इंसान में लगी सूअर की किडनी! 271 दिनों तक करती रही काम, क्या बच सकती है मरीज की जान?

दुनियाभर में किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए अमेरिका से आई एक मेडिकल उपलब्धि उम्मीद की नई किरण लेकर आई है। पहली बार जेनेटिकली मॉडिफाइड सूअर की किडनी ने एक जीवित इंसान के शरीर में लंबे समय तक काम किया। एंड-स्टेज किडनी डिजीज से जूझ रहे 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज के शरीर में ट्रांसप्लांट की गई यह किडनी करीब 271 दिनों यानी 9 महीने तक काम करती रही। इस दौरान मरीज को डायलिसिस की जरूरत नहीं पड़ी और बाद में उन्हें मानव किडनी ट्रांसप्लांट भी मिल गया। मेडिकल विशेषज्ञों के लिए यह केस इसलिए अहम है क्योंकि यह संकेत देता है कि भविष्य में जेनेटिकली इंजीनियर किए गए पशु अंग उन मरीजों के लिए ‘ब्रिज’ यानी अस्थायी सहारे के रूप में इस्तेमाल किए जा सकते हैं, जिन्हें मानव डोनर किडनी मिलने में लंबा इंतजार करना पड़ता है।
किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे लाखों मरीज
दुनियाभर में किडनी डोनर की कमी एक बड़ी मेडिकल चुनौती है। अमेरिका में करीब 1 लाख लोग किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे हैं, जबकि हर साल लगभग 25 हजार ट्रांसप्लांट ही हो पाते हैं। ब्रिटेन में भी हजारों मरीज किडनी ट्रांसप्लांट की प्रतीक्षा सूची में हैं। ऐसे में जेनोट्रांसप्लांटेशन यानी एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति में अंग प्रत्यारोपण को लेकर वैज्ञानिक लंबे समय से शोध कर रहे हैं।
टिम एंड्रयूज के लिए बनी जीवन बचाने वाली कड़ी
अमेरिका के टिम एंड्रयूज टाइप-2 डायबिटीज से जुड़ी एंड-स्टेज किडनी डिजीज से गंभीर रूप से पीड़ित थे। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उनके लिए अगले कुछ वर्षों में मानव किडनी मिलने की संभावना बेहद कम थी और उनकी स्थिति के कारण वेटिंग लिस्ट से हटाए जाने या मृत्यु का जोखिम भी काफी अधिक था। जनवरी 2025 में अमेरिकी डॉक्टरों ने उन्हें जेनेटिकली एडिटेड सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट की। यह किडनी करीब 271 दिनों तक उनके शरीर में काम करती रही। इसके बाद एंड्रयूज को मानव डोनर की किडनी उपलब्ध हुई और उनका मानव किडनी ट्रांसप्लांट किया गया।
कैसे काम करती है सूअर की किडनी?
सामान्य तौर पर इंसानी शरीर किसी दूसरी प्रजाति के अंग को बाहरी तत्व मानकर उस पर तेज प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रिया कर सकता है। इसी समस्या को कम करने के लिए वैज्ञानिक सूअरों के जीन में बदलाव करते हैं। इस मामले में इस्तेमाल की गई किडनी को इस तरह जेनेटिकली एडिट किया गया था कि इंसानी शरीर में उसके अस्वीकार किए जाने की संभावना को कम किया जा सके।

मेडिकल साइंस के लिए क्यों अहम है यह मामला?
यह केस इस संभावना को मजबूत करता है कि भविष्य में जेनोट्रांसप्लांटेशन उन मरीजों के लिए एक अस्थायी विकल्प बन सकता है, जो मानव अंग मिलने तक गंभीर स्थिति में रहते हैं। अगर इस तकनीक को आगे के क्लिनिकल ट्रायल में सुरक्षित और प्रभावी साबित किया जाता है, तो यह डायलिसिस पर निर्भर मरीजों के लिए भी एक संभावित विकल्प बन सकती है और अंगों की कमी की समस्या को कम करने में मदद कर सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों के सामने अभी कई चुनौतियां हैं। इनमें अंग के लंबे समय तक काम करने की क्षमता, शरीर की प्रतिरक्षात्मक प्रतिक्रिया और पशु से इंसान में संक्रमण का संभावित जोखिम शामिल हैं। इसलिए इसे अभी नियमित किडनी ट्रांसप्लांट का विकल्प नहीं माना जा सकता। लेकिन टिम एंड्रयूज का मामला जेनोट्रांसप्लांटेशन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम जरूर माना जा रहा है




