श्रवण मनन निदिध्यासन से इसी जीवन में आत्म ज्ञान संभव – आनंदमूर्ति गुरुमां



जिसकी मन बुद्धि महान वही महात्मा – आनंदमूर्ति गुरुमाँ
भोपाल। प्रयागराज महाकुंभ के एकात्म धाम शिविर में ‘अद्वैतामृतम’ कथा के अंतिम दिन, आनंदमूर्ति गुरुमां ने अद्वैत वेदांत के गूढ़ सिद्धांतों और आचार्य शंकराचार्य के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। गुरुमां ने कहा, “अद्वैत वेदांत को समझने के लिए व्यक्ति को पहले आत्मा और चेतना के संबंध को जानने की आवश्यकता होती है। यह ज्ञान उन तक ही पहुँचता है जो शुद्ध मन और दृष्टिकोण रखते हैं।”
आध्यात्मिक जीवन में भोग, निद्रा और वासना से मुक्त होना आवश्यक हैं। मनुष्य यदि भोग के वशीभूत होकर ईश्वर को नहीं भजता, तो वह मूढ़ है। गुरुमां ने बताया, “आचार्य शंकराचार्य ने इस मूढ़ता को दूर करने के लिए ब्रह्मज्ञान की ओर सजग होने का संदेश दिया था। बिना ज्ञान के कोई भी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं समझ सकता।”
आदि शंकराचार्य ने उत्तर से दक्षिण व पूर्व से पश्चिम तक भारत को एकता के सूत्र में बांधा। उनके ग्रंथों के अध्ययन से आत्म ज्ञान होना संभव हैं व जो आत्मा, परमात्मा के ऐक्य का बोध करा दे वह आचार्य शंकर हैं।
“जब मन और बुद्धि के बंधन से व्यक्ति मुक्त होता है, तभी उसे सत्य का बोध होता है। ज्ञान के द्वारा ही अज्ञान का नाश होता है और तभी जीवात्मा और परमात्मा का भेद मिटता हैं।
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य कर्म और वासना के बंधनों से मुक्त नहीं होता, तब तक वह जन्म-जन्मांतर में बंधा रहता है। “ज्ञान का सूर्य जब मन, बुद्धि और चित्त पर प्रकाश डालता है, तब ही आत्मा का असली रूप स्पष्ट होता है।”
गुरुमाँ ने बताया कि श्रवण, मनन और निदिध्यासन के माध्यम से इसी जन्म में आत्म ज्ञान होना संभव हैं। वेदांत सार को समझकर ही हम अपने सच्चिदानंद स्वरूप का बोध कर सकते हैं।”
अद्वैतामृतम कथा के समापन के अवसर पर अनेक संतों व साधु सन्यासियों का आशीष श्रोताओं को प्राप्त हुआ। एकात्म धाम के प्रकल्प की सराहना करते हुए गुरुमां ने कहा कि यह प्रकल्प अभूतपूर्व हैं।
महाकुंभ के सेक्टर 18 स्थित एकात्म धाम शिविर में अद्वैत वेदांत प्रदर्शनी, पुस्तक स्टॉल, यज्ञ-अनुष्ठान जैसी गतिविधियां भी आयोजित की जा रही हैं। आगामी समय में सांगीतिक कार्यक्रम, विमर्श सभा, व्याख्यान शृंखला सहित अन्य आयोजन भी होने हैं।


