संस्कृति और कला समाज की चेतना का आधार, पत्रकारिता को इन्हें मुख्यधारा में स्थान देना होगा, राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञों का मंथन
पत्रकारिता, संस्कृति और कला के अंतर्संबंधों पर गंभीर विमर्श

भोपाल। रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय (आरएनटीयू) में हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन पत्रकारिता, संस्कृति और कला के अंतर्संबंधों पर गंभीर विमर्श हुआ। राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित सांस्कृतिक पत्रिका रंग संवाद के डेढ़ दशक की यात्रा और उपलब्धियों पर देश के वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारों, कला समीक्षकों और सांस्कृतिक चिंतकों ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों को संरक्षित करने का सशक्त माध्यम भी है। दिनभर आयोजित दो प्रमुख सत्रों में संस्कृति, कला, साहित्य, फिल्म पत्रकारिता और सांस्कृतिक पत्रकारिता के बदलते स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की गई। दोनों सत्रों में वरिष्ठ साहित्यकार और आरएनटीयू के कुलाधिपति संतोष चौबे की विशेष उपस्थिति रही। वहीं रंग संवाद के संपादक तथा टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र के निदेशक विनय उपाध्याय ने विषय संदर्भित मुद्दे रखे।
शनिवार को संगोष्ठी के अंतिम दिन आरएनटीयू में पांचवें और छठवें सत्र का आयोजन किया गया। जिनमें मुखरूप से वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक, वरिष्ठ पत्रकार रवीन्द्र त्रिपाठी, प्रेमशंकर शुक्ल, शकील अख्तर, अजय बोकिल, फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, साहित्यकार प्रयाग शुक्ल, डॉ. श्रीराम परिहार, अरविंद ओझा तथा विनीता चतुर्वेदी ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने पत्रकारिता, संस्कृति, कला और साहित्य के पारस्परिक संबंधों, सांस्कृतिक पत्रकारिता की चुनौतियों तथा समाज में उसकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा की।
पत्रकारिता की मुख्यधारा में संस्कृति और कलाओं पर हुआ गंभीर विमर्श
संगोष्ठी के पांचवें सत्र “पत्रकारिता की मुख्यधारा में संस्कृति और कलाएं” की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार प्रयाग शुक्ल ने की। सत्र में फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज, डॉ. श्रीराम परिहार, अरविंद ओझा तथा अन्य विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। अपने संबोधन में अरविंद ओझा ने कहा कि भारतीय संस्कृति हजारों वर्षों की यात्रा के बाद आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। समाज के विकास में संस्कृति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है और आने वाले वर्षों में भी यही समाज की दिशा तय करेगी। उन्होंने कहा कि संस्कृति को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन के केंद्र के रूप में समझने की आवश्यकता है। कला का उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज के यथार्थ को सामने लाना भी है। वहीं अजय ब्रह्मात्मज ने कहा कि डिजिटल युग में फिल्म पत्रकारिता का स्वरूप तेजी से बदला है। आज कई कलाकार स्वयं अपने प्रचार के माध्यम बन गए हैं और प्रचार सामग्री को समाचार की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा है। उन्होंने कहा कि एल्गोरिद्म से डरने की आवश्यकता नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण सामग्री के चयन की जरूरत है। उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन में सनसनी और गॉसिप से दूरी बनाए रखने पर भी बल दिया। डॉ. श्रीराम परिहार ने कहा कि हिन्दी साहित्य और पत्रकारिता की यात्रा हमेशा साथ-साथ चली है। पत्रकारिता का आधार संस्कृति है और कला के माध्यम से अभिव्यक्त शब्द व्यापक सामाजिक संदर्भों को सामने लाते हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता और तकनीक को उन लोगों तक भी पहुंचना होगा, जो अभी इसकी पहुंच से दूर हैं। साथ ही पत्रकारों में कला और संस्कृति की समझ विकसित करने के लिए व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रयाग शुक्ल ने कहा कि हर दौर में ऐसे पत्रकार सामने आते रहे हैं, जो समय की चुनौतियों और समाज की आवश्यकताओं को समझते हुए अपनी भूमिका का प्रभावी निर्वहन करते हैं। पत्रकारिता की सार्थकता समाज के वास्तविक सरोकारों को पहचानने और उन्हें अभिव्यक्ति देने में निहित है।
‘रंगसंवाद : संस्कृति और सृजन’ में सांस्कृतिक पत्रकारिता की भूमिका पर हुई चर्चा
दूसरे सत्र “रंगसंवाद : संस्कृति और सृजन” की अध्यक्षता वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक ने की। रविन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता की कोई तय मुख्यधारा नहीं होती। जो समाज और संस्कृति के महत्वपूर्ण विषयों को गंभीरता से सामने लाता है, वही वास्तविक मुख्यधारा है। उन्होंने ‘रंगसंवाद’ पत्रिका की सराहना करते हुए कहा कि इसने हिन्दी में कला विमर्श को नई दिशा दी है। प्रेमशंकर शुक्ल ने वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चौबे के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने कला और संस्कृति पर गंभीर विमर्श की ऐसी परंपरा विकसित की है, जो संस्थागत स्तर पर भी दुर्लभ है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश हिन्दी कला जगत का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और भोपाल से ऐसी पत्रिका का प्रकाशित होना गौरव की बात है। शकील अख्तर ने कहा कि ‘रंगसंवाद’ पिछले कई वर्षों से कला और संस्कृति पर गंभीर कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि आज मुख्यधारा के समाचार पत्रों में कला और रंगमंच की कवरेज लगातार कम हुई है, ऐसे में इस तरह के प्रयास और अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। अजय बोकिल ने कहा कि ‘रंगसंवाद’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके लिए लिखते हुए लेखक स्वयं भी सीखता है। सांस्कृतिक पत्रकारिता को समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह समाज और मीडिया की संवेदनशीलता को जीवित रखती है। अध्यक्षीय उद्बोधन में अशोक भौमिक ने कहा कि ‘रंगसंवाद’ केवल विभिन्न कलाओं का मंच नहीं, बल्कि गंभीर वैचारिक हस्तक्षेप करने वाली पत्रिका है। उन्होंने कहा कि भारत में चित्रकला और आम जनता के बीच बढ़ी दूरी को कम करने के लिए पत्रकारिता और साहित्य को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। विनीता चतुर्वेदी ने कहा कि सामाजिक पत्रिका का निरंतर प्रकाशन अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। उन्होंने ‘चतुर्वेदी चंद्रिका’ को समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण दस्तावेज बताते हुए कहा कि ऐसी पत्रिकाएं सामाजिक मूल्यों के संरक्षण में अहम भूमिका निभाती हैं।
दोनों सत्रों में वरिष्ठ साहित्यकार एवं ‘रंगसंवाद’ के प्रधान संपादक संतोष चौबे की विशेष उपस्थिति रही। समापन पर उन्होंने सभी वक्ताओं एवं अतिथियों को विश्वविद्यालय के प्रकाशन एवं पुस्तकें भेंट कर सम्मानित किया। कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के कुलगुरू रवि प्रकाश दुबे, कुलसचिव डॉ. संगीता जौहरी सहित बड़ी संख्या में पत्रकार, साहित्यकार, शोधार्थी, विद्यार्थी एवं प्राध्यापक उपस्थित रहे।
दिन का तीसरा सत्र ‘विदेश में हिंदी पत्रकारिता ; अतीत, वर्तमान और भविष्य’ विषय पर रहा। इस सत्र की अध्यक्षता नवीनचन्द्र लोहनी ने की। वक्ता के रूप में जवाहर कर्नावट, आनंद वर्धन, यूरी बोत्विकिन, राकेश पांडे, डॉ. शेलेश शुक्ल, शालिनी वर्मा, संजय सिंह राठौर उपस्थित रहे। साथ ही सत्र में विदेश से ऑनलाइन जुड़ने वाले वक्ताओं में तेजेन्द्र शर्मा, अनिल जोशी, डॉ. वेद प्रकाश सिंह, रोहित हैप्पी, रामा तक्षक शामिल रहे।
‘ डिजिटल पत्रकारिता – तकनीक एवं चुनौतियां’ विषय पर सारगर्भित चर्चा
अंतिम सत्र ‘डिजिटल पत्रकारिता – तकनीक एवं चुनौतियां’ विषय पर रहा। इसमें अध्यक्षता राजेश बादल द्वारा की गई। वहीं, वक्ताओं में आरएनटीयू की प्रति कुलाधिपति डॉ. अदिति चतुर्वेदी वत्स, संचार विशेषज्ञ सौरभ मालवीय, जयदीप कार्णिक उपस्थित रहे। इस दौरान अपने वक्तव्य में जयदीप कार्णिक ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की आदत समाज के लिए चुनौती बन सकती है। उन्होंने कहा कि तकनीक अपने साथ नई-नई चुनौतियां लेकर आती है और उसके दुरुपयोग को रोकना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि तकनीक का उपयोग मानव हित और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि पिछले पाँच दशकों में पत्रकारिता ने तकनीकी दृष्टि से अभूतपूर्व परिवर्तन देखे हैं। उन्होंने कहा कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है और पत्रकारिता ने भी पत्रों के माध्यम से समाचार भेजने से लेकर आधुनिक डिजिटल युग तक लंबी यात्रा तय की है। उन्होंने दूरदर्शन के रंगीन प्रसारण जैसे तकनीकी बदलावों का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक का विकास आसान नहीं रहा, लेकिन हर तकनीक अपने साथ अवसरों के साथ चुनौतियां भी लेकर आती है। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को लेकर दुनिया भर में अलग-अलग मत हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे विकास का माध्यम मानते हैं, जबकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित एआई भविष्य में मानव की भूमिका को चुनौती दे सकती है। इसलिए तकनीकी विकास के साथ सतर्कता और विवेक भी आवश्यक है। अंत में समाहार वक्तव्य संतोष चौबे द्वारा दिया गया



