अध्यात्ममध्य प्रदेश

प्रत्येक मनुष्य को सवयं करना पडता है अपना पिण्डदान :पं०सुशील

स्वयं की करनी का फल स्वयं भुगतना पडता)


श्री शिव शक्ति धाम सिद्धाश्रम निपानिया जाट में आयोजित श्री शिवमहापुराण कथा के तीसरे दिवस भी आश्चर्यजनक तरीके से वही सफेद कबूतर जो कथा के समय पर पिछले दो दिन से आ रहा था।आज सुबह शिवलिंग पार्थिव पूजन के शुरु होते ही शुबह दस बजे आ गया।जो श्रृद्धालुओं की उत्सुकता एवं चर्चा का विषय वन गया।पार्थिव शिवलिंग पूजा के उपरांत पं०सुशील महाराज ने यज्ञदत्त के पुत्र गुणनिधि को कुबेर पद मिलने एवं सती चरित्र की कथा श्रोताओं को सुनाई।
आचार्य श्री ने यज्ञदत के के पुत्र गुणनिधि की कथा बताते हुये कहा कि गुणनिधि चोरी करता था।अधर्म कर्म करता था।इसकी बजह से उसके पिता यज्ञदत्त ने उसका त्याग कर दिया था।जिसकी बजह से हताश होकर वह घर छोडकर दूसरे नगर चला गया था।और एक शिव मंदिर में जाकर ठहर गया।उसे अत्यंत भूंख और प्यास लगी थी।मंदिर में अंधेरा था।उसने अपने कपडे जलाकर पहले शिव मंदिर में उजाला किया।फिर शिव मंदिर में चढाये प्रसाद को खाकर अपनी भूंख मिटाई।उसी समय उसकी मौत हो गई ।तभी यमदूत उसे लेने आ गये।ठीक उसी समय शिवदूत आ गये।यमदूत से उस ब्राह्मण के प्राणों को छुडाते हुये कहा कि आज शिवरात्रि के दिन इस ब्राह्मण ने अपने कपडे जलाकर शिव मंदिर में उजाला किया है । इसलिए इसे शिवलोक प्राप्त होगा।भोले शिव ने खुश होकर गुणनिधि को कुबेर का पद दे दिया। इससे स्पष्ट होता है। कि अच्छा या बुरा मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है।
आचार्य पं०सुशील महाराज ने ब्यक्ति कि मुक्ति का साधन उसके कर्मों के फल को बताया । परिजनों द्वारा दिये पिण्डदान से नहीं बल्कि स्वयं के शरीर रुपि पिण्ड का ईश्वर सेवा में दान किया गया समय हि असली पिण्डदान होता है ।मनुष्य नौ महीने जब मां के गर्भ में रहता है। तब उसका आकार पिंण्ड का रहता है ।मनुष्य का शरीर हि बास्ततविक असली पिंण्ड है।और इस पिण्ड का दान ईश्वर सेवा में लगाकर मनुष्य स्वयं अपना पिण्डदान जीवत रहते ही कर लेता है । और इसी से उसका उद्धार होता है।
(पं०सुशील महाराज)
श्री शिव शक्ति धाम सिद्धाश्रम

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