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हिन्दी पत्रकारिता के भविष्य पर देश के दिग्गज पत्रकारों और साहित्यकारों का मंथन, आरएनटीयू की राष्ट्रीय संगोष्ठी में साहित्य, संस्कृति और विज्ञान पत्रकारिता पर हुए चार महत्वपूर्ण सत्र

हिन्दी पत्रकारिता का भविष्य साहित्य, संवेदनशीलता और विश्वसनीयता से तय होगा: आरएनटीयू की राष्ट्रीय संगोष्ठी में वक्ताओं का मंथन

भोपाल। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय (आरएनटीयू) में हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन शुक्रवार को शारदा सभागार में उद्घाटन सत्र का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत अनिरुद्ध जोशी के सितार वादन से हुई। “समकालीन हिंदी पत्रकारिता : परंपरा, परिवर्तन और भविष्य” विषय पर आयोजित इस सत्र में देश के वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने पत्रकारिता की गौरवशाली परंपरा, वर्तमान चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तार से विचार रखे।

उद्घाटन सत्र में वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर, ओम थानवी, विजय मनोहर तिवारी और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और साहित्यकार संतोष चौबे ने हिन्दी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा पर अपने विचार व्यक्त किए। वहीं टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र के निदेशक विनय उपाध्याय ने कार्यक्रम का संचालन किया। साथ ही इस सत्र में कुलसचिव डॉ. संगीता जौहरी ने आभार प्रदर्शित किया।

उद्घाटन सत्र में माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलगुरु विजय मनोहर तिवारी ने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में समाचार पत्रों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने फेक न्यूज, मोबाइल आधारित पत्रकारिता और डिजिटल दौर की चुनौतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पत्रकारिता में जिम्मेदारी और नियमन दोनों आवश्यक हैं। उन्होंने मुख्यधारा से छूट रहे “असल भारत” की आवाज़ को सामने लाने पर भी बल दिया।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना देने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में विवेक और समझ विकसित करने का दायित्व भी निभाती है। उन्होंने मीडिया की बदलती प्राथमिकताओं, टेलीविजन के मनोरंजन प्रधान स्वरूप और प्रिंट मीडिया की विश्वसनीयता पर भी अपने विचार रखे।

वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर ने कहा कि स्वतंत्रता पूर्व की पत्रकारिता राष्ट्रनिर्माण के संकल्प से प्रेरित थी, जबकि आज बाजारवाद और संसाधनों का बढ़ता प्रभाव पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी कर रहा है। उन्होंने कहा कि समाचार पत्र केवल व्यवसाय नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व का माध्यम हैं और प्रिंट मीडिया पर जनता का भरोसा आज भी सबसे अधिक है।

संगोष्ठी के संयोजक एवं साहित्यकार संतोष चौबे ने कहा कि साहित्य, कला और संस्कृति मनुष्य को मानवीय मूल्यों से जोड़ते हैं। उन्होंने विज्ञान और साहित्य के संतुलन, पत्रकारिता में विज्ञान लेखन के घटते स्थान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की चुनौतियों तथा बदलते वैश्विक परिदृश्य पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सृजनात्मकता और मानवीय संवेदनाओं को बचाए रखना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

उद्घाटन सत्र के दौरान ‘विश्वमय हिन्दी पत्रकारिता’ सहित दो पुस्तकों का विमोचन किया गया। इसके साथ ही शोध संगोष्ठी की स्मारिका का विमोचन भी किया गया।

हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य के स्थान पर चर्चा

दूसरे सत्र में “मुख्यधारा की हिन्दी पत्रकारिता में साहित्य का स्थान” विषय पर साहित्य और पत्रकारिता के संबंधों पर व्यापक चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता डॉ. सुधीश पचौरी ने की। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि साहित्य और पत्रकारिता के उद्देश्य अलग-अलग हैं। एक समाज परिवर्तन का स्वप्न देखता है, जबकि दूसरा व्यावसायिक ढांचे के भीतर संचालित होता है।

वहीं संदीप अवस्थी ने कहा कि साहित्य मनुष्य को तनावमुक्त करने के साथ उसकी संवेदनाओं को समृद्ध करता है। मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि आज एल्गोरिद्म यह तय कर रहे हैं कि समाज क्या पढ़े और क्या देखे। साथ ही वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन ने कहा कि मुख्यधारा के मीडिया में साहित्य का स्थान लगातार सीमित होता जा रहा है जिससे साहित्य और पत्रकारिता के बीच दूरी बढ़ी है।

बलराम गुमास्ता ने कहा कि आज मानवीय संवेदनाओं तथा सामाजिक मूल्यों की रक्षा साहित्य और पत्रकारिता दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

समकालीन हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता पर चर्चा

तीसरे सत्र में “समकालीन हिन्दी साहित्यिक पत्रकारिता का परिदृश्य और वनमाली कथा” विषय पर चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता संतोष चौबे ने की। इस सत्र में पंकज सुबीर, क्षमा शर्मा, अखिलेश मुकेश वर्मा, गीताश्री सहित अन्य वक्ताओं ने साहित्यिक पत्रकारिता के बदलते परिदृश्य और समकालीन चुनौतियों पर अपने विचार व्यक्त किए।

विज्ञान पत्रकारिता पर भी हुआ मंथन

दिन के चौथे सत्र में “वर्तमान परिवेश में विज्ञान पत्रकारिता : विशेष संदर्भ ‘इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए'” विषय पर चर्चा हुई। सत्र की अध्यक्षता मनोज कुमार पटेरिया ने की। इसमें देवेंद्र मेवाड़ी, कृष्ण कुमार मिश्र, मनीष मोहन गोरे और समीर गांगुली ने सहभागिता की। संवाद में कुमार सुरेश, वीणा सिन्हा और राग तेलंग शामिल हुए तथा संचालन मोहन सगोरिया ने किया।

शोध संगोष्ठी पर विशोष सत्र आयोजित

राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतर्गत आयोजित विशेष सत्र में विश्वविद्यालयीन छात्रों द्वारा शोध पत्रों की प्रस्तुति दी गई। सत्र की अध्यक्षता डॉ. मुकेश मिश्रा (निर्देशक, दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान) ने की। इस अवसर पर डॉ. सावित्री सिंह परिहार एवं डॉ. स्मिता तिवारी ने विशेषज्ञ के रूप में शोध पत्रों पर अपने विचार और सुझाव प्रस्तुत किए। सत्र का संयोजन डॉ. विशाखा राजूरकर राज एवं डॉ. योगेश पटेल ने किया। शोधार्थियों ने समकालीन पत्रकारिता और जनसंचार से जुड़े विभिन्न विषयों पर अपने शोध प्रस्तुत किए, जिन पर विशेषज्ञों ने अकादमिक दृष्टि से उपयोगी मार्गदर्शन प्रदान किया।

दिनभर चले विभिन्न सत्रों में पत्रकारिता के दो सौ वर्षों की यात्रा, साहित्य, संस्कृति, विज्ञान पत्रकारिता, तकनीकी बदलाव, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मीडिया के भविष्य पर गंभीर विमर्श हुआ। विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. आर.पी. दुबे सहित देशभर से आए वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार, शिक्षाविद, शोधार्थी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।

बता दें कि अंतिम दिन 11 जुलाई को पत्रकारिता, संस्कृति, कला और वैश्विक परिदृश्य से जुड़े विषयों पर सत्र आयोजित किए जाएंगे। “रंगसंवाद : संस्कृति और सृजन” विषय पर विशेष परिचर्चा भी आयोजित होगी। साथ ही हिंदी पत्रकारिता के इतिहास और विभिन्न पत्रिकाओं के नवीन अंकों का लोकार्पण भी होगा।

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