डर से नहीं, विश्वास से चलती है शिक्षा व्यवस्था जगदीश यादव, प्रदेश अध्यक्ष, राज्य शिक्षक संघ
भोपाल। मध्यप्रदेश की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ सबसे बड़ा प्रश्न केवल ई-अटेंडेंस का नहीं, बल्कि शिक्षक के आत्मसम्मान और शासन के विश्वास का है। जिस शिक्षक को भारतीय संस्कृति में “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः” कहकर देवतुल्य स्थान दिया गया, वही शिक्षक आज हर नए आदेश के साथ स्वयं को संदेह के कटघरे में खड़ा महसूस कर रहा है।
ई-अटेंडेंस को लेकर जारी आदेशों, उसके बाद कार्रवाई की आशंकाओं और फिर विभागीय स्पष्टीकरण ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि यदि उद्देश्य केवल व्यवस्था सुधार था, तो भय और भ्रम का वातावरण क्यों बना? लोकतांत्रिक शासन की शक्ति दंड से नहीं, विश्वास से बढ़ती है। यदि आदेश के बाद स्पष्टीकरण देना पड़े, तो यह संवाद की कमी का संकेत भी माना जाएगा।
भारतीय चिंतन सदैव कहता आया है कि “यथा राजा तथा प्रजा”। शासन का स्वर यदि विश्वास का होगा तो व्यवस्था भी विश्वास पर चलेगी, किंतु यदि संदेश भय का होगा तो उसका प्रभाव पूरे तंत्र पर दिखाई देगा। शिक्षक कोई सामान्य कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र की भावी पीढ़ी का शिल्पकार है। उसके मन में यदि सम्मान के स्थान पर असुरक्षा घर कर जाए, तो उसका प्रभाव केवल विद्यालय तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और राष्ट्र के भविष्य पर भी पड़ता है।
रामचरितमानस में के माध्यम से आदर्श शासन का संदेश देते हुए कहते हैं—
“जौं अनीति कछु भाषौं भाई।तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥”
अर्थात यदि मुझसे भी कोई अन्याय या अनुचित कार्य हो जाए तो बिना भय के मुझे रोकना।यही लोकतांत्रिक नेतृत्व का सर्वोच्च आदर्श है—संवाद,आत्मालोचना और विश्वास।ई-अटेंडेंस जैसी तकनीक का विरोध नहीं है। जवाबदेही भी आवश्यक है। किंतु प्रश्न यह है कि जिन विद्यालयों में आज भी मोबाइल नेटवर्क बाधित है, इंटरनेट उपलब्ध नहीं है और तकनीकी संसाधन अधूरे हैं, वहाँ मशीन की विफलता का दंड शिक्षक क्यों भुगते? तकनीक तभी सफल होती है, जब वह मानवीय संवेदनाओं और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप लागू की जाए।
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षकों ने युक्तियुक्तकरण, समायोजन,विद्यालयों के विलय,लगातार बदलते नियमों और गैर-शैक्षणिक दायित्वों का बोझ धैर्यपूर्वक सहा है।हर परिवर्तन को स्वीकार किया,हर चुनौती का सामना किया।किंतु यदि हर सुधार का प्रारंभ अविश्वास और दंड की चेतावनी से होगा,तो यह मनोबल को कमजोर करेगा,शिक्षा की गुणवत्ता को नहीं बढ़ाएगा।
महाभारत में कहा गया है—”धर्मो रक्षति रक्षितः।”
जो धर्म,न्याय और मर्यादा की रक्षा करता है,वही अंततः सुरक्षित रहता है।यही सिद्धांत शासन और प्रशासन पर भी समान रूप से लागू होता है।न्यायपूर्ण, व्यवहारिक और संवेदनशील व्यवस्था ही स्थायी व्यवस्था बनती है।
महाकवि ने लिखा था—”समर शेष है,नहीं पाप का भागी केवल व्याध;जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध।”
आज आवश्यकता टकराव की नहीं, बल्कि सार्थक संवाद की है।शिक्षक और शासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं,बल्कि शिक्षा व्यवस्था के साझेदार हैं।सुधार तभी सफल होगा जब विश्वास,संवाद और सहभागिता उसके आधार बनें।सरकार यदि वास्तव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य प्राप्त करना चाहती है तो उसे शिक्षक को संदेह की दृष्टि से नहीं,बल्कि साझेदार के रूप में स्वीकार करना होगा। तकनीक लागू हो, पारदर्शिता बढ़े, जवाबदेही तय हो—परंतु उसके साथ मानवीय संवेदना, व्यवहारिकता और सम्मान भी अनिवार्य रूप से जुड़े रहें।अंततः यह विवाद केवल ई-अटेंडेंस का नहीं है। यह विश्वास और भय, सम्मान और संदेह, संवाद और दंड के बीच संतुलन स्थापित करने की परीक्षा है।क्योंकि इतिहास साक्षी है—डर से शासन चल सकता है,लेकिन शिक्षा कभी नहीं चलती।और राष्ट्र का भविष्य बंद कमरों में लिखे आदेशों से नहीं,बल्कि सम्मानित, प्रेरित और भयमुक्त शिक्षक की कक्षा से निर्मित होता है।


