सरायकेला में आदिवासियों ने फूंका जंगल बचाने का बिगुल, आग और कटाई के खिलाफ कड़े नियम पारित
सरायकेला जिले के बांडी गांव में 'सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति' द्वारा ऐतिहासिक वनाधिकार पत्थलगड़ी का आयोजन किया गया. पेसा कानून 2025 और वनाधिकार कानून 2006 के तहत ग्राम सभा को मिले अधिकारों को रेखांकित करते हुए ग्रामीणों ने 180 एकड़ वन भूमि के संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया.


सरायकेला जिले के कुचाई प्रखंड अंतर्गत छोटा बांडी गांव में सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति के तत्वावधान में पारंपरिक तरीके से वनाधिकार पत्थलगड़ी कार्यक्रम का आयोजन किया गया. कार्यक्रम के दौरान पत्थलगड़ी स्थल पर पाहन सुरेंद्र सोय ने विधिवत पूजा-अर्चना की. इसके बाद उपस्थित ग्रामीणों ने जंगल और जैव विविधता के संरक्षण का सामूहिक संकल्प लिया.
पेसा कानून के पहलुओं पर डाला गया प्रकाश
मौके पर झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के केंद्रीय सदस्य सोहन लाल कुम्हार ने वनाधिकार कानून और पेसा कानून के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि सामुदायिक वन संसाधनों का संरक्षण, प्रबंधन और पुनर्जीवन आज की सबसे बड़ी जरूरत है. वनोपज से जीविका के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि जंगलों से ही आदिवासी समाज का अस्तित्व जुड़ा है. जंगल बचेगा, तभी पर्यावरण संतुलन बना रहेगा और सभी प्राणी सुरक्षित रह सकेंगे.
सोहन लाल ने उठाये वन विभाग के कार्यशैली पर सवाल
सोहन लाल ने बताया कि पेसा नियमावली 2025 के नियम 32 (1) क एवं ख में ग्राम सीमा के अंदर वनोपज और लघु वन उपज का स्वामित्व ग्राम सभा को दिया गया है. वहीं नियम 32 (2) में ग्राम सभा को पारंपरिक सीमा के भीतर वन भूमि पर सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, संवर्धन और प्रबंधन का अधिकार दिया गया है, जो वनाधिकार कानून 2006 की धारा 5 के अनुरूप है. इस क्रम में उन्होंने वन विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए.
गर्मी में जंगल में आग न लगाने की अपील
कार्यक्रम में सुखराम मुंडा ने ग्रामीणों से गर्मी के मौसम में जंगल में आग नहीं लगाने की अपील की. उन्होंने कहा कि जंगल में आग से भारी नुकसान होता है और यदि किसी कारणवश आग लग जाए, तो उसे तुरंत बुझाने का प्रयास करना चाहिए. सांसद प्रतिनिधि मानसिंह मुंडा ने कहा कि जंगल संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ी है और जेजेबीए की अगुवाई में किये जा रहे प्रयासों से जंगलों का घनत्व लगातार बढ़ रहा है. धर्मेंद्र सिंह मुंडा ने वनाधिकार पत्थलगड़ी को ऐतिहासिक कदम बताया, वहीं, करम सिंह मुंडा ने कहा कि जंगल के बिना आदिवासी जीवन की कल्पना अधूरी है.
जंगल संरक्षण से जुड़े प्रस्ताव पारित
कार्यक्रम के दौरान कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये गये. इनमें बिना अनुमति जंगल की कटाई नहीं करने, जंगल में आग नहीं लगाने, जलावन के लिए फलदार व इमारती पेड़ों की कटाई पर रोक, वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबंध और वन क्षेत्र में विनाशकारी परियोजनाओं को अनुमति नहीं देने जैसे निर्णय शामिल हैं. बताया गया कि वर्ष 2024 में छोटा बांडी गांव को 180.02 एकड़ का सामुदायिक वन पट्टा प्राप्त हुआ था.
बड़ी संख्या में ग्रामीण रहे मौजूद
इस अवसर पर सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन समिति के पदाधिकारी, ग्राम के मुंडा-मानकी, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में ग्रामीण महिला-पुरुष उपस्थित थे. सभी ने एक स्वर में जंगल, जमीन और जल की रक्षा को अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी बताया. कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश साफ तौर पर उभरा कि सामुदायिक सहभागिता के बिना जंगलों का संरक्षण संभव नहीं है और परंपरागत ज्ञान के सहारे ही प्राकृतिक संसाधनों को आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है.

