एजुकेशनखबरमध्य प्रदेश

शुभम चौहान ने नर्मदा साहित्य पर बरकतउल्ला विश्वविद्यालय से की पीएचडी

संस्कृति का अविरल प्रवाह है नर्मदा साहित्य, संस्कृति और परंपरा की जीवनरेखा है नर्मदा डॉ. सुधीर कुमार शर्मा के निर्देशन में ‘नर्मदा साहित्य’ पर शुभम ने किया शोध

भोपाल: मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा न केवल जल का स्रोत है, बल्कि वह सदियों से भारतीय संस्कृति, साहित्य और दर्शन की संवाहिका भी रही है। इसी विराट फलक को शैक्षणिक धरातल पर उतारते हुए, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल के शोधार्थी शुभम चौहान ने अपना शोध कार्य ‘हिंदी का नर्मदा साहित्य: एक सांस्कृतिक अनुशीलन’ विषय पर सफलतापूर्वक पूर्ण किया। उन्होंने यह शोध महारानी लक्ष्मीबाई कन्या स्नात्तकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापक एवं प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. सुधीर कुमार शर्मा के कुशल निर्देशन में संपन्न हुआ है।

शुभम चौहान का यह शोध प्रबंध नर्मदा नदी पर केंद्रित विपुल हिंदी साहित्य और वहां की समृद्ध लोक-संस्कृति के बीच के अंतर्संबंधों को रेखांकित करता है। जीवनदायिनी नर्मदा एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी परिक्रमा की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। शोध में इस बात पर विशेष बल दिया गया है कि कैसे नर्मदा ने कवियों, उपन्यासकारों और यात्रा-वृत्तांत लेखकों को प्रभावित किया है। डॉ. सुधीर कुमार शर्मा ने इस उपलब्धि पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि नर्मदा का साहित्य केवल शब्दों का संकलन नहीं है, शुभम ने न केवल पुस्तकालयों में उपलब्ध साहित्य का अध्ययन किया, बल्कि नर्मदा तट की लोक परंपराओं, गीतों और वहां के जनजीवन का प्रत्यक्ष अनुभव कर इस शोध को प्रमाणिकता प्रदान की है।

भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय युवा पुरस्कार एवं मप्र शासन द्वारा विवेकानंद राज्य युवा पुरस्कार से सम्मानित शुभम चौहान ने अपने 250 से अधिक पृष्ठों के इस व्यापक अध्ययन में निम्नलिखित महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया है जिनमें नर्मदा केंद्रित साहित्य का विश्लेषण,अमृतलाल वेगड़, और समकालीन लेखकों के लेखन में नर्मदा के स्वरूप का विवेचन के साथ-साथ लोक संस्कृति और परंपराएं: नर्मदा तट पर प्रचलित लोकगीत, कहावतें, मेले और अनुष्ठानों का सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण तथा परिक्रमा वासियों के अनुभवों और उनके द्वारा रचित मौखिक साहित्य का संकलन प्रमुख है।

भारतीय ज्ञान परंपरा के परिप्रेक्ष्य में नर्मदा साहित्य का अध्ययन

शोध में नर्मदा को भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यापक संदर्भ में विश्लेषित किया गया है। इसमें वेद–पुराणों, संत साहित्य, लोकश्रुतियों और आधुनिक हिंदी लेखन में नर्मदा के स्वरूप का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। शोध यह स्थापित करता है कि नर्मदा केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन, सांस्कृतिक निरंतरता और प्रकृति-आधारित जीवन-दृष्टि की प्रमुख संवाहिका रही है। यह अध्ययन नर्मदा साहित्य को भारतीय बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में प्रस्तुत करता है।

नर्मदा की ‘लोक’ दृष्टि

शुभम ने अपने शोध के दौरान पाया कि नर्मदा का प्रभाव केवल पौराणिक साहित्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक मानस में गहराई तक विस्तारित है। ‘नर्मदा’ को केंद्र में रखकर गाए जाने वाले लोक गीतों में जो अपनत्व और भक्ति भाव है, वह विश्व की किसी भी अन्य नदी संस्कृति में विरले ही मिलता है। उनके शोध में जनजातीय समुदायों के जीवन में नर्मदा के महत्व को भी प्रमुखता दी गई है। विक्रमादित्य विश्वविद्यालय,उज्जैन के कुलानुशासक एवं बाह्य परीक्षक डॉ.शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि यह शोध भविष्य के शोधार्थियों के लिए एक ‘रेफरेंस ग्रंथ’ के रूप में कार्य करेगा। वर्तमान समय में जब नदियां प्रदूषण और अस्तित्व के संकट से जूझ रही हैं, शुभम का यह कार्य हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने और जल स्रोतों के प्रति सांस्कृतिक सम्मान जगाने की प्रेरणा देता है।

नदी विमर्श को नई दिशा देगा शोध

वर्तमान समय में यह शोध केवल अकादमिक उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाला दस्तावेज है। नर्मदा साहित्य के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि नदी केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि संस्कृति, लोकजीवन और भारतीय चिंतन की आधारशिला है। यह अध्ययन नदी संरक्षण और सांस्कृतिक जागरण के लिए एक नई पहल के रूप में प्रेरक सिद्ध होगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button