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भारत का ब्रह्मास्त्र: अमेरिका-यूरोप के शोर में गुम यह समझौता, चीन की बादशाहत को चुनौती देने की क्या तैयारी?

भारत और चिली के बीच मुक्त व्यापार समझौते को बहुत जल्द अमलीजामा पहनाया जा सकता सकता है। जानिए क्यों यह समझौता वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए अमेरिका और यूरोप की डील से भी ज्यादा अहम साबित हो सकता है। सवाल-जवाब से समझते हैं इसके प्रमुख पहलू।

जब भी भारत के मुक्त व्यापार समझौतों या द्विपक्षीय व्यापार समझौताओं (एफटीए या बीटीए) की बात होती है, तो सुर्खियों में अक्सर अमेरिका, ब्रिटेन या यूरोपीय यूनियन ही रहते हैं। लेकिन इन बड़े समझौतों के शोर-शराबे से दूर, भारत बहुत ही खामोशी से दक्षिण अमेरिका में एक ऐसी डील को अमलीजामा पहनाने की तैयारी कर रहा है, जो रणनीतिक तौर पर पश्चिमी देशों के साथ होने वाली किसी भी डील से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यह समझौता है भारत और चिली के बीच।

आर्थिक जानकारों के मुताबिक, यह महज एक व्यापारिक सौदा नहीं, बल्कि भविष्य की ‘रिसोर्स वॉर’ (संसाधन युद्ध) में भारत को सुरक्षित करने की एक बड़ी बिसात है।आइए चिली के साथ भारत के इस मुक्त व्यापार समझौते की अहमियत को आसान सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं।

सवाल: आखिर चिली के साथ यह समझौता अमेरिका या यूरोप की डील से अलग और खास क्यों है?
जवाब: यह समझौता ‘बाजार’ से ज्यादा ‘भविष्य के ईंधन’ के बारे में है। आज की दुनिया में लिथियम, तांबा, कोबाल्ट और मोलिब्डेनम जैसे ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ (महत्वपूर्ण खनिज) वही हैसियत रखते हैं, जो कभी कच्चे तेल की थी। चिली इन खनिजों का गढ़ है। उसके पास दुनिया के सबसे बड़े लिथियम और तांबे के भंडार हैं। चूंकि भारत इलेक्ट्रिक वाहनों, रिन्यूएबल एनर्जी और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में ग्लोबल हब बनना चाहता है, इसलिए इन खनिजों की सप्लाई चेन पर देश की पकड़ होना जरूरी है। यह समझौता भारत को न केवल चिली का एक कमर्शियल पार्टनर बनाएगा, बल्कि एक ‘रणनीतिक पार्टनर’ भी बनाएगा, जिससे हमारी इंडस्ट्री को कच्चे माल के लिए दूसरों (चीन) पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।

सवाल: बातचीत कहां तक पहुंची है और क्या यह पूरी तरह नया समझौता है?
जवाब:
 बातचीत ‘एडवांस्ड स्टेज’ में है। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में पुष्टि की है कि यह समझौता जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा। दोनों देश शून्य से शुरुआत नहीं कर रहे हैं; 2006 से ही हमारे बीच एक तरजीही व्यापार समझौता है। लेकिन, अब जिस व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) पर बात हो रही है, उसका दायरा बहुत बड़ा है। इसमें सिर्फ सामानों का आयात-निर्यात नहीं, बल्कि डिजिटल सेवाएं, निवेश और सबसे महत्वपूर्ण- क्रिटिकल मिनरल्स सेक्टर को खोला जाना शामिल है।

सवाल: क्या भारतीय कंपनियों ने इस डील के भरोसे अभी से वहां कदम रखने शुरू कर दिए हैं?
जवाब:
 बिल्कुल, और यह इस डील की गंभीरता को दिखाता है। डिप्लोमेसी के साथ-साथ कॉर्पोरेट एक्शन भी शुरू हो चुका है: 

  • कोल इंडिया: भारत की सरकारी कोयला कोल इंडिया ने चिली में लिथियम और तांबे के प्रोजेक्ट्स के लिए अपनी एक 100% हिस्सेदारी वाली सब्सिडियरी कंपनी बनाने को मंजूरी दे दी है।
  • अदाणी समूह: पिछले साल नवंबर में अदाणी समूह ने चिली की सरकारी माइनर कंपनी ‘कोडेल्को’ के साथ तांबे की परियोजनाओं के लिए समझौता किया है। ये कदम बताते हैं कि भारत सरकार और निजी क्षेत्र के खिलाड़ी दोनों ही चिली को एक लंबे समय का साझेदार मान रहे हैं।

सवाल: दोनों देशों के व्यापार के आंकड़े क्या कहते हैं? क्या हमें वाकई चिली की इतनी जरूरत है?
जवाब:
 दोनों देशों के व्यापार के आंकड़े साफ इशारा कर रहे हैं कि भारत को चिली के संसाधनों बहुत अधिक जरूरत है। वित्त वर्ष 2024-25 में चिली से भारत का आयात 72% बढ़कर 2.60 अरब डॉलर हो गया, जबकि वहां हमारा निर्यात घटकर 1.15 अरब डॉलर रह गया। यह भारी उछाल बताता है कि भारतीय उद्योगों वहां के कच्चे माल की सख्त जरूरत है। मुक्त व्यापार समझौता होने से भारत चिली से केवल कच्चा माल ही नहीं लाएगा, बल्कि वहां अपनी मूल्य वर्धित सेवाओं और वस्तुओं का निर्यात बढ़ाकर इस व्यापार घाटे को कम भी कर सकेगा।

सवाल: चिली के साथ भारत के समझौते को ‘रणनीतिक बढ़त’ क्यों कहा जा रहा है?
जवाब:
 क्योंकि आज सप्लाई चेन एक हथियार बन चुकी है। वैश्विक राजनीति में जिस तरह सप्लाई चेन को ‘वेपनाइज’ किया जा रहा है, उसे देखते हुए भारत के लिए ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ बहुत जरूरी है। चिली के साथ यह समझौता भारत को एक डाइवर्सिफाइड और भरोसेमंद सप्लाई बेस देगा। जब बाकी दुनिया लिथियम के लिए संघर्ष कर रही होगी, तब भारत के पास एक सुरक्षित कॉरिडोर होगा। यही वह ‘रणनीतिक बढ़त’ है जो साधारण आंखों से छिप जाती है।

चिली के साथ होने वाला यह समझौता भले ही टीवी डिबेट्स का हिस्सा न बने, लेकिन यह भारत की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘ग्रीन ट्रांजिशन’ की रीढ़ साबित हो सकता है। यह डील भारत को एक आयातक देश से बदलकर एक शक्तिशाली विनिर्माण वाला देश बनाने की दिशा में दूरगामी कदम साबित होगा।

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