जड़ मन को चेतन का आभास ही जीवंत करता है” – आनंदमूर्ति गुरुमां


प्रयागराज , आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास द्वारा प्रयागराज में महाकुंभ के अवसर पर सेक्टर 18 स्थित एकात्मधाम मंडप में ‘अद्वैतामृतम’ कथा के पांचवें दिन, आनंदमूर्ति गुरुमां ने आत्मा, मन और चेतना के गहन संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “मानव जन्म मिलने के बाद मनुष्य का नैसर्गिक झुकाव भोजन, निद्रा और भोग प्रवृत्ति की ओर होता है, किंतु मानव जीवन भोग, आलस व निंद्रा में व्यर्थ करने के लिए नहीं है, आत्मा का स्वरूप इन सबसे परे है। चेतन आत्मा, मन और आभास के मेल से ही जीव बनता है।आचार्य शंकर के ‘दृग-दृश्य-विवेक’ ग्रंथ पर विचार व्यक्त करते हुए गुरुमां ने बताया कि जड़ मन को चेतन का आभास ही जीवंत बनाता है। यह सत्य जानने के लिए मन और कर्म के बंधनों से मुक्त होना आवश्यक है।संत नामदेव की चौपाई, ‘सवै घट राम बोले, रामा बोले, राम बिना को बोले रे’, के माध्यम से गुरुमां ने समझाया कि हर मन में विद्यमान चैतन्य को व्यापक रूप से राम कहा जाता है। जो सबमें रमण करे, वही राम है। यही अद्वैत का सार है।जिस वस्तु के आश्रय पर कोई दूसरी वस्तु टिकती है, वही उसे ढक लेती है। जैसे मन चेतन का ही आश्रय लेता है, लेकिन वही चेतन के शुद्ध स्वरूप को ढ़क देता है।”वेदांत की वैज्ञानिक प्रासंगिकता पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि “वर्तमान समय में वेदांत को क्वांटम फिजिक्स के छात्र व शोधकर्ता नजदीकी से समझ रहे हैं”अद्वैतामृतम प्रवचन शृंखला का समापन आज होगा, जहां गुरुमां दृग दृश्य विवेक के शेष सूत्रों पर चर्चा करेंगी। साथ ही, महाकुंभ क्षेत्र के सेक्टर 18, झूंसी में स्थित एकात्म धाम शिविर में वैदिक अनुष्ठान, पुस्तक स्टॉल, शोभा यात्रा जैसी गतिविधियां भी जारी हैं व आगामी दिनों में अद्वैत वेदांत प्रदर्शनी, सांस्कृतिक कार्यक्रम, शास्त्रार्थ व विमर्श सभा आदि भी आयोजित की जाएगी।


