एजुकेशनमध्य प्रदेश

वेदांत में श्रवण, मनन और निदिध्यासन का विशेष महत्व: स्वामिनी शुभात्मानंद सरस्वती

96 वीं शंकर व्याख्यानमाला में श्रवण,मनन पर मंथन आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा 96 वीं ‘शंकर व्याख्यानमाला’ हुई आयोजित

भोपाल । आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास की ओर से आयोजित 96 वीं शंकर व्याख्यानमाला में ‘ श्रवण,मनन एवं निदिध्याशन’ विषय पर विशेष व्याख्यान हुआ। एकात्म धाम के यूट्यूब चैनल पर ऑनलाइन प्रसारित इस व्याख्यान में स्वामिनी शुभात्मानंद सरस्वती जी ने श्रवण,मनन एवं निदिध्याशन तथा जीवन में वेदांत की प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार रखे।

व्याख्यानमाला का शुभारंभ मंगलाचरण और गुरु परंपरा के स्मरण के साथ हुआ। अपने उद्बोधन में उन्होंने रेखांकित किया कि मानव जीवन का परम उद्देश्य अपने वास्तविक आत्म-स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना और उसमें पूर्ण निष्ठा स्थापित करना है। वेदांत शास्त्र किसी नए सत्य का निर्माण नहीं करते, बल्कि केवल अज्ञान के आवरण को दूर करते हैं। इस आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए वेदांत में तीन प्रमुख साधन-क्रम बताए गए हैं—श्रवण, मनन और निदिध्यासन।

उन्होंने कहा कि केवल कानों से शब्दों को सुनना मात्र श्रवण नहीं है, बल्कि योग्य गुरु के सानिध्य में बैठकर अद्वैत ब्रह्म में सभी वेदांत वाक्यों के तात्पर्य का सही निश्चय करना और अर्थानुसंधान करना ही सच्चा श्रवण है, जो चित्त की प्रमाणगत असंभावना को दूर करता है। श्रवण के पश्चात, सुने हुए सत्य को बुद्धि की कसौटी पर कसना और तर्कों के माध्यम से मन में उठने वाले संशयों व विरोधों का समाधान करना ‘मनन’ कहलाता है, जो वैचारिक परिपक्वता प्रदान करता है। इसके उपरांत, अनादि काल की दुर्वासनाओं और ‘देहाध्यास’ यानी देह को ही आत्मा मानने की भूल को त्यागकर निरंतर आत्म-कार वृत्ति में स्थिर होने का अभ्यास ‘निदिध्यासन’ है, जिसके परिपक्व होने से विपरीत भावनाओं का सर्वथा नाश होता है। परोक्ष ज्ञान को अपरोक्ष अनुभव में बदलने वाले इन तीनों साधनों का निरंतर अभ्यास साधकों के लिए आत्म-चिंतन और वेदान्त के मार्ग को प्रशस्त करने वाला रहा।

स्वामिनी शुभात्मानंद सरस्वती जी गुजरात के गोंडल स्थित सद् दर्शन आश्रम में आचार्य के रूप में सेवाएं प्रदान कर रही है उन्हें बचपन से ही अपने माता-पिता से धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कार प्राप्त हुए परिवार की प्रेरणा सहयोग और परंपरा के महात्माओं के आशीर्वाद से उनका आध्यात्मिक जीवन सहज रूप से विकसित हुआ बचपन में पूज्य स्वामी ब्रह्मात्मानंद सरस्वती जी का सानिध्य प्राप्त होने से वे वेदांत मार्ग की और प्रेरित हुई पूज्य स्वामी जी के आशीर्वाद से आगे चलकर उन्हें पूज्य स्वामिनी शुभानंद सरस्वती जी का सानिध्य प्राप्त हुआ पूज्य उनके निकट मार्गदर्शन एवं देखरेख में उन्होंने शास्त्रों का विस्तृत अध्ययन किया तथा शास्त्रों से प्राप्त ज्ञान और समझ को अपने जीवन में आत्मसात करने का निरंतर प्रयास किया ।वर्ष 2009 से 2013 तक उन्होंने पूज्य गुरु मां सामानंद सरस्वती जी के सानिध्य में रहकर वेदांत शास्त्रों का गहन अध्ययन किया ,इसके पश्चात पूज्य स्वामी दयानंद सरस्वती जी महाराज से सन्यास दीक्षा प्राप्त की वर्तमान में गुजरात के गोंडल शहर स्थित सदस्य आश्रम में वेदांत शास्त्रों के अध्ययन एवं अध्यापन का कार्य स्वत सुखाया कर रही है साथ ही गुरु परंपरा से प्राप्त ज्ञान को जन सामान्य तक पहुंचाने तथा वेदांत की शिक्षाओं के प्रचार प्रसार के माध्यम से आध्यात्मिक जागरण में योगदान देने का सतत प्रयास कर रही है |

ज्ञात हो कि न्यास द्वारा पिछले 8 वर्षों से अधिक समय से निरंतर विविध विषयों पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया जा रहा है, जिसके माध्यम से देशभर के लाखों श्रोता जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त न्यास द्वारा ओंकारेश्वर में एकात्मता का वैश्विक केंद्र – ‘एकात्म धाम’ विकसित किया जा रहा है, जिसके अंतर्गत 108 फीट ऊंची आदि शंकराचार्य जी की ‘एकात्मता की प्रतिमा’ मान्धाता पर्वत पर स्थापित की गई। इससे अतिरिक्त अद्वैत लोक – संग्रहालय तथा आचार्य शंकर अंतरराष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान की भी स्थापना की जा रही है।

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