अद्वैत वेदांत और आधुनिक विज्ञान का संगम: आचार्य शंकर के दर्शन में ‘बोध’ से ‘विज्ञान’ तक की यात्रा
बोध' जब 'अनुभव' बनता है, तभी वह 'विज्ञान' कहलाता है- यही ऋषि परंपरा और वैज्ञानिक अनुसंधान का मूल : प्रो. रामनाथ झा


भोपाल : आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग द्वारा 74 बंगला स्थित एकात्म धाम में ‘अद्वैत और विज्ञान‘ विषय पर प्रेरणा संवाद का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रामनाथ झा ने सम्बोधित करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन के देदीप्यमान नक्षत्र आचार्य आदि शंकर के भाष्यों और सिद्धांतों में न केवल आध्यात्मिक ऊँचाइयां निहित हैं, बल्कि उनमें वे वैज्ञानिक सूत्र भी विद्यमान हैं जिन्हें आज का आधुनिक भौतिक विज्ञान सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है। ‘बोध’ जब ‘अनुभव’ बनता है, तभी वह ‘विज्ञान’ कहलाता है- यही ऋषि परंपरा और वैज्ञानिक अनुसंधान का मूल आधार है।
*ज्ञान और विज्ञान: केवल सूचना नहीं, अपितु अनुभूति*
आचार्य शंकर के अनुसार, मात्र शास्त्रों का अध्ययन ‘बोध’ है, लेकिन जब वही बोध व्यक्ति के अपने निज अनुभव में उतर आता है, तो वह ‘विज्ञान’ बन जाता है। उन्होंने रेखांकित किया कि एक सच्चा योगी और ऋषि वही है, जिसने सत्य को केवल पढ़ा नहीं, बल्कि जिया है। ऋषित्व का अर्थ ही है- सत्य का साक्षात्कार। जिस प्रकार एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रयोगों के माध्यम से सत्य की पुष्टि करता है, उसी प्रकार एक योगी अपने अंतःकरण की प्रयोगशाला में आत्म-अनुभव के आधार पर जिस ज्ञान का अनुसन्धान करता है, उसे ही वास्तविक ‘विज्ञान’ कहा गया है।
*स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा में ब्रह्मनिष्ठ गुरु की अनिवार्यता*
आज का विज्ञान स्थूल जगत की व्याख्या में तो सक्षम है, किंतु सूक्ष्म जगत की परतों को खोलने के लिए चेतना की उच्च अवस्था की आवश्यकता होती है। आचार्य शंकर स्पष्ट करते हैं कि दृश्य जगत (स्थूल) से अदृश्य सत्ता (सूक्ष्म) की ओर जाने के लिए एक ‘ब्रह्मनिष्ठ गुरु’ अनिवार्य है। सूक्ष्म जगत का रहस्य केवल तर्कों से नहीं, बल्कि योगिक दृष्टि से सुलझाया जा सकता है। जहाँ आधुनिक विज्ञान की सीमाएं समाप्त होती हैं, वहां से योग और वेदांत की सूक्ष्म दृष्टि का प्रारंभ होता है।
आचार्य शंकर ने अपने भाष्यों में जीवन और सृष्टि की जो व्याख्या की है, वह आश्चर्यजनक रूप से आधुनिक भौतिकी से मेल खाती है। उन्होंने कहा है कि वह शक्ति जो पृथ्वी को धारण करती है, वह कोई जड़ तत्त्व नहीं बल्कि चैतन्य की ही एक अभिव्यक्ति है। जिसे आज हम ‘गुरुत्वाकर्षण’ कहते हैं, उसे गीता में भगवान की ही शक्ति के रूप में प्रतिपादित किया है।
इस ब्रह्मांडीय व्यवस्था को चलाने वाली शक्ति ही जीवन का आधार है। सौंदर्य लहरी में आचार्य भी आचार्य शंकर ने शक्ति की विस्तृत व्याख्या की।
*भेद से अभेद की ओर ले जाता है वेदांत*
मानव जीवन की अधिकांश समस्याओं की जड़ ‘भेद’ की दृष्टि है। जब तक हम स्वयं को दूसरे से अलग मानते हैं, तब तक राग, द्वेष और संघर्ष का जन्म होता है। शास्त्रों में इसे ही ‘स्थूल ज्ञान’ कहा गया है- जहाँ हम केवल बाहरी भिन्नताओं को देखते हैं। आचार्य शंकर इसी अनुभाविक ज्ञान को धरातल पर लाकर यह समझाते हैं कि वास्तविक ज्ञान वह है जो ‘स्व’ और ‘पर’ के अंतर को मिटा दे।
उन्होंने कहा कि भारत के महान वैज्ञानिक सर जगदीश चंद्र बोस ने अपने शोध में यह सिद्ध किया था कि चेतना केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं है। बोस ने सिद्ध किया कि निर्जीव मानी जाने वाली धातुओं और सजीव पौधों के बीच एक समान प्रतिक्रिया तंत्र है। यह वैज्ञानिक प्रमाण वेदों के उस उद्घोष ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ की पुष्टि करता है।
अंत में उन्होंने कहा कि जब ज्ञानी व्यक्ति इस सत्य को जान लेता है, तो उसकी दृष्टि ‘समत्व’ की हो जाती है। जैसा कि आचार्य शंकर वर्णित करते है कि “सम्पूर्णं जगदेव नन्दनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमा
गाङ्गं वरि समस्तवारिनिवहः पुण्याः समस्ताः क्रियाः। अर्थात्: जब ज्ञान उदय होता है, तो सम्पूर्ण जगत ब्रह्म स्वरूप हो जाता है और व्यक्ति की हर क्रिया पुण्यमय हो जाती है।
इस अवसर पर साँची विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रो. यज्ञेनश्वर शास्त्री, स्वामिनी सद्विद्यानन्द सरस्वती सहित बड़ी संख्या में शंकरदूत एवं जिज्ञासु उपस्थित रहे।



