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जिनेवा में अमेरिका-ईरान वार्ता का दूसरा दौर, ओमान करेगा मध्यस्थता; अब्बास अराघची भी पहुंचे

जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत होगी। इसके लिए ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची जिनेवा पहुंच रहे हैं। बता दें कि दोनों देशों के बीच सीधे नहीं, बल्कि ओमान की मध्यस्थता से बातचीत होगी। जानकारी के मुताबिक, अराघची स्विट्जरलैंड, ओमान के नेताओं और आईएईए प्रमुख से भी मिलेंगे।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची रविवार को तेहरान से स्विट्जरलैंड के जिनेवा शहर के लिए रवाना हो गए। वहां अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु मुद्दे पर बातचीत का दूसरा दौर होना है। ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी आईआरएनए के अनुसार, यह बातचीत सीधे नहीं बल्कि ‘अप्रत्यक्ष तरीके’ से होगी। यानी दोनों देशों के प्रतिनिधि एक ही जगह पर रहेंगे, लेकिन बातचीत ओमान के जरिए करवाई जाएगी। पिछले हफ्ते भी दोनों देशों के बीच पहली बैठक ओमान में इसी तरह हुई थी।

बैठक में ओमान निभाएगा मध्यस्थता
इस बार जिनेवा में होने वाली बैठक में ओमान के अधिकारी बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाएंगे। ईरान के विदेश मंत्री अपने स्विस और ओमानी समकक्षों से भी अलग-अलग मुलाकात करेंगे। साथ ही वे अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के प्रमुख से भी मिल सकते हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बातचीत?
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव चल रहा है। अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे न बढ़े। वहीं ईरान कहता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। इसलिए यह वार्ता दोनों देशों के रिश्तों और वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से काफी अहम मानी जा रही है।

अमेरिका प्रतिबंध हटाए तो परमाणु कार्यक्रम पर चर्चा को तैयार- तख्त-रवांची
वहीं ईरान ने कहा कि वह परमाणु समझौते तक पहुंचने के लिए कुछ समझौतों पर विचार कर सकता है। बशर्ते, अमेरिका प्रतिबंध हटाने पर चर्चा को तैयार हो। ईरानी उपविदेश मंत्री माजिद तख्त-रवांची ने रविवार को एक न्यूज एजेंसी को दिए एक साक्षात्कार में यह बात कही। तख्त- रवांची ने कहा, ईरान प्रतिबंध हटाने के बदले अपने परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने पर चर्चा करने को तैयार है। उन्होंने कहा, यह साबित करने की जिम्मेदारी अब अमेरिका पर है कि वे समझौता करना चाहते हैं। अगर वे ईमानदार हैं तो मुझे यकीन है कि हम समझौते की ओर अग्रसर होंगे।

वहीं, अमेरिकी अधिकारी बार-बार कहते रहे हैं कि परमाणु वार्ता में प्रगति रुकने की वजह ईरान है, न कि अमेरिका। शनिवार को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी कहा था कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समझौते को प्राथमिकता देते हैं लेकिन ईरान के साथ समझौता करना बहुत मुश्किल है। परमाणु वार्ता का दूसरा दौर मंगलवार को जिनेवा में शुरू होगा। ईरानी मंत्री ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि शुरुआती बातचीत कमोबेश सकारात्मक दिशा में रही, लेकिन नए दौर की वार्ता के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। तेहरान और वाशिंगटन ने इस महीने की शुरुआत में ओमान में बातचीत फिर से शुरू की थी।

‘मिसाइल प्रोजेक्ट पर बात नहीं करेगा ईरान’
तख्त-रवांची ने दोहराया कि ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल प्रोजेक्ट पर बातचीत नहीं करेगा। यह मुद्दा इस्राइल और अमेरिका दोनों उठाते रहे हैं। उन्होंने कहा, जब हम पर इस्राइल और अमेरिका ने हमला किया तो हमारी मिसाइलों ने हमारी रक्षा की। हम अपनी रक्षात्मक क्षमता से खुद को कैसे वंचित कर सकते हैं? एक सूत्र ने बताया कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल मंगलवार सुबह ईरानियों से मुलाकात करेगा। ओमान के प्रतिनिधि अमेरिका और ईरान के संपर्कों के बीच मध्यस्थता करेंगे। प्रतिनिधिमंडल में पश्चिम एशिया के विशेष राजदूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर शामिल हैं।

‘यूरेनियम संवर्धन शून्य करना स्वीकार्य नहीं’
तख्त- रवांची ने तेहरान के रुख को दोहराया कि वह शून्य यूरेनियम संवर्धन को स्वीकार नहीं करेगा। यह मुद्दा पिछले साल समझौते तक पहुंचने में एक बड़ा रोड़ा बना था। अमेरिका, ईरान के भीतर संवर्धन को परमाणु हथियार बनाने का जरिया मानता है। हालांकि, ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश से हमेशा इनकार करता रहा है।

‘केवल परमाणु के मुद्दे पर चर्चा चाहता है ईरान’
ईरान की मुख्य मांग यह है कि वार्ता केवल परमाणु मुद्दे पर केंद्रित होनी चाहिए। तख्त- रवांची ने कहा, हमारे मानना है कि यदि आप कोई समझौता करना चाहते हैं तो आपको परमाणु मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना होगा। यदि इसकी पुष्टि हो जाती है, तो यह ईरान के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

अमेरिका ने दी है हमले की धमकी
यदि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंकुश लगाने के लिए कोई समझौता नहीं हो पाता है तो ट्रंप ने ईरान पर हमले की धमकी दी है। अमेरिका इस क्षेत्र में लगातार अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा रहा है। यह घटना पिछले महीने ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दमन के बाद हुई। मानवाधिकार समूहों के अनुसार, इस दौरान हजारों लोग मारे गए।

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