ध बौद्धिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर सशक्त पहचान मिल सके।
कार्यक्रम ने विभिन्न राज्यों के साहित्यकारों, कलाकारों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच संवाद, सहयोग, सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा भावी साझा पहलों के लिए एक सशक्त राष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराया। यह उल्लेखित है कि सभी साहित्यकारों,लेखकों और कवियों का आदिवासी गौरव सम्मान से सम्मान दिया गया। साथ ही प्रत्येक सहभागिता करने वाले कोप्रमाण पत्र एवं एक कपड़े का थैला दिया गया जिसमें लिखा था थैले को हाँ पॉलिथीन को ना। जो पर्यावरण को बचाने बहुत महत्वपूर्ण है।🙏
अंत में आयोजन समिति ने सभी विशिष्ट अतिथियों, प्रतिभागियों, सहयोगी संस्थाओं, मीडिया प्रतिनिधियों एवं स्वयंसेवकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए इस महोत्सव को भारतीय आदिवासी साहित्य एवं संस्कृति के इतिहास में एक ऐतिहासिक और मील का पत्थर बताया।



