2047 के भोपाल में किताबों, कलाओं और संस्कृति का भी हो ठिकाना
दुष्यंत संग्रहालय ने विकास योजना 2047 पर जमा किए आपत्ति-सुझाव, मोहल्लों में पुस्तकालय, रंगमंच और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए सुलभ स्थान की मांग
राजधानी के बढ़ते विस्तार के साथ साहित्य और संस्कृति के लिए जरूरी जगह और सुविधाएँ भी विकास योजना में स्पष्ट हों। इसी उद्देश्य से दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय की ओर से भोपाल विकास योजना 2047 के प्रारूप पर विस्तृत आपत्ति-सुझाव नगर तथा ग्राम निवेश विभाग के पोर्टल पर जमा किए गए। प्रतिवेदन में सांस्कृतिक पहचान को संजोते हुए नई पीढ़ी के लिए पढ़ने, सीखने, सृजन और कला-प्रदर्शन के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
दुष्यंत संग्रहालय के उपाध्यक्ष एवं विषय विशेषज्ञ मनोज मीक ने संस्था की ओर से सौंपे गए दायित्व के तहत विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं की मांगों और लिखित सुझावों के साथ भोपाल विकास योजना 2047 एवं उसके संबंधित प्रावधानों का अध्ययन और शोध कर यह आपत्ति-सुझाव प्रतिवेदन तैयार किया है। प्रतिवेदन संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर, उपाध्यक्ष मनोज मीक और सचिव करुणा राजुरकर की ओर से दिया गया है।
प्रतिवेदन का प्रमुख आग्रह है कि शहर में सांस्कृतिक सुविधाओं की वर्तमान स्थिति और जरूरतों का स्थानवार आकलन हो। किस क्षेत्र में पुस्तकालय, वाचनालय, छोटा सभागार, रंगमंच, खुला मंच, प्रदर्शनी या प्रशिक्षण स्थल चाहिए, इसे नक्शे और चरणबद्ध कार्ययोजना में स्पष्ट किया जाए। बड़े सांस्कृतिक संस्थानों के साथ मोहल्लों के पास ऐसी सुविधाएँ भी विकसित हों, जहाँ आम नागरिक और छोटे रचनात्मक समूह आसानी से पहुँच सकें।
पुराने सुविधाविहीन मोहल्लों, नई आवासीय बसाहटों और दक्षिणी भोपाल की जरूरतों पर विशेष ध्यान देने का सुझाव है। साझा परिसरों और किफायती उपयोग की व्यवस्था से साहित्यिक गोष्ठियों, नाट्याभ्यास, कला-प्रशिक्षण और प्रदर्शनी के लिए छोटे संगठनों को भी अवसर मिल सकेगा। महिलाओं, बच्चों, युवाओं और दिव्यांगजन की पहुँच तथा सुरक्षा को नियोजन का हिस्सा बनाने पर जोर दिया गया है।
संग्रहालय ने दुर्लभ पांडुलिपियों और साहित्यिक अभिलेखों के संरक्षण, उचित अनुमति के साथ डिजिटाइजेशन तथा शोधार्थियों की पहुँच की व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण बताया है। मौजूदा वैध सांस्कृतिक परिसरों और संग्रहों की सुरक्षा के साथ गैरलाभकारी संस्थाओं के लिए साझा या रियायती उपयोग की स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था का आग्रह किया गया है। हिंदी, उर्दू, स्थानीय भाषाओं तथा लोक और आदिवासी कला की जरूरतों को भी स्थान मिले।
प्रतिष्ठित दुष्यंत संग्रहालय के विस्तार, पांडुलिपि संरक्षण, साहित्यिक शोध और सार्वजनिक प्रदर्शनी की जरूरतों के लिए योजना अनुसार उपयुक्त स्थल पर भूमि की उपलब्धता सुनिश्चित करने का भी सुझाव दिया गया है।
संस्था ने संलग्न संस्थागत सुझावों पर अलग-अलग सुनवाई और कारण सहित निर्णय का आग्रह किया है। उद्देश्य है कि 2047 के भोपाल की योजना में सांस्कृतिक सुविधाएँ ठोस स्थान, क्रियान्वयन की जिम्मेदारी और समयबद्ध कार्ययोजना के साथ जुड़ें तथा राजधानी की साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के जीवन का सक्रिय हिस्सा बने।
— दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, भोपाल



