बैंकर्स साहित्य कला परिषद की हिंदी व्याख्यानमाला अंतर्गत “हिंदी विमर्श” संपन्न

भोपाल। विश्व संवाद केंद्र भोपाल में आज राजभाषा मास अंतर्गत हिंदी व्याख्यानमाला का कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसमें विभिन्न विद्वान वक्ताओं ने हिंदी विमर्श के अंतर्गत हिंदी से जुड़े विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला।
कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्था अध्यक्ष गोकुल सोनी ने की, मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व मुख्य सचिव एवं मध्यप्रदेश के चुनाव आयुक्त श्री मनोज श्रीवास्तव, विशेष अतिथि साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ विकास दवे, सारस्वत अतिथि बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र के निदेशक श्री महेश सक्सेना एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय हिंदी केंद्र के निदेशक श्री जवाहर कर्णावट रहे। कार्यक्रम का सफल संचालन श्री चंद्रभान राही ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ बांधवी सोनी द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना एवं सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री यशवंत गोरे के स्वागत भाषण से हुआ। “प्रशासनिक कार्यों में हिन्दी की स्थिति एवं हिन्दी का वर्चस्व स्थापित करने के उपाय” विषय पर बोलते हुए श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि प्रशासनिक सेवाओं के लिए होने वाली परीक्षाओं की स्थिति यह थी कि आरम्भ में ९०० में से ४५ विद्यार्थी हिंदी माध्यम से चयनित हुए थे जो और भी घटकर बाद में सिर्फ ११ रह गए। वास्तव में पी एस सी एवं यू पी एस सी प्रशासनिक पदों के चयन का दरवाजा है। जब इन्हीं में अंग्रेजी को प्रधानता दी जाती रहेगी तो प्रशासन में हिंदी कैसे आएगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब देवों को समुद्र मंथन पश्चात मोहिनी द्वारा अमृत बांटा जा रहा था तब राहु नाम का राक्षस कपट पूर्वक देवताओं में घुसकर बैठ गया। आज हिंदी के बीच में जो अंग्रेजी कपट पूर्वक घुस बैठी है उस को मैं इसी रूप में देखता हूं। डॉ विकास दवे ने कहा कि कितने अफसोस की बात है कि जब संसद में राजभाषा बनाने के लिए वोट डाले गए तो हिंदी की प्रतिस्पर्धा में अन्य प्रांतीय भाषा नहीं थी वरन एक विदेशी भाषा अंग्रेजी थी और अंग्रेजी और हिन्दी को बराबर मत मिले थे। वह तो मध्यप्रदेश के प्रतिनिधि ने अपना मत हिंदी के पक्ष में न दिया होता तो राजभाषा अंग्रेजी बन जाती। श्री महेश सक्सेना ने कहा कि अफसोस की बात यह कि जो अंग्रेजी पहले सिर्फ बाजारों के सूचना बोर्ड पर होती थी आज वह हमारे छोटे छोटे मोहल्लों में घुस गई है। छोटी छोटी मोहल्ले की दुकान तक के नाम अंग्रेजी में लिखे मिलते हैं। यह सब जगह लिखा होता है कि यहां अंग्रेजी सिखाई जाती है,यह लिखा कहीं नहीं मिलता कि यहां हिन्दी पढ़ाई जाती है। श्री जवाहर कर्णावत ने कहा कि कई राज्यों में राजभाषा विभाग है, परंतु मध्यप्रदेश में राजभाषा विभाग समाप्त करके दूसरे विभाग में मर्ज कर दिया गया। हमारा काम भाषा के मामले में सरकार को जागृत करना है। हम सब को इसके लिए आवाज उठाना होगा।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री गोकुल सोनी ने कहा कि जो लोग हिंदी के विरोधी हैं वे तरह तरह के जुमले उछालकर राजभाषा मास या पखवाड़ा या हिंदी दिवस का मजाक उड़ाते हैं । वे कहते हैं कि राजभाषा मास की आवश्यकता नहीं है, यह भाषा को श्रद्धांजलि देने जैसा है मेरा मानना है कि इस बहाने हम देश में हिन्दी के कार्यान्वयन पर विमर्श करके लोगों जागृत तो करते ही हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे बौद्धिक कार्यक्रम हमें भाषा के उत्थान हेतु आत्मावलोकन का अवसर देते हैं। अंत में श्री मनोज गुप्त मनोज ने सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम की व्यवस्था में में श्री अरुण गुप्ता, प्रदीप श्रीवास्तव, कैलाश मेश्राम, लक्ष्मीकांत जावणे, विपिन वाजपेई, श्रीराम माहेश्वरी, होशियार सिंह पटेल आदि का सराहनीय योगदान रहा एवं डॉ गौरीशंकर शर्मा गौरीश, हरिवल्लभ शर्मा, सीमा हरि शर्मा, रंजना शर्मा, बिहारीलाल सोनी, मनीष बादल, सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार बंधु उपस्थित रहे।
गोकुल सोनी
अध्यक्ष
स्टेट बैंक साहित्य एवं कला परिषद, भोपाल


