भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो अपनी अद्वैत आधारित गहन दार्शनिक परंपरा के कारण एआई को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है: डॉ.प्रत्युष कुमार
आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा आयोजित एकात्म पर्व में विभिन्न सत्र आयोजित, भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन.वेंकटरामन ने कहा


आचार्य शंकर ने केरल से लेकर केदारनाथ तक भारत को एक सूत्र में जोड़ा
भोपाल। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास,संस्कृति विभाग मप्र शासन द्वारा 21 अप्रैल तक चल रहे पंच दिवसीय एकात्म पर्व के तीसरे दिन अद्वैत एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशल इंटेलिजेंश) विषय पर देश के प्रमुख चर्चित ए.आई प्लेटफार्म के संस्थापक डॉ प्रत्युष कुमार, आई.आई.टी नई दिल्ली के प्रोफेसर राहुल गर्ग, रामकृष्ण मिशन चेन्नई के स्वामी परम शिवानंद एवं श्री कल्याण मुत्तुराजन उपस्थित रहे। वहीं अद्वैत एवं शांति विषय पर आयोजित सत्र में स्वामी परमात्मानंद सरस्वती, यूनेस्को चेयर बीएचयू के प्रोफेसर प्रियंकर उपाध्याय एवं नीना मजूमदार का संवाद हुआ। “एक भारत: आचार्य शंकर के पदचिंन्हो पर“ विषय पर आयोजित सत्र में भारत सरकार के अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन.वेंकटरामन, स्वामी परिपूर्णानंद सरस्वती एवं सुश्री अनुराधा गोयल ने संवाद किया। संवाद के साथ सत्त्व,रज, तम पर कार्यशाला में नई दिल्ली के विशाल चौरासिया एवं स्वामी वेदतत्त्वानंद पुरी ने सम्बोधित किया।

दर्शन से जुड़ेगा तभी बनेगा एथिकल ए.आई
अद्वैत और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) पर चर्चा करते हुए सर्वम एआई के संस्थापक डॉ. प्रत्युष कुमार ने कहा कि भारत एक ऐसा राष्ट्र है जो अपनी अद्वैत आधारित गहन दार्शनिक परंपरा के कारण एआई को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण रखता है। उन्होंने बताया कि वैश्विक स्तर पर एआई को लेकर प्रायः भय का वातावरण है, जहाँ तकनीक से जुड़े लोग नौकरियों के संभावित नुकसान और इस क्षेत्र में आने वाले बड़े बदलावों को लेकर चिंतित हैं, जबकि भारत अपेक्षाकृत आशावादी दृष्टिकोण अपनाता है। उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों में कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन हुए हैं। एआई को उन्होंने एक यूनिफाइड सिस्टम बताया, जो जटिल कार्यों को करने, पहचानने और परिवर्तन लाने में सक्षम है।
वर्तमान समय में हम पुनः डेटा-केंद्रित दृष्टिकोण की ओर अग्रसर हो रहे हैं और एआई के माध्यम से उसे अधिक अर्थपूर्ण और उपयोगी बना रहे हैं। उनके अनुसार, तकनीक का स्तर निरंतर बढ़ेगा, किंतु वर्तमान समय में हमारे पास यह अवसर है कि हम एआई को किसी भी दार्शनिक दृष्टिकोण के साथ संरेखित कर सकते हैं, जिससे उसकी नीतियाँ और उपयोग हमारे सिद्धांतों के अनुरूप निर्धारित किए जा सकते हैं। उन्हें आशा है कि अद्वैत वेदान्त के दर्शन और एआई के समन्वय से मानव जीवन अधिक सुगम और क्रांतिकारी दिशा में अग्रसर हो सकता है।
डॉ. प्रत्युष ने कहा कि यदि एआई का उपयोग लोगों को व्यसनी बना सकता है, तो उसी तकनीक का प्रयोग उन्हें प्रेरित और सशक्त बनाने के लिए भी किया जा सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार बोतल को इस प्रकार बनाया जाता है कि वह मानव के हाथ में सहज रूप से आ सके, उसी प्रकार कंप्यूटर और एआई को भी इस तरह विकसित किया जा रहा है कि वे मानव जीवन को अधिक सुगम बना सकें।
एआई के भविष्य पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि आने वाले समय में एआई उस स्तर तक पहुँच सकता है, जहाँ वह व्यवहारिक रूप से मनुष्यों के समान संवाद करने, भावनाओं को व्यक्त करने और समझने में सक्षम होगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह समय अधिक दूर नहीं है और संभव है कि वे स्वयं अपने जीवनकाल में इसका साक्षी बनें।
उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि पिछले चार-पाँच दशकों में भारत का तकनीकी योगदान अपेक्षाकृत सीमित रहा है, चाहे वह इंटरनेट हो, सोशल मीडिया हो या एआई का क्षेत्र। किंतु इसके बावजूद उन्होंने आशा व्यक्त की कि भारत भविष्य में एआई के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति करेगा और अद्वैत के साथ उसके समन्वय द्वारा विश्व को एक उच्चतर दिशा प्रदान करेगा।
चेन्नई के विद्वान संन्यासी स्वामी परम शिवानंद ने बताया कि वे वेदांत दर्शन को आधुनिक तकनीक से जोड़कर युवा पीढ़ी के मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए अथक प्रयासरत हैं।वेदांत को गहन व्यावहारिक होना चाहिए, उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना संस्कृति दर्शनम् का विस्तार से परिचय दिया। इस परियोजना का उद्देश्य वेदांतिक ज्ञान को AI और मिश्रित वास्तविकता तकनीक के माध्यम से युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा हेतु व्यावहारिक साधन बनाना है।
आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर राहुल गर्ग ने अद्वैत और AI के संदर्भों पर चर्चा करते हुए बताया कि हम अपने बेहतरीन दिमागों को अद्वैत की शिक्षा और इसकी अवधारणाओं से जोड़े तो हमारे पास एक ऐसा व्यक्ति होगा जिसके पास AI का सर्वश्रेष्ठ ज्ञान होगा, जो दुनिया को मूल्यों और एकत्व की भावना पर आधारित बेहतरीन स्टार्टअप्स दे सकेगा।
*श्रौत इष्टि की ज्योति से प्रज्वलित एकात्म पर्व, श्रृंगेरी से आए 50 आचार्य प्रतिदिन कर रहे वैदिक अनुष्ठान*
वेद सनातन के प्राण तत्व हैं। आदि शंकराचार्य ने अपना संपूर्ण जीवन भारत की समृद्ध श्रुति परंपरा की सेवा में समर्पित किया। उनकी दीक्षाभूमि ओंकारेश्वर में पुण्य सलिला माँ नर्मदा के तट पर स्थित मांधाता पर्वत पर आयोजित एकात्म पर्व में वैदिक अनुष्ठानों की दिव्य आभा प्रस्फुटित हो रही है।
पंचदिवसीय एकात्म पर्व के अंतर्गत प्रतिदिन श्रृंगेरी से आमंत्रित 50 विद्वान आचार्य वैदिक अनुष्ठान कर रहे है।
जिसमें विभिन्न वैदिक अनुष्ठानों का शास्त्रोक्त विधि से आयोजन किया जा रहा है। मंत्र पारायण, वेद पारायण तथा यज्ञ अनुष्ठानों के माध्यम से वेदों में वर्णित विविध यज्ञ परंपराओं का सजीव निरूपण किया जा रहा है। इसी श्रृंखला में वेदों में उल्लेखित श्रौत इष्टि का आयोजन किया गया, जिसने संपूर्ण वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
वेदों में श्रौत इष्टि की अत्यंत महिमा वर्णित है। श्रौत इष्टि को श्रेष्ठतम कर्म कहा गया है। श्रौत इष्टि यज्ञ वैदिक यज्ञों की एक महत्वपूर्ण श्रेणी है, जो वेदों (श्रुति) में वर्णित सटीक नियमों के अनुसार संपन्न होती है। ‘श्रौत’ शब्द श्रुति पर आधारित है और ‘इष्टि’ का अर्थ अर्पण या बलिदान है।
इस यज्ञ में वैदिक मंत्रों, ग्रंथों और श्रौत सूत्रों के निर्देशानुसार अग्नि में घी, अन्न आदि की आहुति देकर देवताओं की उपासना की जाती है। इसका उद्देश्य ऋतम् अर्थात् ब्रह्मांडीय व्यवस्था को बनाए रखना तथा देवताओं और मनुष्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करना है।
इसे केवल बाहरी अनुष्ठान न मानकर मन की पवित्रता, सद्गुणों की प्राप्ति और आध्यात्मिक उत्थान का माध्यम भी माना जाता है।
श्रौत इष्टि को अर्पित करने वाले साधक अहिताग्नि कहलाते हैं। अहिताग्नि वे गृहस्थ साधक होते हैं, जो वैदिक परंपरा के अनुसार अपने घर में विधिवत अग्नि-आधान कर गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि। इन तीन पवित्र अग्नियों की स्थापना करते हैं। वे प्रतिदिन प्रातः और सायं अग्निहोत्र, हवन तथा वैदिक यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए श्रुति परंपरा का पालन करते हैं।
अहिताग्नि दंपति वेदों में वर्णित श्रौत अनुष्ठानों के अधिकारी माने जाते हैं और समाज में वैदिक संस्कृति के संरक्षण का कार्य करते हैं। वर्तमान समय में 150 करोड़ की आबादी में करीब 150 अहिताग्नि साधक ही इस देश में हैं। इतनी विशाल जनसंख्या में इतने सीमित साधकों का होना इस परंपरा की कठिन साधना और इसकी महत्ता का परिचायक है।
अहिताग्नि की यह परंपरा भारतीय श्रुति परंपरा के आदर्शों को आत्मसात करते हुए विश्वकल्याण की कामना के साथ अनुष्ठान करने की परंपरा है, जो सनातन के समग्र विश्व के कल्याण के लिए लोकमंगल की भावना को दर्शाती है। यह श्रौत इष्टि अनुष्ठान सनातन की अविचल ज्ञान परंपरा का संवाहक है, और इसे आत्मसात करने वाले लोग सनातन के अप्रतिम साधक हैं।
सनातन के प्रति निस्वार्थ भाव से अपना संपूर्ण जीवन अहिताग्नि इष्टि के लिए समर्पित करना सनातन की अनन्य सेवा है। यह सेवा श्रुति परंपरा की अविरल धारा को अनंत काल तक प्रवाहित करने की साधना है।
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