अप्रैल से प्रारंभ होने वाला शैक्षणिक सत्र : क्या वास्तव में व्यवहारिक है?



भोपाल –पिछले आठ-दस वर्षों से मध्य प्रदेश सहित देश के अनेक राज्यों तथा केंद्रीय बोर्डों में 1 अप्रैल से नया शैक्षणिक सत्र प्रारंभ करने की व्यवस्था लागू की गई है। कागज़ों में तो नया सत्र अप्रैल से प्रारंभ हो जाता है, परंतु वास्तविक स्थिति इससे भिन्न दिखाई देती है। अधिकांश विद्यालयों में न तो समय पर पाठ्यपुस्तकें पहुँच पाती हैं और न ही नियमित अध्ययन-अध्यापन व्यवस्थित रूप से शुरू हो पाता है। अप्रैल माह में ही मध्य प्रदेश सहित देश के अधिकांश मैदानी और प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में तेज गर्मी प्रारंभ हो जाती है। ऐसी स्थिति में सरकारों को 10-12 अप्रैल के बाद ग्रीष्मकालीन अवकाश घोषित करना पड़ता है। परिणामस्वरूप अप्रैल से प्रारंभ किया गया नया सत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।
इसके बाद जून में विद्यालय पुनः खुलते हैं, लेकिन उस समय भी भीषण गर्मी के कारण विद्यार्थियों की उपस्थिति सामान्य नहीं रह पाती। छोटे बच्चों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों को विशेष कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थितियों में विद्यालयीन शिक्षा को व्यवस्थित रूप से संचालित करना कठिन हो जाता है।
अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ करने और दो-दो बोर्ड परीक्षाओं की व्यवस्था के कारण सरकारें वार्षिक परीक्षाएँ जनवरी के अंतिम सप्ताह में प्रारंभ करके फरवरी में ही समाप्त करवाने लगी हैं। कक्षा 1 से 8 तक के परीक्षा परिणाम प्रायः मार्च के अंत तक घोषित कर दिए जाते हैं, जबकि बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम भी अप्रैल के दूसरे सप्ताह तक जारी हो जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य नए सत्र को समय पर प्रारंभ करना बताया जाता है, किंतु इसका प्रभाव विद्यार्थियों की पढ़ाई और शैक्षणिक गुणवत्ता पर स्पष्ट दिखाई देता है।
इस बार Central Board of Secondary Education (सीबीएसई) द्वारा उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन स्कैन कॉपियों के माध्यम से किया गया। इस प्रक्रिया को लेकर विद्यार्थियों और अभिभावकों ने अनेक आपत्तियाँ उठाईं। कई छात्रों ने मूल्यांकन में त्रुटियों, अंक निर्धारण में असंगतियों तथा उत्तरों के सही मूल्यांकन न होने जैसी शिकायतें कीं। इससे परीक्षा परिणामों को लेकर संदेह का वातावरण भी बना। वास्तव में इस नई प्रक्रिया के लिए पूर्व तैयारी, स्पष्ट निर्देश और व्यवस्थित प्रशिक्षण का अभाव दिखाई दिया।
केंद्र और राज्य सरकारें अप्रैल से शैक्षणिक सत्र प्रारंभ करने की नीति के अनुरूप विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थानों तथा मेडिकल, प्रबंधन और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की पूरी प्रक्रिया शीघ्र पूरी करवाना चाहती हैं। इसी कारण राज्य शिक्षा मंडलों और केंद्रीय बोर्डों की परीक्षाएँ समय से पहले आयोजित की जा रही हैं। उद्देश्य यह बताया जाता है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश प्रक्रिया जल्दी पूरी हो और नया सत्र समय पर प्रारंभ हो सके।
लेकिन इस व्यवस्था का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह है कि भले ही सत्र अप्रैल से घोषित कर दिया जाए, व्यवस्थित पढ़ाई वास्तव में जुलाई के प्रथम सप्ताह से ही प्रारंभ हो पाती है। अप्रैल-मई की गर्मी, समयपूर्व अवकाश और जून में कम उपस्थिति के कारण अध्ययन प्रभावित रहता है। दूसरी ओर वर्ष भर आंतरिक मूल्यांकन, स्थानीय परीक्षाएँ और वार्षिक परीक्षाएँ फरवरी-मार्च में आयोजित कर दी जाती हैं, जिससे विद्यार्थियों को पूरे पाठ्यक्रम के अध्ययन और पुनरावृत्ति के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति के स्थान पर केवल परीक्षा प्रक्रिया तक सीमित होकर रह जाता है।
सरकार को अपनी संपूर्ण शैक्षणिक योजना और वर्तमान सत्र व्यवस्था पर गंभीरतापूर्वक पुनर्विचार करना चाहिए। भारत की भौतिक और जलवायु परिस्थितियों को देखते हुए विद्यालयों को पूर्व की भाँति जून के अंतिम सप्ताह अथवा जुलाई से प्रारंभ किया जाना अधिक व्यावहारिक और विद्यार्थियों के हित में होगा। वार्षिक परीक्षाएँ मार्च और अप्रैल के प्रथम सप्ताह में आयोजित की जानी चाहिए ताकि छात्रों को पूरे सत्र का पर्याप्त अध्ययन समय मिल सके।
साथ ही विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रियाएँ, Common University Entrance Test (सीयूईटी) जैसी चयन परीक्षाएँ तथा मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाएँ ग्रीष्मावकाश के दौरान आयोजित की जा सकती हैं, जिससे जुलाई से विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों का सत्र व्यवस्थित रूप से प्रारंभ हो सके।
भारत जैसे विशाल और विविध जलवायु वाले देश में अप्रैल, मई और जून के महीने अधिकांश क्षेत्रों में अत्यधिक गर्म होते हैं। इसलिए विद्यार्थियों के लिए इन महीनों में अवकाश अधिक उपयुक्त रहेगा, जबकि जुलाई से अप्रैल के मध्य तक अध्ययन और परीक्षा संबंधी गतिविधियाँ संचालित की जा सकती हैं। यह व्यवस्था पहाड़ी राज्यों, तटीय क्षेत्रों, मध्य भारत और मैदानी क्षेत्रों—सभी के लिए अधिक संतुलित और व्यवहारिक सिद्ध हो सकती है।
अतः आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें वर्तमान शैक्षणिक सत्र प्रणाली की गंभीर समीक्षा करें और ऐसी व्यवस्था लागू करें जो केवल प्रशासनिक सुविधा पर आधारित न होकर विद्यार्थियों की वास्तविक शैक्षणिक आवश्यकताओं, स्वास्थ्य तथा भारत की भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप हो।




