मध्य प्रदेश

श्यामला पहाड़ी पर ‘होरी हो ब्रजराज’ का सतरंगी नज़ारा

यमुना तट श्याम खेलत होरी....

भोपाल। फागुन के आसमान पर खिली चाँद की दूधिया रोशनी में जब प्रेम का बावरा-भीगा रंग परवान चढ़ा तो झील-पहाड़ियों के शहर का क़तरा-क़तरा थिरक उठा। रंग पंचमी के मुहाने पर सजे इस सुहाने मंजर को हुरियारों के बीच अपनी प्रिय सखी राधा और गोपियों के संग कान्हा ने और भी दिलकश बना दिया। फिज़ाओं में गूंज उठा- ‘‘यमुना तट श्याम खेलत होरी”। ये नज़ारा ब्रज और मैनपुरी लोक अंचल में सदियों से प्रचलित होली के गीतों का था। प्रसिद्ध नृत्यांगना क्षमा मालवीय ने पुरू कथक अकादमी के पिचहत्तर से भी ज़्यादा कलाकारों की टोली बनाई और इस मंडली के साथ अभिनय और लयकारी का इन्द्रधनुष रच दिया। ‘विश्वरंग’ जैसे विशाल सांस्कृतिक महोत्सव के रचयिता संतोष चौबे की इस सतरंगी पहल से तैयार हुए दिलकश ताने-बाने को कला समीक्षक-उद्‌घोषक विनय उपाध्याय की पुरकशिश आवाज़ में सुनना एक अलहदा रूमानी अहसास था। अनूप जोशी बंटी ने प्रकाश-परिकल्पना से और भी सजीला बना दिया। डॉ. अदिति चतुर्वेदी वत्स ने इस आयोजन के हर आयाम को सुंदर बानगी प्रदान की। टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र की ओर से मानव संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर ‘होरी हो ब्रजराज’ की शक्ल में सजी यह सलोनी शाम यकीनन एक मीठी-मदिर याद की तरह दर्शकों के ज़ेहन में मुद्दतों तक क़ायम रहेगी। गीत-संगीत की हमजोली में ‘होरी हो ब्रजराज’ प्रेम और सद्भाव की सुंदर मिसाल बना। संतोष कौशिक और राजू राव ने इन गीतों का संगीत संयोजन किया है।
करीब सवा घंटे के इस जादुई मंज़र की शुरूआत ‘‘चलो सखी जमुना पे मची आज होरी’’ से होती है। कृष्ण, उनकी प्रिय सखी राधा और गोकुल के ग्वाल-बाल मिलकर रंग-गुलाल के बीच मीठी छेड़छाड़ का उल्लास भरा माहौल तैयार करते हैं। फागुन की अलमस्ती और उमंगों का सिलसिला होली गीतों के साथ आगे बढ़ता है और ताल पर ताल देता ‘‘आज मोहे रंग में बोरो री’’ पर जाकर मिलन और आत्मीयता में सराबोर होता है। द्वापर युग से चली आ रही परंपरा के गीतों की यह खनक देर तक राजधानी के रसिकों से अठखेलियां करती रही। मिट्टी की सौंधी गंध से महकते गीतों और उन्हें संवारती मीठी-अल्हड़ धुनों के साथ कलाकारों के भावपूर्ण अभिनय ने होरी के इस रूपक को एक रोमांचक अहसास में बदल दिया। विश्वरंग, वनमाली सृजन पीठ, स्टूडियो,आईसेक्ट और आरएनटीयू की साझा पहल से यह प्रस्तुति तैयार हुई ।‘होरी-हो ब्रजराज’ परंपरा का एक सौंधा और मीठा-मादक अहसास है। इससे गुजर कर भीतर जाने कितने ही भाव गहरे हो उठते हैं।
इस रंग-बिरंगे रूपक में लोक का खुला मीठा संगीत है तो लय-ताल और देशी साज़-बाज़ की गमक के साथ चलती शास्त्रीय राग-रागिनियों की छाया अनोखा स्वाद और आनंद देती है। समारोह का एक अलहदा आकर्षण प्रशांत सोनी द्वारा संयोजित चित्र प्रदर्शनी रही। इस अवसर पर पुस्तिका ‘होरी हो ब्रजराज’ तथा आईसेक्ट पब्लिकेशन का विश्व पुस्तक मेला बुलेटिन विशेषांक का लोकार्पण भी हुआ। इंदिरा गांधी मानव संग्रहालय के निदेशक डा. अमिताभ पाण्डेय, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे, स्कोप ग्लोबल स्किल युनिवर्सिटी के कुलाधिपति सिद्धार्थ चतुर्वेदी, पलल्वी चतुर्वेदी, नितीन वत्स, अदिति चतुर्वेदी वत्स, आरएनटीयू कुलसचिव संगीता जौहरी, वनमाली सृजन पीठ के अध्यक्ष मुकेश वर्मा सहित आईसेक्ट समूह और टैगोर विश्वविद्यालय के अनेक अधिकारी, प्राध्यापक कर्मचारी तथा साहित्य-संस्कृति से जुड़े गणमान्य जन बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

उत्सवधर्मी परंपरा का प्रतिबिंब
आईसेक्ट स्टुडियो की हमारी टीम ने दो-तीन बरस तक ब्रज की गाँव-गलियों की ख़ाक छानी और लोक गीतों का उसकी मौलिक धुनों के साथ संग्रह किया। इस दौरान सैकड़ों होली गीतों का ज़खीरा हाथ लगा। ये भारतीय संस्कृति और उत्सवधर्मी परंपरा के प्रतिबिंब है।
– संतोष चौबे, कथाकार-कवि तथा चेयरमेन आईसेक्ट समूह

सौंधा, मीठा-मादक अहसास
‘होरी-हो ब्रजराज’ परंपरा का एक सौंधा और मीठा-मादक अहसास है। इससे गुजर कर भीतर जाने कितने ही भाव गहरे हो उठते हैं। इस रंग-बिरंगे रूपक में लोक का खुला मीठा संगीत है तो लय-ताल और देशी साज़-बाज़ की गमक के साथ चलती शास्त्रीय राग-रागिनियों की छाया अनोखा स्वाद और आनंद देती है। इसमें नृत्य और अभिनय का संयोजन कर क्षमा मालवीय और उनकी शिष्याओं ने इस अहसास को और भी घना कर दिया।
– विनय उपाध्याय, निदेशक टैगोर कला केन्द्र

खनकते रहे परंपरा के होरी गीत
•यमुना तट श्याम खेलत होरी…। •बरजोरी करें रंग डारी……। •बहुत दिनन सों रूठे श्याम। •मैं तो तोही को ना छाडूंगी…। रंग में बोरो री…। •नित नई धूम मचायो कान्हा, होली के दिनन में। •मोहन पे रंग डारो, चलो होली आई •मत मारो दृगन की चोट •मैं पानिहरा न जईयो, आगे मच रहयो फाग •डगर बिच कैसे चलूँ भाग रोके कन्हैया।

 

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