समाज में लोकभाषा को छोड़ने से समरसता लुप्त हो गयी- डाॅ अनुराधा सिंह
अखिल भारतीय साहित्य परिषद, द्वारा लोकभाषा गोष्ठी का आयोजन



समाज में लोकभाषा को छोड़ने से समरसता लुप्त हो गयी। डाॅ अनुराधा सिंह
भोपाल। अखिल भारतीय साहित्य परिषद, भोपाल इकाई के तत्त्वावधान में 19 अप्रैल 2026 को लोकभाषा गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कथाकार डॉ. अनीता सिंह चौहान ने अपने उद्बोधन में कहा कि देश की भाषाई विविधता लोक भाषा के कारण ही हैं। ये भाषाएँ अपने अपने विविध रंगों से सारे देश को एक सुंदर माला का रूप प्रदान करती हैं। शिक्षा में सृजन में व अपने अपने घरों में स्थानीय भाषा का प्रयोग कर इन्हें संरक्षण प्रदान किया जाना आज की महती आवश्यकता है ताकि इन्हें लुप्त होती ने से बचाया जा सके। मुख्य अतिथि सत्य साई महिला महाविद्यालय, भोपाल की सह प्राध्यापक डाॅ अनुराधा सिंह उपस्थित रही । उन्होने अपने उद्बोधन मे मगही भाषा की विशेषता से अवगत कराते हुये कहा कि-लोकभाषा हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ो से जोड़ती है। समाज में लोकभाषा को छोड़ने से समरसता लुप्त हो गयी। विशिष्ट अतिथि सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल की विभागाध्यक्ष डाॅ प्रतिमा यादव ने बुंदेली भाषा की सहजता व सरलता को उधृत किया साथ ही भाषा का महत्व बताते हुए कहा कि -बुंदेली लोकभाषा हमारे रक्त में बसी है। राष्ट्र के पास तीन प्रतीक अवश्य होने चाहिए, राष्ट्रीय गान,राष्ट्रीय ध्वज,राष्ट्रीय भाषा ।
पर हमारे राष्ट्र के पास गान व ध्वज तो है पर भाषा के लिए हमें प्रयास करना है। बीज वक्तव्य सुनीता यादव, महामंत्री, अखिल भारतीय साहित्य परिषद भोपाल इकाई द्वारा दिया गया जिसमें भोपाल इकाई के मुख्य कार्यक्रम व कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के बारे में बताया साथ ही अपनी मातृभाषा की मिठास को अनुभव कराते हुये उन्होनें कहा – भाषा का झाड़ गन्ने के झाड़ जैसो होत है ,जामें ब्रज भाषा मिश्री सी, बूँदी सी बुंदेली, बतासे सी बघेली, मालपुआ सी मालवी और नोनी संगे गुड़ की डली सी निमाड़ी रिश्तों में मिठास घोलती है।
रचनापाठ के क्रम में, बुंदेली लोकभाषा में कुमकुम गुप्ता ने पढ़ा- बुढ़ापे सबको आने हैं।
होशियार सिंह ने- चलो रे कुंभ के मेला, सीमा शिवहरे- सखी सत्या अबे तक न आये, गोकुल सोनी ने हास्य व्यंग्य रचना ‘सरपंच के भतीजे का पत्र गुरु जी के नाम’ पढ़कर श्रोताओं को खूब हंसाया।
सतीश चंद्र ने ऊँट के मुँह में जीरा, राजेश विश्वकर्मा ने बुंदेली छंद रचनाएँ व प्रतीक द्विवेदी ने गीत प्रस्तुत किया।
उषा चतुर्वेदी ने भदावरी लोकभाषा में ‘हमौऊ पनीछा’ कविता
मालवी में विहारी लाल सोनी ने ‘महारो गाँव ‘
डाॅ साधना गंगराड़े ने निमाड़ी में
निमाड़ी भाषा छे एतरी मिट्ठी
जसी शहद की कुप्पी
श्रद्धा यादव ने पढ़ा, बेटी हईं दुख जानि करीह ए बाबा इ संग सोरहे बरिस बाबा हो
इ संग सोरहे बरिस
रचनाओं का पाठ किया।
कार्यक्रम का संचालन दिनेश गुप्ता ‘मकरंद’ ने, सरस्वती वंदना – खुशी विजयवर्गीय व परिषद गीत श्रद्धा यादव ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में रितेश दुबे सहित प्रबुद्ध साहित्यकार उपस्थित रहे।



