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शिक्षकों के साथ दोहरी नीति अन्यायपूर्ण, न्याय के लिए संगठित होने की आवश्यकता – जगदीश यादव

राज्य शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश यादव ने कहा है कि वर्ष 1998, 2001, 2002 और 2003 में नियुक्त हुए शिक्षकों के साथ हो रहा व्यवहार न्याय और प्रशासनिक पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि इन सभी शिक्षकों की नियुक्ति उस समय राज्य शासन द्वारा निर्धारित सभी योग्यताओं और नियमों का पालन करने के बाद ही की गई थी। जगदीश यादव ने कहा कि नियुक्ति प्रक्रिया शासन द्वारा तय की गई थी और शिक्षकों ने केवल उसी प्रक्रिया का पालन करते हुए सेवा प्रारंभ की थी। ऐसे में वर्षों बाद उन्हीं नियुक्तियों पर प्रश्न उठाना और उसका खामियाजा शिक्षकों को भुगतने के लिए बाध्य करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। यदि उस समय नियुक्ति प्रक्रिया में कोई कमी या त्रुटि थी, तो उसकी जिम्मेदारी शासन व्यवस्था की होनी चाहिए, न कि उन शिक्षकों की जिन्होंने नियमों के अनुसार सेवा शुरू की। उन्होंने कहा कि वर्तमान में शिक्षकों के साथ एक प्रकार की दोहरी नीति अपनाई जा रही है। जब किसी लाभ का प्रश्न आता है, तब इन शिक्षकों की सेवा 1 जुलाई 2018 से मानी जाती है, जबकि जब किसी दायित्व या हानि की बात आती है, तब उनकी नियुक्ति वर्ष 1998, 2001 या 2003 से मानी जाती है। एक ही शिक्षक की सेवा तिथि को अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग मानना न्याय के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है। प्रदेश अध्यक्ष ने पेंशन व्यवस्था का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पूरे देश में राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) 1 जनवरी 2004 से लागू की गई थी। यदि शासन स्वयं इन शिक्षकों की नियुक्ति 1998, 2001 या 2003 से मान रहा है, तो उन्हें पुरानी पेंशन योजना (OPS) का लाभ भी मिलना चाहिए, क्योंकि उनकी नियुक्ति NPS लागू होने से पहले की मानी जा रही है।
जगदीश यादव ने शिक्षा व्यवस्था में वेतनमान की असमानता पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 का उद्देश्य पूरे देश में समान और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था स्थापित करना था। इसके बावजूद विभिन्न राज्यों में शिक्षकों के वेतनमान में भारी अंतर देखने को मिलता है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में शिक्षकों को केंद्र के अनुरूप वेतनमान प्राप्त होता है, जबकि मध्य प्रदेश में उसी श्रेणी के शिक्षक को लगभग उससे आधा वेतन मिलता है। उन्होंने कहा कि यह केवल वेतन या सेवा तिथि का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सम्मान, समानता और न्याय से जुड़ा हुआ प्रश्न है। इसलिए यह आवश्यक है कि इन सभी विषयों को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रभावी ढंग से रखा जाए। प्रदेश अध्यक्ष जगदीश यादव ने कहा कि प्रस्तावित याचिका में नियुक्ति के समय लागू नियमों के आधार पर चयनित शिक्षकों को बाद में नई पात्रताओं से बाध्य करने की वैधानिकता, एक ही शिक्षक की सेवा तिथि को अलग-अलग मामलों में अलग-अलग मानने की वैधता, 2004 से पूर्व नियुक्ति माने जाने की स्थिति में पुरानी पेंशन योजना का अधिकार तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम के बाद भी राज्यों में वेतनमान की असमानता जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए। अंत में उन्होंने कहा कि समय की मांग है कि देश के शिक्षक इन मुद्दों को समझें, एकजुट हों और न्यायपूर्ण समाधान के लिए संगठित प्रयास करें। तभी शिक्षक वर्ग को सम्मान, समानता और न्याय मिल सकेगा।

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