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राघव चड्ढा का बदला पूरा!. कहा था, ‘घायल हूं, इसलिए घातक हूं’.. उठाया ऐसा कदम कि, अंदर तक हिली आम आदमी पार्टी

सात सांसदों के इस्तीफे से AAP को बड़ा राजनीतिक झटका

नई दिल्ली: राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह और स्वाति मालीवाल जैसे प्रमुख चेहरों सहित सात सांसदों के शुक्रवार को आम आदमी पार्टी (आप) छोड़ने के साथ, न केवल संसद में ‘आप’ का संख्या बल घटा है, बल्कि आगामी चुनावों के लिए उसकी तैयारियों में भी बाधा उत्पन्न हुई है। (Aam Aadmi Party Raghav Chadha News) बीते दो साल पार्टी के लिए काफी उथल-पुथल भरे रहने की पृष्ठभूमि में यह घटनाक्रम हुआ।

क्या आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों एवं मूल्यों से भटक गई है?

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित इसके कई शीर्ष नेताओं को आबकारी नीति ‘घोटाले’ के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उस दौरान, चड्ढा सहित दूसरी पंक्ति के नेता सरकार और संगठन, दोनों को सुचारू रूप से चलाने के लिए आगे आए थे। इन सात सांसदों में से कई को पार्टी की पहुंच को आकार देने में प्रमुख स्तंभ के रूप में देखा जा रहा था – चाहे वह नीतिगत अभिव्यक्ति हो, संगठनात्मक रणनीति हो, वित्त हो या फिर सार्वजनिक रूप से संदेश देना हो।

अब, उनके एक साथ पार्टी छोड़ कर जाने को एक नियमित राजनीतिक बदलाव से कहीं अधिक एक संगठनात्मक नुकसान के रूप में देखा जा रहा है। चड्ढा ने शुक्रवार को कहा कि सात सांसदों ने भाजपा में विलय कर लिया है और दावा किया कि आम आदमी पार्टी अपने सिद्धांतों एवं मूल्यों से भटक गई है। चड्ढा के अलावा, पाठक, मित्तल, सिंह और मालीवाल, राजेंद्र गुप्ता और विक्रम साहनी ने भी केजरीवाल के नेतृत्व वाली पार्टी छोड़ दी है। (Aam Aadmi Party Raghav Chadha News) ‘आप’ के सात सांसदों के इस्तीफे का समय पार्टी के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

पार्टी अगले साल गुजरात, गोवा और पंजाब में होने वाले चुनावों की तैयारी कर रही है। दिल्ली में पार्टी तीन बार सरकार बना चुकी है और उसका मजबूत जनाधार है। ‘आप’ नेताओं ने कहा कि पार्टी के जमीनी स्तर से जुड़ाव और शासन के सिद्धांत, नेताओं के जाने के बावजूद बरकरार हैं। पार्टी पंजाब में सत्ता में बनी हुई है और दिल्ली में भी उसकी उपस्थिति बरकरार है। साथ ही गुजरात और जम्मू कश्मीर में भी उसकी कुछ हद तक पहुंच है। हालांकि, राज्यसभा में उसके सदस्यों की संख्या 10 से घटकर महज तीन रह जाने के बाद अब सदन में उसकी मुखरता पर असर पड़ सकता है।

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